कुलदीप त्यागी
नोएडा की ग्रैंड ओमेक्स सोसइटी के रेजिडेंट्स के बीच हुए विवाद से अधिकांश लोग भली-भांति परिचित ही होंगे। अपने लेख के माध्यम से इस विवाद से जुड़े विभिन्न पहलुओं, संदर्भों को आपके समक्ष रखने का प्रयास किया गया है। हमारा उद्देश्य सामाजिक तारतम्य को सुदृढ़ करते हुए यह सुनिश्चित करना है कि समस्त नागरिक एक स्वस्थ और भेदभाव रहित वातावरण में जीवन यापन कर सकें। देखा जाए तो पूरा प्रकरण पैसे की खनक, रुतबा बुलंदी की सनक और सियासी हनक का परिणाम है, जिसे कुछ नेताओं, अफसरों ने अपने-अपने हित साधने को अन्यान्य कारणों से तूल देकर तिल का ताड़ बनाने का काम किया।
हमारा उद्देश्य एना अग्रवाल नामक महिला से अभद्रता, गाली-गलौंच और धक्का-मुक्की करने के आरोपी श्रीकांत त्यागी का पक्ष लेना, उसका समर्थन करना कदापि नहीं हैं, उसने जो किया, वह निश्चित रूप से गलत, अनैतिक और आपराधिक कृत्य है, हम उसकी घोर निंदा-भर्त्सना करते हैं। श्रीकांत को उसके किए अपराध के लिए न्यायसंगत सजा मिलनी ही चाहिए, लेकिन इस प्रकरण से उत्पन्न सवालों के जबाव भी मिलने-खोजने आवश्यक हैं। यदि इन प्रश्नों को अनुत्तरित ही छोड़ दिया गया और कोई समाधान नहीं मिला तो ऐसी घटनाओं की रक्तबीज की तरह पुनरावृत्ति होने से ये समस्याएं निरंतर सिर उठाए खड़ी ही रहेंगी। जो कि सर्वसमाज को स्वीकार्य भी नहीं हैं। ऐसी घटनाओं से न केवल परस्पर समन्वय समाप्त होने से समाज में वैमनस्य बढ़ेगा, बल्कि सामाजिक और नैतिक सिद्धांतों-सरोकारों का हृास भी होगा। नोएडा में ही महिला अधिवक्ता भावना रॉय द्वारा सुरक्षाकर्मियों से किया गया दुर्व्यवहार और गाजियाबाद में कथित आआपा नेता के एक महिला के साथ बदसलूकी किया जाना, ग्रैंड ओमेक्स वाली घटना की श्रृंखला का ही विस्तार हैं।
नोएडा निवासी कथित भाजपा नेता का एक महिला संग बदसलूकी किए जाने वाला प्रकरण बीते करीब महीने भर से जन-विमर्श के केंद्र में है। देश-समाज के प्रत्येक न्यायप्रिय संवेदनशील व्यक्ति की तरह ही हमारा भी मानना-समझना है कि अपराध हो या गलती, निसंदेह दोषी को उसके किए की सजा मिलनी ही चाहिए, लेकिन सजा तो अपराध की गंभीरता और संवेदनशीलता या यूं कहें कि प्रवृत्ति के अनुसार ही न्यायसंगत होगी। ऐसे प्रश्न आवश्यक है कि नोएडा की ग्रैंड ओमेक्स सोसाइटी में महिला संग बदसलूकी मामले का आरोपी कथित भाजपा नेता श्रीकांत त्यागी क्या इतना बड़ा अपराधी है, जितना कि मीडिया, आरडब्ल्यूए और स्थानीय सांसद डॉ.महेश शर्मा आदि-इत्यादि के दबाव में पुलिस-प्रशासन द्वारा उसे दिखाया-घोषित कर दिया गया? महिला संग बदसलूकी करने वाले एक नामालूम से नेता को सुनियोजित तरीके से बढ़ा-चढ़ाकर कुछ ऐसे पेश किया गया कि मानो वह भाजपा का आला नेताओं में शुमार हो।
