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1929 में बंद हुई पत्रिका ‘स्त्री दर्पण’ ने गीतांजलि श्री के विशेषांक से की दोबारा शुरुआत

नई दिल्ली: अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार से सम्मानित लेखिका गीतांजलि श्री पर निकाला गया विशेषांक उन्हें भेंट किया गया। आजादी की लड़ाई में ऐतिहासिक भूमिका निभाने वाली ‘स्त्री दर्पण’ पत्रिका का प्रवेशांक प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में आयोजित समारोह में गीतांजलि श्री को भेंट किया गया। यह पत्रिका 1909 में इलाहाबाद से निकली थी लेकिन 1929 में बंद हो गई और 93 साल के बाद यह पत्रिका दोबारा निकली है । इसकी संपादक नेहरू खानदान की पद्मभूषण से सम्मानित रामेश्वरी देवी थी जिनका निधन 1966 में हो गया था । अब इस पत्रिका को फिर से शुरू किया गया है।

हिंदी की प्रसिद्ध आलोचक और ‘स्त्री दर्पण’ पत्रिका की संपादकीय सलाहकार डॉक्टर सुधा सिंह ने गीतांजलि श्री को पत्रिका का पहला अंक भेंट किया जो भी उन पर ही केंद्रित है। पत्रिका के संपादक वरिष्ठ पत्रकार एवम यूनीवार्ता के पूर्व विशेष संवाददाता अरविंद कुमार एवम प्रोफेसर सविता सिंह हैं। प्रो़ सुधा सिंह ने इस मौके पर कहा कि गीतांजलि श्री का उपन्यास ‘रेत समाधि ’ शिल्प और भाषा की नवीनता से उपन्यास के ढांचे को ही नहीं तोड़ता बल्कि सरहदों को भी तोड़ता है। बुकर प्राइज रेत समाधि के अंग्रेजी अनुवाद को मिला है। वह हिंदी की पहली लेखिका जिनको यह पुरस्कार मिला है।

गीतांजलि श्री ने भी इस अवसर प अपने उपन्यास के कुछ अंशों का पाठ किया जिसमें वाघा बॉर्डर पर दोनों देशों के अंदर राष्ट्रवाद का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि विभाजन की पीड़ा अभी तक गई नहीं है और अभी भी हमारे समाज में विभाजन होता जा रहा है बल्कि अब तो केवल राजनीतिक विभाजन ही नहीं बल्कि बाजार और उपभोक्तावाद ने भी समाज में विभाजन पैदा कर दिया है।

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