नयी दिल्ली : देश को लिथियम-आयन बैटरी की केवल घरेलू बाजार में मांग को पूरा करने के लिए 2030 तक 10 अरब डॉलर से अधिक का निवेश करने की आवश्यकता है। इस निवेश से सेल निर्माण और कच्चे माल के शोधन को बढ़ावा मिलेगा और 10 लाख से अधिक नयी नौकरियों का सृजन होगा।
आर्थर डी. लिटिल (एडीएल) की यहां बुधवार को जारी ई-मोबिलिटी: सेल मैन्युफैकचरिंग इन इंडिया रिपोर्ट में कहा गया कि देश को बैटरी निर्माण क्षेत्र में बड़े कदम उठाने की आवश्यकता है जिससे घरेलू और वैश्विक स्तर पर देश इस बाजार के लिए खुद को तैयार कर सके।
रिपोर्ट के अनुसार, भारत की लिथियम-आयन बैटरी की मांग वर्तमान के 3 जीडब्ल्यूएच (गीगावॉट घण्टा) से बढ़कर 2026 तक 20 जीडब्ल्यूएच और 2030 तक 70 जीडब्ल्यूएच हो जाएगी जिसकी वर्तमान में 70 प्रतिशत आवश्यकता पूरी करने के लिए चीन और हांगकांग से आयात किया जाता है। बैटरी उत्पादन से जुड़े क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर चीन एक मजबूत खिलाड़ी है जिसमें खनन में उसका 23 प्रतिशत हिस्सा है जबकि शोधन में वह 80 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखता है।
चीन की सेल उत्पादन में 73 प्रतिशत हिस्सेदारी है और उत्पादन में वह 20 प्रतिशत बैटरियों का निर्माता है। बैटरी उत्पादन प्रक्रिया में सबसे पहले खनन और उसके बाद खनिजों का शोधन किया जाता है। इसके कैथोड उत्पादन के बाद सेल का उत्पादन किया जाता है। इसके बाद बैटरी का उत्पादन होता है। वर्ष 2021 में चीन का निर्यात 78 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 28 अरब डॉलर का रहा जो एक वर्ष पूर्व 16 अरब डॉलर का था। इसी तरह उत्पादन 23 प्रतिशत बढ़कर 23 अरब डॉलर पर पहुंच गया जो 2020 में 19 अरब डॉलर का था।
रिपोर्ट में कहा गया है कि ई-मोबिलिटी वैल्यू चेन का सबसे महत्वपूर्ण घटक ई-सेल है। भारतीय ईवी उद्योग आयात, सीमित स्थानीय विनिर्माण, कच्चे माल तक सीमित पहुंच और शोधन क्षमताओं पर अत्यधिक निर्भरता से ग्रस्त है।अनुसंधान एवं विकास में बड़े निवेश, सहायक सरकारी नीतियां, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश प्रवाह और भौगोलिक क्षेत्रों में कच्चे माल के संसाधनों के जबरदस्त अधिग्रहण से भारत को लिथियम-आयन बैटरी में आत्मनिर्भरता हासिल करने में मदद मिल सकती है।
सरकार को बैटरी के लिए आपूर्ति श्रृंखला को स्थानीय बनाने के लिए कई मोर्चों पर काम करना होगा, जिससे घरेलू निर्माताओं के लिए लिथियम, कोबाल्ट, मैंगनीज और निकल जैसे कच्चे माल की बेहतर उपलब्धता सुनिश्चित हो सके।
इस अवसर पर रिपोर्ट के लेखक बर्निक चित्रन मैत्रा (एडीएल के भारत में प्रबंधन साझीदार) , फैबियन सेम्फ और प्राथमेश चौधरी के साथ डॉ एन्ड्रेस सीओसर के पैनल ने संवाददाता सम्मेलन को संबोधित किया। उन्होंने बताया कि इलेक्ट्रिक वाहनों में 40 प्रतिशत कीमत का हिस्सा बैटरी का होता है जिससे वर्तमान में उनकी कीमत अधिक है। बैटरी उत्पादन क्षेत्र में सही कदम उठाने के बाद इसकी कीमत आगामी 5-10 वर्ष में आधी हो सकती है। देश के लिए आगामी तीन से चार साल इस क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण है।
सरकार और उद्योग पारिस्थितिकी तंत्र को स्थापित बैटरी निर्माताओं, ओईएम, एवं स्टार्ट-अप के साथ सहयोग करना होगा, लगातार शोध एवं अनुसंधान में निवेश करना होगा, साझेदारियां करनी होंगी और वैश्विक गठबंधन बनाने होंगे ताकि मजबूत आपूर्ति श्रृंखला का निर्माण किया जा सके। ग्राहकों की मांग के साथ यह भारत को वैश्विक ईवी में बड़ी शक्ति में बदल सकता है।
पैनल के अनुसार फेम एक और दो नीतियों जैसे सरकारी प्रयास और ओईएम में वृद्धि, परंपरागत कंपनियां, आधुनिक स्टार्ट-अप्स द्वारा बैटरी निर्माण की शुरुआत जोर पकड़ रहा है लेकिन ये बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकते हैं। मशहूर ब्रांड प्रतिष्ठा हासिल करने के लिए भारतीय कंपनियों के लिए बेहतर गुणवत्ता और पर्यावरण मानकों हेतु प्रयास करना अनिवार्य है, जिससे भारत को सेल्स में आत्मनिर्भर बनने और इसे वैश्विक निर्यात केंद्र के रूप में स्थापित करने में मदद मिलेगी।