किसी भी विवाद में दोनों पक्षों के गुण-दोष का निष्पक्ष परीक्षण किया जाना ही न्यायोचित होता है। संदर्भित विषय में भी ऐसा ही किया जाता तो न्यायिक सिद्धांत ”चाहे कितने भी दोषी बच जाएं, लेकिन किसी एक भी निर्दोष को सजा नहीं मिलनी चाहिए” का प्रतिपादन होता। हालांकि मीडिया ट्रायल के कारण बने दबाव के परिणामस्वरूप ऐसा हो न सका। रही-सही कसर पुलिसिया क्रिया-कलाप ने पूरी कर दी, श्रीकांत की पत्नी अनु त्यागी और मामी इंगला त्यागी को अनाधिकार और अवैध रूप से हिरासत में लेकर। भीड़ तंत्र ने भी पेड़ गिराने का कार्य उन्मादी रूप से किया, जबकि उन पेड़ों को सावधानी पूर्वक हटाकर दूसरे स्थान पर भी लगाया जा सकता था।
श्रीकांत-एना प्रकरण को तूल देने में महिला संग बदसुलूकी का आरोपी श्रीकांत त्यागी, मीडिया, स्थानीय पुलिस-प्रशासन, सांसद डॉ.महेश शर्मा के साथ-साथ वैश्य समाज, त्यागी समाज और ब्राह्मण समाज के तथाकथित झंडाबरदार प्रथम दृष्ट्या जिम्मेदार किरदार हैं।
धनबल के दिखावे संग रुतबा बुलंदी की सनक-हनक
पहले बात मामले के आरोपी श्रीकांत त्यागी की, वास्तव में वह मूलत: भाजपाई नहीं रहा। वह बसपा छोड़ भाजपा में आए और फिर सपा के झंडाबरदार बने स्वामी प्रसाद मौर्य का चहेता बताया जाता रहा है। कहते हैं कि स्वामी प्रसाद मौर्य के सपा में शामिल होने के बाद श्रीकांत रुतबा बुलंदी को दोनों हाथों में लड्डू रखे हुए था अर्थात प्रत्यक्ष भाजपा में दिखना और अपने पुराने नेता संग भी जुड़े रहना। यह अतिमहत्वाकांक्षी युवा श्रीकांत, समाज के उस वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है जिसे धनबल के दिखावे संग रुतबा बुलंदी की सनक-हनक है अर्थात औरों से अलग या खास दिखने को साम-दाम-दंड-भेद अपनाकर हर दांव आजमाता-इस्तेमाल करता है। यथा – हथियारबंद बाउंसर, कारों का काफिला, भीड़-भड़क्का आदि-इत्यादि।
यह धनबलियों का वह वर्ग है जो जाने-अनजाने या सोच-समझ कर किसी छोटे-बड़े आपराधिक कृत्य को अंजाम तो दे देता है, लेकिन घटना के तूल पकड़ते ही उसकी दंबंगई का चोला उतर जाता है, बर्तन की कलई की तरह। उसके चतुर-चालाक सलाहकार तत्काल सक्रिय हो उठते हैं, उसे बचाव की बचकानी सलाह देने को। बताने लगते हैं कि वह क्या करे और क्या न करे? निसंदेह आरोपी कई बार अपनी उच्चस्तरीय पकड़ या रसूखों के बूते कानून के शिकंजे से बच निकलता है। कई बार उसे सुनियोजित तरीके से फंसा भी लिया जाता है।
श्रीकांत के मामले का अध्ययन करने पर भी ऐसा ही प्रतीत होता है कि चतुर-चालाक सलाहकारों की बचकानी सलाह ने सबकुछ मटियामेट करा दिया। क्योंकि श्रीकांत का महिला संग बदसलूकी किए जाने वाला वीडियो वायरल होने के बाद होना तो यह चाहिए था कि वह (आरोपी) कहीं भागने-फरार होने की जुगत भिड़ाने के बजाए अपने घर रहता और संबंधित विषय में सक्षम पुलिस अफसरों के समक्ष पहुंचकर अपना पक्ष रखता। मुकदमे की धाराओं के तहत सजा भुगतने को तैयार होता। हालांकि ऐसा करने के बजाए उसने भगौड़ा बनना कहीं बेहतर समझा और यहीं वह गंभीर चूक कर बैठा। परिणाम सबके सामने है, एक सामान्य सी धाराओं वाला मामला बवाल-ए-जान बन गया।
‘बूढ़ा मरे या जवान, हमें तो बस खबर से है काम’
