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“भारतीय संस्कृति के ध्वजवाहक एवं युवाओं के प्रेरणा स्रोत स्वामी विवेकानंद” विषय पर संगोष्ठी का आयोजन

नई दिल्ली : दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी द्वारा राष्ट्रीय युवा दिवस के अवसर पर दिनांक 12 जनवरी 2023 को प्रातः 11.30बजे “भारतीय संस्कृति के ध्वजवाहक एवं युवाओं के प्रेरणा स्रोत स्वामी विवेकानंद” विषय पर संगोष्ठी का आयोजन केंद्रीय पुस्तकालय के गीतांजलि सभागार में किया गया । यह कार्यक्रम दिल्ली लाइब्रेरी बोर्ड के अध्यक्ष श्री सुभाष चंद्र कानखेड़िया की अध्यक्षता एवं महानिदेशक डॉ. आर. के. शर्मा के मार्गदर्शन में आयोजित किया गया । कार्यक्रम में वक्ता के रूप में साहित्यकार, पत्रकार, राष्ट्रवादी चिन्तक एवं इंद्रप्रस्थ साहित्य भारती के उपाध्यक्ष डॉ. विनोद बब्बर एवं पी.जी.डी.ए.वी. महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग से सहायक प्राध्यापक डॉ. चंद्र पाल सिंह उपस्थित रहे ।

दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी की सहायक पुस्तकालय एवं सूचना अधिकारी श्रीमती उर्मिला रौतेला द्वारा मंच संचालन किया गया । उन्होंने स्वामी विवेकानंद जी के बहुमूल्य व्यक्तित्व पर चर्चा करते हुए बताया कि स्वामी विवेकानंद ने भारत सहित विश्वभर में अध्यात्म, धर्म और मानवता का संदेश दिया ।

महानिदेशक डॉ. आर. के. शर्मा ने राष्ट्रीय युवा दिवस की सभी को शुभकामनाएं देते हुए सभागार में उपस्थित सभी गणमान्यजनों एवं श्रोताओं का कार्यक्रम में स्वागत किया । साथ ही, उन्होंने कार्यक्रम के वक्ताओं का सभी से परिचय करवाया। स्वामी विवेकानंद का पुस्तकालय से सम्बंधित एक वृतांत सभी से साझा करते हुए उनकी बौद्धिक क्षमता पर चर्चा की । स्वामी विवेकानंद ने सदैव ही एकाग्रता को ज्ञान अर्जन का मूल संसाधन बताया I

वक्ता डॉ. चंद्र पाल सिंह ने बताया कि 1985 से हम स्वामी विवेकानंद जी के जन्म दिवस को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मना रहे हैं । उन्होंने शहीद भगत सिंह एवं स्वामी विवेकानंद को युवाओं के लिए प्रेरणा स्रोत बताया । उन्होंनेआदि शंकराचार्य और स्वामी विवेकानंद के बीच की समानताओं पर चर्चा की । उन्होंने बताया कि जिस प्रकार आदि शंकराचार्य ने हमारे पौराणिक ग्रंथों वेद, वेदान्तों, उपनिषदों आदि धर्मग्रंथों पर समयानुकूल व्याख्या की उसी प्रकार स्वामी विवेकानंद ने इन ग्रंथों का अध्ययन कर उनकी समसामयिक समीक्षा एवं टीका प्रस्तुत की और भारत ही नहीं विश्व के लोगों को अत्यंत प्रभावित किया I

साथ ही वक्ता ने स्वामी विवेकानंद के बुद्धिमत्ता, तर्क शक्ति, बौद्धिक क्षमता, गरिमा, शालीनता युक्त व्यक्तित्व पर भी प्रकाश डाला । उन्होंने बताया कि स्वामी विवेकानंद के गुरु रामकृष्ण परमहंस ने ही नरेंद्रनाथ दत्त को स्वामी विवेकानंद बनाया इसलिए स्वामी विवेकानंद को समझने के लिए रामकृष्ण परमहंस को समझना जरूरी है । अत्यधिक पढ़े लिखे ना होने के बाद भी रामकृष्ण परमहंस विश्वभर के अध्यात्म के गूढ़ विद्वान थे । उन्होंने बताया प्रत्येक व्यक्ति में ईश्वर बसा हुआ है इसलिए जरूरतमंद की सेवा कर ईश्वर को प्राप्त करो ।

