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ओबेरॉय ग्रुप वाइल्ड फ्लावर हॉल मामले की 29 को सुनवाई होगी

शिमला : हिमाचल उच्च न्यायालय में शुक्रवार को ओबेरॉय ग्रुप के छराबड़ा स्थित वाइल्ड फ्लावर हॉल मामले में सुनवाई हुई। न्यायाधीश सत्यैन वैद्य की पीठ में रविवार को एग्जीक्यूशन पिटिशन पर बहस होनी थी, लेकिन ओबेरॉय ग्रुप के वकील ने स्थगन की अपील की।
न्यायालय में ओबेरॉय ग्रुप के छराबड़ा स्थित वाइल्ड फ्लावर हॉल मामले में सुनवाई हुई। न्यायाधीश सत्यैन वैद्य की बैंच में आज एग्जीक्यूशन पिटिशन पर बहस होनी थी, लेकिन ओबेरॉय ग्रुप के वकील ने स्थगन की अपील की। अब इस मामले की अगली सुनवाई 29 दिसंबर को होगी।
राज्य सरकार ने अदालत से फाइव स्टार वाइल्ड फ्लावलर होटल को वापस देने का आग्रह किया। इसे लेकर हिमाचल प्रदेश पर्यटन विकास निगम की ओर से अदालत में वारंट ऑफ पोजेशन यानी कब्जे की एप्लीकेशन भी दी गई। अतिरिक्त महाधिवक्ता आइएन मेहता ने बताया कि ओबेरॉय ग्रुप ने भी एक एप्लिकेशन के जरिए डिमांड ड्राफ्ट दायर किया, जिस पर अगली सुनवाई में बहस होगी।
गौरतलब है कि न्यायालय ने फाइव स्टार वाइल्ड फ्लावर होटल पर सरकार के कब्जे के एग्जीक्यूशन ऑर्डर पर स्टे किया था, जिसके तहत सरकार ने बीते 18 नवंबर को वाइल्ड फ्लावर होटल पर कब्जा कर लिया था। इसके बाद ही ओबेरॉय ग्रुप ने कोर्ट में पुनर्विचार याचिका डाली है। भ्च्ज्क्ब् अधिकारियों ने भारी दल बल के साथ होटल पर कब्जा कर यहां एडमिनिस्ट्रेटर बैठा दिया था।
शिमला से लगभग 13 किलोमीटर दूर छराबड़ा में ओबेरॉय ग्रुप का फाइव स्टार होटल चल रहा है। हिमाचल सीएम सुखविंदर सुक्खू कह चुके हैं कि 22 साल से इसका केस लड़ा जा रहा है। उन्होंने कहा कि लीज पर दी गई 126 बीघा जमीन का प्रदेश को एक पैसा नहीं मिला है। यह हमारा अधिकार है। सरकारें आती-जाती रहेंगी, लेकिन हम अपनी संपदा लूटने नहीं देंगे।
सरकार और ओबेरॉय ग्रुप के बीच एग्रीमेंट हुआ था। मगर, पिछले 25-30 सालों से हिमाचल सरकार को रेवेन्यू-इक्विटी नहीं दी। इससे सरकार को करोड़ों का नुकसान हुआ। उन्होंने कहा कि ओबेरॉय ग्रुप में लगभग 120 करोड़ रुपए हिमाचल को देने थे, लेकिन नहीं दिए।
वाइल्ड फ्लावर पहले एचपीटीडीसी के पास ही होता था। मगर साल 1993 में भीषण आग लगने से यह जलकर राख हो गया। इस स्थान पर नया होटल बनाने के लिए राज्य सरकार ने ओबेरॉय ग्रुप की ईस्ट इंडिया होटल कंपनी के साथ करार किया। करार के अनुसार कंपनी को चार साल के भीतर पांच सितारा होटल का निर्माण करना था। ऐसा न करने पर कंपनी को दो करोड़ रुपए जुर्माना प्रतिवर्ष राज्य सरकार को अदा करना था। वर्ष 1996 में सरकार ने कंपनी के नाम जमीन को ट्रांसफर किया।

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