बीते तीन दशक से अधिक समय से मीडिया में सक्रिय होने के नाते हुए अनुभव के आधार पर अपन डंके की चोट पर कह सकतें हैं कि मीडिया की भूमिका का तो खैर कहना ही क्या? उसका काम तो है ही किसी भी विषय-घटना को सनसनीखेज बनाकर प्रस्तुत करना। इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया के चढ़ाव वाले इस दौर में तो यह एक मानक ही बन गया है। वैसे भी मीडिया में विशेष रूप से आपराधिक विषय से संबंधित ‘पत्रकार’ एक वाक्य ‘बूढ़ा मरे या जवान, हमें तो बस खबर से है काम’ अक्सर दोहराते आए हैं अर्थात उन्हें किसी की ‘मौत’ से, उसके परिजनों की व्यथा-पीड़ा से कोई सरोकार नहीं है केवल खबर से ही मतलब है। यह वाक्य मीडिया की तुच्छ और घटिया मानसिकता को उजागर करने को पर्याप्त है। ऐसे में कहा जा सकता है कि नोएडा की इस घटना के मामले में भी मीडिया पहले दिन से ही अपनी औकात और मानसिकता के हिसाब से ही काम करता प्रतीत हुआ।
इतना ही नहीं टीआरपी के युद्ध में आगे निकलने को व्यग्र कुंठित-दमित मानसिकता वाले मीडियाकर्मियों और उनके पैनलिस्टों ने जमकर निर्लज्जता दिखाई और एक जाति विशेष अर्थात ‘त्यागी’ समाज के विरुद्ध अपना हित चयनित एजेंडा चलाया। एक सुशिक्षित-सभ्य किसान जाति ‘त्यागी’ समाज को कोसने, उसकी छवि बिगाड़ने, बदनाम करने की भरसक कोशिश की गई। इतना ही नहीं इस विषय को लेकर खूब फजीहत झेल चुका मीडिया अब भी अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा है।
पुलिस की अतिसक्रियता ने दिया तूल
पुलिस को इसका जबाव तो देना ही चाहिए कि आखिर ऐसा कौन सा पहाड़ टूट पड़ा था जो श्रीकांत की पत्नी अनु त्यागी को अनधिकृत रूप से हिरासत में लिया गया, जबकि अनु के अनुसार वह पूछताछ में पूरा सहयोग करने को सहमत थी। और पुलिस श्रीकांत की मामी इंगल त्यागी को अवैध तरीके से हिरासत में लेकर क्योंकर घूमती रही। इतना ही नहीं पुलिस अफसरों को जब यह मालूम था कि श्रीकांत के बच्चे घर पर अकेले हैं तो क्या मानवीय आधार पर कुछ रियायत नहीं बरती जानी चाहिए थी। क्योंकि श्रीकांत ने एक महिला संग बदसलूकी की थी, जोकि विधिक रूप से सामान्य धाराओं का अपराध है। श्रीकांत कोई खूंखार अपराधी या कट्टर आतंकवादी तो है नहीं जो पुलिस ने उस पर एकाएक 25 हजार रूपए का इनाम घोषित कर दिया और उसकी गिरफ्तारी को हड़कम्प मचाए रखा।
मूल दायित्व से इतर अन्य सब कुछ कर-करा रहे हैं जातीय संगठन
जातीय संगठनों का दायित्व समाज हित में उत्थानपरक और प्रेरणादायक कार्य करने के साथ ही परस्पर समन्वय बनाए रखना होता है। हालांकि वर्तमान संदर्भ में प्रतीत होता है कि विभिन्न जातीय संगठन अपने मूल दायित्व से इतर अन्य सब कुछ कर-करा रहे हैं। कहने को त्यागी-ब्राह्मण समाज के लोग अपनी एकता के कसीदे काढ़ते नहीं थकते-अघाते, लेकिन वास्तविकता क्या है? यह एक मामूली से मुद्दे को लेकर छिड़ी बहस ने उजागर कर दी है। दोनों ही वर्ग एक-दूसरे को पानी पी-पीकर गरिया रहे हैं। त्यागी-ब्राह्मण समाज ही नहीं, बल्कि त्यागी और वैश्य समाज के बीच भी बयानबाजी का दौर जारी है और दोनों पक्ष आमने-सामने हैं। इतना ही नहीं अन्य जाति-वर्ग के लोग और अराजनैतिक कहे-बताए जाने वाले कुछेक संगठन भी कतिपय कारणों से इस आग को भभकाने-भड़काने की भरसक कोशिश में हवा देने को प्रयासरत हैं। राजनीति दलों के अनेक नेता अपने-अपने हित साधने की जुगत में आग को भड़काकर हाथ सेंक रहे हैं।
