भोपाल : गिरीश गौतम ने आज कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनावों का अपना महत्व है, लेकिन चुनावों के दौरान मतदान में लोगों की रुचि कम होना चिंताजनक है और इस पर सभी को ध्यान देना होगा। गौतम ने राजस्थान की राजधानी जयपुर में अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन के दौरान अपने संबोधन में यह बात कही। सम्मेलन का उद्घाटन उप राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने किया और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला तथा अनेक महत्वपूर्ण हस्तियां इस अवसर पर मौजूद थीं।
मध्यप्रदेश विधानसभा सचिवालय की ओर से यहां मुहैया करायी गयी जानकारी के अनुसार सम्मेलन में निर्धारित कार्यसूची के अनुरूप विधानसभा अध्यक्ष गौतम ने संसद एवं विधान मंडलों को अधिक प्रभावी, उत्तरदायी एवं उत्पादकतायुक्त बनाने की आवश्यकता पर अपने विचार रखे। गौतम ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया में निर्वाचन के महत्व पर अपनी बात रखते हुए इस बात पर चिंता जाहिर की कि मतदान में लोगों की रुचि कम हो रही है और अपेक्षाकृत कम मतदान हो रहा है।
उन्होंने कहा कि 1952 में जब आम चुनाव हुआ, तो मतदाताओं की संख्या साढ़े 17 करोड़ थी, जबकि उस समय साढ़े दस करोड़ लोगों ने वोट डाला, जबकि उस समय साक्षरता का प्रतिशत बहुत कम था। लगभग 85 प्रतिशत आबादी निरक्षर थी। इस मतदान ने दुनिया को आश्चर्यचकित कर दिया था। लेकिन आज स्थिति क्या है। आज हमारे पास संचार के आधुनिक साधन हैं। कनेक्टिविटी है, सोशल साइट्स हैं, मोबाइल फोन हैं, हमारे पास निर्वाचन आयोग है, जो लगातार इस बात का प्रयास कर रहा है कि मतदान शत प्रतिशत की ओर बढ़े। इसके बाद भी लगभग 30 करोड़ लोग वोट डालने के लिए नहीं आते हैं। वर्ष 2019 में वोटिंग 67 प्रतिशत के आसपास रहा। शेष लगभग 33 प्रतिशत मतदाता वोट डालने क्यों नहीं आए।
गौतम ने सुझाव दिया कि यदि 50 प्रतिशत से कम मतदान हो, तो मतदान प्रक्रिया को पूर्ण नहीं माना जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह व्यवस्था बांग्लादेश में है। श्री गौतम ने कहा कि यदि हमें संसदीय प्रक्रिया को और हमारे लोकतंत्र को सर्वोच्च शिखर पर ले जाना है, तो अतीत के अनुभवों से सीखकर हमको नयी दिशा तय करनी पड़ेगी।
गौतम ने सम्मेलन में लोकसभा और विधानसभाओं के सत्रों की छोटी होती अवधि पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि सर्वमान्य सत्य यह है कि यदि हमारी विधानसभाएं और लोकसभा कम चलेंगी, तो हमारा ‘पावर’ कम होता चला जायेगा और शायद हम जनता के विश्वास को खोते जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह भी निर्धारित होना चाहिए कि वर्ष में न्यूनतम कितने दिन सदन की कार्यवाही संचालित होना चाहिए।
गौतम ने विधायकों के पर्याप्त प्रशिक्षण और उनकी सदन की कार्यवाही में लगातार उपस्थिति पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि आज देखने में यह आता है कि सदस्यों का विधायी ज्ञान कुछ कम होता जा रहा है। इसके पीछे यही कारण है कि उनका पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं हो रहा है और वे सदन की कार्यवाही में लगातार गंभीर होकर भाग नहीं ले रहे हैं।
इसके साथ ही समानांतर चल रहे विधायी निकायों के सचिवों के 59वें सम्मेलन में मध्यप्रदेश विधानसभा के प्रमुख सचिव ए. पी. सिंह ने सहभागिता की और मध्यप्रदेश विधानसभा सचिवालय की ओर से किए जा रहे नवाचार तथा प्रमुख कार्यों का ब्यौरा पेश किया। इस दो दिवसीय सम्मेलन में राज्य विधानसभा के अवर सचिव मोहनलाल मनवानी, अध्यक्ष के विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी (ओएसडी) एवं अवर सचिव नरेंद्र कुमार मिश्रा भी शामिल हो रहे हैं।
मतदान में लोगों की रुचि कम होना चिंताजनक
