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परिमार्जन की व्यवस्था संविधान से निकली

नई दिल्ली : रामनाथ कोविन्द ने गुरुवार को यहाँ कहा कि भारत का संविधान एक जागृत संविधान है और इसके अंदर से ही परिमार्जन की व्यवस्था निकलती है, यह कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका सहित सभी नागरिकों का सही दिशा में मार्गदर्शन करता है। कोविन्द ने राजधानी में स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) के समवेत सभागार में ‘नए भारत का सामवेद’ पुस्तक के लोकार्पण के दौरान यह बात कही। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता आईजीएनसीए न्यास के अध्यक्ष और वरिष्ठ पत्रकार पद्मश्री रामबहादुर राय ने की।
कोविन्द ने कहा, ‘पुस्तक में संकलित भाषण हमारे संविधान के सार को सहजता, सरलता से प्रस्तुत करते हैं। वर्तमान में संविधान को लेकर लोगों में जागरूकता बढ़ी है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की संविधान को लेकर यह दृष्टि थी कि संविधान लोगों की आकांक्षाओं के अनुरूप होना चाहिए।’
विदेश एवं संस्कृति राज्य मंत्री मीनाक्षी लेखी ने कहा, ‘2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने का जो लक्ष्य है, उसके लिए हम सब संकल्पित हैं और इस लक्ष्य के प्रणेता कोई और नहीं, बल्कि भारत के प्रधानमंत्री हैं। बाबासाहेब अम्बेडकर संविधान की आत्मा थे और आजादी के बाद से संविधान की आत्मा का अनादर किया गया। उन्होंने महिलाओं को बराबरी का अधिकार, वंचितों को अधिकार, सबको समता का अधिकार देने जैसे अनेकों कार्य किये।’
आईजीएनसीए के अध्यक्ष और वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय ने कहा, ‘जिस पुस्तक का लोकार्पण हुआ है, उसको मैं नागरिक चेतना का परिणाम मानता हूं। मेरी दृष्टि में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संविधान के संबंध में एक मौलिक कार्य किया है। यही बात इस किताब में मिलती है।’ उन्होंने कहा कि संविधान वही है, जो पहले था, लेकिन उसको देखने की दिशा बदल गई है, उसके बारे में सोचने की दिशा बदल गई है।
आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा, ‘जब से संविधान दिवस मनाया जाने लगा है, संविधान के विषय में सोच और जागृति की दिशा बदली है। विशेष रूप से युवाओं में संविधान को लेकर रुचि पैदा हुई है, विश्वास बढ़ा है।’

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