उन्होंने विवेकानंद की आध्यात्म यात्रा का भी विस्तार से वर्णन किया । उन्होंने बताया कि भारत की सनातन परंपरा का विश्व को बोध करवाने के उद्देश्य से विवेकानंद अमेरिका पहुंचे । 11 सितंबर 1893 में शिकागो में हुई विश्व धर्म संसद पर भी उन्होंने विस्तार से चर्चा करते हुए सभी से विवेकानंद के इस अवसर पर एकमात्र लिखित भाषण को अवश्य पढ़ने का आवाहन किया । ऐतिहासिक कालक्रम में विवेकानंद के भारत और विश्व के उत्थान हेतु योगदान पर उन्होंने विस्तृत चर्चा करते हुए अपने वक्तव्य के अंत में कहा कि जितने औचित्य पूर्ण मूल्य स्वामी विवेकानंद उस समय थे, आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं । आज के समय में जब युवा आत्म केंद्रित हो गया है ऐसे में स्वामी विवेकानंद को पढ़ना, समझना एवं उन्हें अपने अन्दर उतरना अति आवश्यक है ।

वक्ता डॉ. विनोद बब्बर ने बताया कि इस राष्ट्र के प्रत्येक युवा के हृदय में स्वामी विवेकानंद को जागृत करने के लिए राष्ट्रीय युवा दिवस मनाया जाता है । स्वामी विवेकानंद के व्यक्तित्व पर चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि वह प्रारंभ से ही तर्कशील थे । उन्होंने बताया कि स्वामी विवेकानंद ने विश्व में भारतीय दर्शन विशेषकर वेदांत और योग को प्रसारित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई । इसके अतिरिक्त स्वामी विवेकानंद ने जातिवाद, शिक्षा, राष्ट्रवाद, धर्म निरपेक्षतावाद, मानवतावाद पर अपने विचार प्रस्तुत किये । उन्होंने बताया कि खेतड़ी के महाराजा उनके अनुयायियों में से एक थे, उन्होंने ही स्वामी विवेकानंद के आनंदपूर्ण विवेक को देखते हुए उन्हें विवेकानंद नाम दिया था ।

स्वामी विवेकानंद मानवतावादी, सभी को साथ लेकर चलने में विश्वास रखने वाले दिव्यात्मा थे । डॉ. बब्बर ने स्वामी विवेकानंद के 1893 में शिकागो सम्मलेन में सम्मिलित होने एवं उनके भाषण से जुड़े वृतांतों को बड़ी सारगर्भित ढंग से श्रोताओं के समक्ष प्रस्तुत करते हुए बताया कि स्वामी विवेकानंद ने विश्व धर्म सम्मलेन में ही वैश्विक ख्याति अर्जित की तथा वेदान्त की पताका फहरायी I उनके माध्यम से ही भारतीय अध्यात्म का वैश्विक स्तर पर प्रचार-प्रसार हुआ और अध्यात्मवाद एवं भौतिकवाद के समन्वय से एक उन्नत भारत एवं विश्व के निर्माण की परिकल्पना उन्होंने प्रस्तुत की I इस अवसर पर वक्ता ने विवेकानंद जी के जीवन के कई रोचक और प्रेरक प्रसंग श्रोताओं से सांझा किये और कहा कि आज के दिन हम सभी को अपने भीतर स्वामी विवेकानंद को जीवित रखने का प्रण लेना चाहिए ।

अध्यक्ष सुभाष चंद्र कांखेड़िया ने कहा कि हमें दिन में कम से कम एक बार आत्म साक्षात्कार करना आवश्यक है । दूसरों को समझाने से पहले स्वयं को समझना जरूरी है । उन्होंने बताया कि शिकागो विश्व धर्म सम्मेलन का उद्देश्य पाश्चात्य धर्म की श्रेष्ठता का बखान करना था । परंतु हमें कूप मंडुक ना होकर दूसरे धर्मों का ज्ञान भी अर्जित करने की सीख देकर स्वामी विवेकानंद ने उस सम्मलेन में भारतीय दर्शन विशेषकर वेदांत और योग को विश्वभर में प्रसारित किया । उन्होंने युवाओं को अपने अतीत में अपने बड़ों द्वारा दी गई शिक्षा, भविष्य के लक्ष्य और वर्तमान स्थिति को देखते हुए कर्तव्य पथ पर चलने की सीख दी ।

अगर यह देश स्वामी विवेकानंद एवं स्वामी दयानंद सरस्वती की शिक्षा पद्धति को अपना लें, आत्मसाक्षात्कार करें तो निश्चित ही वह विश्व गुरु बनेगा । कार्यक्रम के अंत में, दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी की सहायक पुस्तकालय एवं सूचना अधिकारी श्रीमती उर्मिला रौतेला द्वारा सभी उपस्थित अतिथियों एवं श्रोताओं को धन्यवाद ज्ञापित करने के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ ।

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