जातिगत चश्मा उतारकर देखने-समझने की है जरूरत
नोएडा की ग्रैंड ओमेक्स सोसाइटी में महिला संग अभद्रता संबंधी पूरे प्रकरण को जातिगत चश्मा उतारकर देखने-समझने की जरूरत है, क्योंकि अराजक तत्वों की कोई जाति नहीं होती। यह सच है कि कथित भाजपा नेता श्रीकांत त्यागी ने जो कुछ भी किया, सभ्य समाज में वह ‘अराजकता’ कही-मानी-समझी जाती है, ऐसे में किन्तु-परन्तु की आवश्यकता ही कहां है। ‘अराजकता’ फैलाने वालों को अराजक तत्व ही कहा जाना चाहिए, चाहे वह किसी भी जाति-वर्ग का हो।
समझना होगा कि त्यागी समाज के प्रति वैमनस्य फैलाने, त्यागी बिरादरी का नाम खराब करने का मौका मीडिया को श्रीकांत त्यागी की हरकतों ने ही दिया। यदि श्रीकांत अपनी बिरादरी के सम्मान के प्रति सचेत रहता तो एक ‘महिला’ के साथ बदसलूकी करने से बचने का हर संभव प्रयास करता, जो उसने कतई नहीं किया। अत: त्यागी समाज को उसके समर्थन से दूरी बनाए रखनी चाहिए।
वायरल वीडियो से साफ है कि इस प्रकरण में पीड़ित महिला ने भी आरोपी श्रीकांत को उकसाने-भड़काने में कसर नहीं छोड़ी। ऐसे में वैश्य समाज को भी सयंम बरतने की जरूरत थी।
कारण चाहे जो भी रहे हों, लेकिन स्थानीय सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. महेश शर्मा भी ‘आपे’ से बाहर आने को आतुर दिखे। और तो और नोएडा के पुलिस कमिश्नर तक को अपशब्द कह दिए। अत: ब्राहमण समाज के लोगों को भी डॉ. महेश शर्मा के समर्थन में बयानबाजी करते समय सजगता दिखानी चाहिए थी।
राजनीतिक कारणों से बुना गया उभरते युवा नेता को फंसाने का ताना-बाना
सांसद डॉ. महेश शर्मा की ओर से इस विषय में सफाई देने को जारी किए गए तीन पृष्ठों के पत्र में स्वयं स्वीकार किया कि मेरठ-हापुड़ सांसद राजेंद्र अग्रवाल ने उन्हें फोन करके इस मामले में हस्तक्षेप करने को कहा था। ऐसे में प्रतीत होता है कि कतिपय राजनीतिक कारणों से एक उभरते हुए युवा नेता को जानबूझकर एक आपराधिक मामले में फंसाने का ताना-बाना बुना गया।
आरडब्ल्यूए के एक सामान्य विवाद को राजनीतिक हित साधने के लिए न केवल अकारण ही तूल दे दिया गया, बल्कि पूरे त्यागी समाज की छवि को बिगाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी। देश के एक सभ्य, सुसंस्कृत और शिक्षित समाज को अपराधी बताने-दिखाने का भरसक प्रयास मीडिया, सांसद डॉ. महेश शर्मा, सांसद राजेंद्र अग्रवाल और भाजपा नेता विनीत अग्रवाल शारदा आदि ने किया, यह पूरी तरह से निंदनीय है। इन लोगों के कृत्यों को कभी माफ नहीं किया जा सकता।
नारी को अपनी गरिमा का ध्यान रखना चाहिए
निर्विवाद रूप से से श्रीकांत त्यागी का आचरण निर्लज्ज और निंदनीय था, जिसे किसी भी स्तर पर स्वीकारा नहीं जा सकता। हमारे समाज में आज भी बहु-बेटियों को यही सलाह दी जाती है कि जहां कोई अशोभनीय घटना हो रही हो, उस स्थान का यथाशीघ्र परित्याग करना ही उचित रहता है। जबकि यहां एना अग्रवाल लगातार श्रीकांत त्यागी से बहस करती रहीं। क्या यह उचित नहीं होता कि जिस क्षण श्रीकांत अपशब्दों पर उतारू हुआ था, उसी समय एना को घटना स्थल से दूरी बना लेती। क्योंकि नारी को अपनी गरिमा का ध्यान स्वयं भी तो रखना ही चाहिए।
