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अंतर्राष्ट्रीय महिला हिंसा उन्मूलन दिवस, सामाजिक संतुलन के लिये धार्मिक संस्थाओं का महत्वपूर्ण योगदान – स्वामी चिदानन्द सरस्वती

ऋषिकेश : अंतर्राष्ट्रीय महिला हिंसा उन्मूलन दिवस के अवसर पर परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ हो रही हिंसा हमारे बीच से समाप्त करने के लिये प्रत्येक व्यक्ति, समाज, सरकार, धर्मगुरूओं और धार्मिक संस्थाओं को एक साथ आना होगा।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि समाज में लैंगिक असमानता और हिंसा की जडं़े इतनी गहरी है कि उसके लिये प्रयास भी क्रान्ति के स्तर पर ही करना होगा। उन्होंने कहा कि विश्व की लगभग 84 प्रतिशत आबादी किसी न किसी रूप से धर्म और आस्था से जुड़ी हुयी है और दुनिया के सभी धर्म सभी को समानता और गरिमायुक्त जीवन जीने का संदेश देते हैं। शास्त्रों में उल्लेख है कि हम सभी एक ही परमात्मा की संतानें हैं और सभी में ईश्वर का अंश समाहित हैं। हमारा मानना है कि धर्म समाज को एक सकारात्मक स्वरूप प्रदान करता है, समाज को एकजुट करता है, सामाजिक संतुलन बनाए रखने में मदद करता है और धर्म व्यक्तियों को समाज में उनकी भूमिका को परिभाषित करने में भी मदद करता है।
स्वामी जी ने कहा कि हमारे समाज में व्याप्त लैंगिक असमानता और लिंग आधारित हिंसा के पीछे बड़ा कारण पितृसत्तात्मक मानसिकता भी है। वर्षों से हमारे समाज में पुरुष और महिलाओं के बीच अधिकार, शक्ति एवं संसाधनों का असमान वितरण देखने को मिलता है। समाज न चाहते हुये भी लैंगिक हिंसा को मौन सहमति प्रदान करता है अतः इस व्यवस्था को ठीक करने के लिये लैंगिक असमानता के प्रति जन समुदाय को जागरूक करना होगा और इसके लिये सबसे श्रेष्ठ माध्यम है धार्मिक संस्थायें और धर्मगुरूओं द्वारा अपने अनुयायियों को प्रशिक्षित करना। परमार्थ निकेतन द्वारा इस क्षेत्र में अद्भुत कार्य किया जा रहा है, विभिन्न धर्मों के धर्मगुरूओं को एक मंच प्रदान कर लैंगिक असामनता जैसे विषयों के प्रति समाज को जागरूक करने के साथ ही इससे समुदाय और राष्ट्रीय स्तर पर पड़ने वाले प्रभावों के विषय में अवगत कराने तथा समाधान हेतु विभिन्न कार्यशालाओं का आयोजन किया जा रहा है।

ज्ञात हो कि महिलाओं पर होने वाली हिंसा को रोकने के लिये प्रतिवर्ष 25 नवंबर को विश्व भर में अंतर्राष्ट्रीय महिला हिंसा उन्मूलन दिवस मनाया जाता है। महिलाओं और लडकियों के खिलाफ हो रही हिंसा लिंग आधारित हिंसा है जिसके अन्तर्गत शारीरिक, मानसिक या यौन हिंसा सम्मिलित है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, प्रत्येक तीन में से एक महिला (अर्थात 35 प्रतिशत महिलाएं) शारीरिक हिंसा का सामना कर रही हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार, भारत में महिलाओं के खिलाफ हिंसा बलात्कार, दहेज हत्या, घरेलू हिंसा आदि के रूप में होती है। इस प्रकार की हिंसा के कारण लाखों महिलाएं प्रतिवर्ष प्रताड़ित होती हैं।
भारतीय संविधान के मौलिक अधिकारों से संबंधित अनुच्छेद 15(1) में राज्यों को आदेश दिया गया है कि केवल धर्म, मूलवंश, लिंग, जाति, जन्मस्थान के आधार पर कोई विभेद नहीं किया जाएगा। महिलाओं की सुरक्षा के लिये घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 पारित किया गया। महिलाओं के अधिकार और सुरक्षा के लिये कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 लाया गया परन्तु अब जरूरत है इस विषय में व्यापक स्तर पर समाज को जाग्रत करने की जिसके लिये सभी की एकजुटता आवश्यक है।
महिलाओं के खिलाफ हिंसा के उन्मूलन के लिए अंतर्राष्ट्रीय दिवस 2022 की थीम ‘यूनाइट’ रखी गयी है ताकि महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ हिंसा को समाप्त करने के लिए सभी एकजुट होकर प्रयत्न करें।

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