स्थानीय बनाम बाहरी रहवासियों में परस्पर समन्वय का अभाव
जिस तरह श्रीकांत त्यागी ने हनक-सनक के चलते समाज के प्रति अपनी कोई जवावदेही नहीं मानी और उद्दण्तापूर्ण, अनैतिक असामाजिक आचरण किया, उसी प्रकार सोसाईटी के अन्य रहवासियों ने भी अपने सामाजिक दायित्व का निर्वाह करने में कोताही बरती। यह आचरण स्थानीय बनाम बाहरी रहवासियों में परस्पर समन्वय के अभाव का उदाहरण है। क्योंकि स्थानीय लोग अपनी स्थानीयता को लेकर अतिआत्ममुग्ध होने के चलते हनक दिखाते हैं, वहीं गैरस्थानीय लोग स्वयं कों वर्जनामुक्त समझने के कारण नकारात्मक पाश्चात्य सभ्यता का पालन करने में कहीं नहीं हिचकते हैं। यही टकराव का मूल कारक है। ऐसे में दोनों पक्षों को ही आपसी सामंजस्य बनाने की पहल करनी होगी। अन्यथा ऐसे मामलों की पुनरावृत्ति होती रहेगी।
‘त्यागी समाज’ की छवि को ध्वस्त करने का षड़यंत्र
यहां एक महत्वपूर्ण विषय यह भी है कि एक महिला संग हुई बदसलूकी, धक्का-मुक्की की घटना को मीडिया ने ‘जातीय’ उन्माद का रंग दे दिया गया। आरोपी की जाति की आड़ लेकर पूरे ‘त्यागी समाज’ की छवि को ध्वस्त करने का षड़यंत्र चालू हो गया। मीडिया खास कर टीवी चैनलों ने टीआरपी बढ़ाने की अंधी दौड़ में श्रीकांत के बजाए उसकी जाति ‘त्यागी’ को लेकर तमाम तरह के निंदनीय शीर्षक ब्रेकिंग न्यूज की तरह चलाए। इस कुत्सित कृत्य में हजारों जन जाने-अनजाने, बगैर कुछ सोचे-समझे भेड़चाल की तरह सम्मिलित हो गए।
निरअपराध परिजनों का क्यों किया गया उत्पीड़न?
सवाल यह है कि इस पूरे प्रकरण में श्रीकांत त्यागी के परिजनों (पत्नी-बच्चों और रिश्तेदारों) ने आखिर ऐसा क्या अपराध किया जो उनका उत्पीड़न किया गया। श्रीकांत की पत्नी अनु त्यागी को हिरासत रखा, थाने में प्रताड़ित किया गया। श्रीकांत की मामी इंगला त्यागी को हिरासत में लेकर घंटों तक यहां-वहां घुमाया गया। बच्चों व अन्य परिवारजनों को डराया-धमकाया, आतंकित किया गया। उनके घर की बजली तक काट दी गई। क्या जिम्मेदार अधिकारी शपथ पत्र दे सकते हैं कि इस मामले में मानवाधिकारों का उल्लंघन नहीं हुआ?
श्रीकांत क्या इतना बड़ा अपराधी है, जितना दिखाया-घोषित कर दिया गया?
आरोपी भाजपा नेता श्रीकांत त्यागी क्या इतना बड़ा अपराधी है, जितना कि आरडब्ल्यूए, मीडिया, स्थानीय सांसद डॉ. महेश शर्मा, मेरठ-हापुड़ सांसद राजेंद्र अग्रवाल आदि-इत्यादि के दबाव में पुलिस-प्रशासन द्वारा उसे दिखाया-घोषित कर दिया गया? प्रथम दृष्ट्या एक सामान्य सी धाराओं वाले मामले के आरोपी श्रीकांत पर गौतमबुद्धनगर पुलिस ने हास्यादस्पद रूप से 25 हजार का ईनाम घोषित कर दिया गया और गैंगस्टर एक्ट तक लगा दिया गया। यह बात भी तय है कि डॉ. महेश शर्मा आरोपी श्रीकांत त्यागी के आचरण के विषय में वर्ष 2019 से अवगत थे, फिर वे हाल तक चुप्पी क्यों साधे रहे।
क्या अब कोई अवैध निर्माण और अतिक्रमण नहीं है?
क्या यह सुनिश्चित कर लिया गया है कि नोएडा की सोसायटियों, विशेषत: ग्रैंड ओमेक्स में अब कोई अवैध निर्माण और अतिक्रमण नहीं है। यदि नहीं तो सारा आक्रोश और विधि पालना की अपेक्षा उस व्यक्ति से क्यों जो किसी अन्य प्रकरण में वांछित है। सरकारी तंत्र के ज्ञान चक्षु व्यक्ति विशेष के लिए ही क्यों खुले। सोसायटी में जब बुलडोजर आया तो सभी पर समान रूप से कार्यावाही होती तो लगता कि न्याय हो रहा है।
बड़े खेल की चौसर पर मोहरा भर है ‘त्यागी समाज’
दिल्ली, लखनऊ और नोएडा के राजनीतिक, प्रशासनिक और मीडियाई गलियारों से छनकर बाहर आ रही खबरों, चर्चाओं पर यकीन करें तो श्रीकांत-एना प्रकरण में जो कुछ प्रत्यक्ष दिख रहा है, वास्तव में वैसा ही सब नहीं है। यह लड़ाई बड़े स्तर से संबद्ध है और त्यागी समाज अब उसमें बिछी चौसर का मोहरा भर ही है।
जी हां, यह मसला-मामला जैसा-जितना दिख रहा है उतना सामान्य या साधारण कतई नहीं है। चर्चा है कि कुछ आला अफसर, कई बड़े नेता-जनप्रतिनिधि इस प्रकरण के मूल में हैं। और उन्हीं की शह पर यह पूरा खेल खेला गया। कुछेक चर्चाओं पर यकीन करें तो पूरे खेल में अभी तक प्रथम दृष्ट्या खिलाड़ी प्रतीत हो रहे स्थानीय सांसद और पूर्व मंत्री डॉ. महेश शर्मा खुद इसमें ‘शिकार’ हैं और श्रीकांत को चारा बनाकर ‘शिकारियों’ ने उन्हीं पर लक्ष्य-संधान कर रखा है। खेल पैसे का भी है, नेता-अफसर-स्क्रैप माफिया गठजोड़ का भी है।
इस पूरे प्रकरण में मीडिया के साथ ही इससे संबंधित पुलिस अफसरों, स्थानीय सांसद डॉ. महेश शर्मा और विषय विशेष को लेकर अतिसक्रिय होने वाले विभिन्न जातीय संगठनों और राजनीतिक दलों से जुड़े नेताओं की भूमिका की उच्चस्तरीय निष्पक्ष जांच की जानी चाहिए। तब कहीं जाकर इस मामले में दूध का दूध, पानी का पानी हो सकेगा।
‘त्यागी समाज’ की ‘आन-बान-शान’ से ‘भाजपा विरोध’ तक सिमटा मामला
श्रीकांत-एना प्रकरण में त्यागी समाज स्वयं एक मोहरे की तरह इस्तेमाल किया जाता प्रतीत हो रहा है। अतिक्रमण का विरोध कर रही महिला संग बदसलूकी करने से शुरू हुआ यह मामला अब ‘त्यागी समाज’ की ‘आन-बान-शान’ से जुड़कर ‘भाजपा विरोध’ तक सिमट गया है। शुरूआती विरोध से इतर 21 अगस्त की महापंचायत से लेकर मेरठ में धरना-प्रदर्शन तक हुई-हो रही बयानबाजी को देख-सुनकर
कोई भी सजग-सतर्क रहने वाला व्यक्ति मामूली दिमागी कसरत से जान-समझ सकता है कि नोएडा की ग्रैंड ओमेक्स सोसाइटी वाले प्रकरण में क्या-क्या हुआ-हुवाया या किया-कराया जा रहा है। राजनीतिक पंडितों की मानें तो त्यागी-भूमिहार समाज की आड़ लेकर कुछ नेता और दल विशेष अपनी सियासत चमकाने, सियासी जमीन पुख्ता करने की जुगत में हैं। राजनीतिक पारी शुरू करने के सपने देख रहे अफसर भी इसमें शामिल हैं।
दरअसल भाजपा विरोधियों को यह मसला अपने मुफीद दिखा, नतीजतन वे अपने-अपने चयनित हित साधने को त्यागी समाज का कांधा इस्तेमाल करने की मुहिम में आ जुटे। इस विवाद को तूल देने को साम, दाम, दण्ड और भेद यानी हर हथकण्डा आजमाने में लगे हैं। इन लोगों में अन्य समाज के झंडाबरदारों के साथ ही कतिपय कारणों से कांग्रेस, राष्ट्रीय लोकदल, सपा और भाकियू में सक्रिय छोटे-बड़े कई त्यागी नेता भी लिप्त हैं।
त्यागी समाज को यह समझना-ध्यान देना चाहिए कि कल तक ‘त्यागियों’ की काट का मौका तलाशने वाले ‘तत्व’ आज इस प्रकरण में तुम्हारे साथ क्यों खड़े दिख रहे हैं? त्यागी-भूमिहार समाज के राजनीतिक रूझान की बात करें तो करीब 90 फीसदी त्यागी-भूमिहार वर्तमान में खूंटा ठोककर भाजपा संग हैं। ऐसे में अन्य दलों में सक्रिय ‘त्यागी-भूमिहार’ नेताओं को अपने लिए कहीं कोई मौका दिखाई नहीं देता। श्रीकांत-एना प्रकरण इन नेताओं को अपने हित साधाने का अवसर प्रतीत हुआ और उन्होंने समय न गंवाते हुए मामले को हाथों-हाथ ले लिया और इसे उछालने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। इनमें पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ‘त्यागी’ नेता ही नहीं, बल्कि पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के भूमिहार नेता भी पुरजोर तरीके से सक्रिय हो उठे।
चौंकाने वाला तथ्य यह है कि भाजपा में सक्रिय ‘त्यागी’ नेताओं ने भी इस मामले को शांत करने-कराने के बजाए आग में घी डालकर हाथ सेंकने की जुगत भिड़ाई। कहा जा रहा है कि भाजपा के ‘त्यागी’ नेता भी अपने-अपने हित साधने की कवायद में हैं। अंतत: यही कहा जा सकता है कि बेशक लाख समझाओ, लेकिन समझाने से अब कोई भी समझने वाला नहीं है। क्योंकि रणभेरी बज चुकी है, तीर-तलवार पर धार लगाकर सभी योद्धा सज्ज होकर निशाना साधने में लगे हैं।
बहरहाल, त्यागी समाज श्रीकांत त्यागी की पत्नी व अन्य परिजनों के उत्पीड़न को लेकर क्षुब्ध है। इसे लेकर आंदोलित लोगों ने ”नारी शक्ति के सम्मान में, त्यागी समाज मैदान में” का नारा बुलंद करते हुए स्थानीय सांसद डॉ.महेश शर्मा, मेरठ-हापुड़ के सांसद राजेंद्र अग्रवाल के खिलाफ ही नहीं, बल्कि भाजपा के खिलाफ भी मोर्चा खोल रखा है।
त्यागी समाज पूछ रहा है कि इस पूरे प्रकरण में श्रीकांत त्यागी के परिजनों (पत्नी-बच्चों और रिश्तेदारों) ने आखिर ऐसा क्या अपराध किया जो उनका उत्पीड़न किया गया। श्रीकांत की पत्नी अन्नू त्यागी को नियम विरुद्ध हिरासत में क्यों रखा गया। घंटों तक थाने में बैठाकर प्रताड़ित क्यों किया गया। बच्चों व अन्य परिवारजनों को क्यों डराया-धमकाया, आतंकित किया गया। उनके घर की बजली क्यों काट दी गई।
त्यागी समाज की मांग है कि इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच की जाए और दोषियों पर कार्रवाई हो। श्रीकांत त्यागी की पत्नी व अन्य परिजनों के उत्पीड़न में लिप्त अफसरों को दंडित किया जाए। साथ ही श्रीकांत पर अकारण लगे गैंगस्टर एक्ट को हटाया जाए। त्यागी समाज के बड़े राजनीतिज्ञों को सामने आकर मामले को संवेदनशीलता के साथ संभालना चाहिए। साथ ही सरकार को भी समय रहते इस विषय की गंभीरता को समझकर त्यागी समाज की न्यायोचित मांगों पर कार्रवाई करनी चाहिए।