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भदोही से सिमट रहा है कालीन कारोबार

भदोही : मूलभूत सुविधाओं के अभाव का हवाला देकर भदोही के कालीन कारोबारी देश के अन्य प्रांतो में पैर जमाने लगे हैं।
कभी कालीन का शत प्रतिशत निर्यात करने वाला यह जिले की पहचान अब मैन्युफैक्चरिंग हब की भी नहीं रही है। कारोबारियों का मानना है कि हालात इसी तरह बने रहे तो भदोही से कालीन का नामोनिशान मिट सकता है। कभी कहीं भी कालीन की चर्चा होती थी, तो भदोही जिले का नाम पहले आता था। आज से लगभग चार दशक पहले तक विभिन्न प्रकार के गलीचे भदोही में बनकर फीनिशिंग के बाद तैयार हो जाया करते थे। कालीनों का शत-प्रतिशत निर्माण भी यही से होता था।
कालीन कारोबारी का दर्द है कि जर्मनी, अमेरिका ,ब्रिटेन ,सऊदी अरब, हालैंड व पोलैंड सहित अन्य देशों के आयातक विदेशों से सीधी हवाई उड़ान होने के कारण जम्मू, आगरा, पानीपत व दिल्ली जैसे तमाम चकाचौंध वाले शहरों में उतरते हैं। जहां चमचमाती सड़कें व फाइव स्टार होटल जैसी अन्य सुविधाएं आसानी से मिल जाती हैं। विदेशी मेहमान दिन भर कालीन के सेंपल देखकर वापस वतन लौट जाते हैं। इससे उनके श्रम व समय दोनों की बचत होती है तो दूसरी तरफ भदोही में न सड़कें हैं, न तो अच्छे होटलों की व्यवस्था है।
भदोही आने वाले व्यापारियों को ठहरने के लिए लगभग 40 किलोमीटर दूर वाराणसी जाना पड़ता है। यही कारण है कि विदेशी कारोबारी भदोही आने से कतराते हैं। जिसका सीधा असर कालीनों के निर्यात पर पड़ता है। कालीन निर्यातक हाजी जलील अहमद अंसारी का कहना है कि ढांचागत सुविधाओं पर ध्यान न दिया गया तो लगभग 20 लाख लोगों को रोजगार देने वाला कालीन उद्योग पूरी तरह से सिमट जाएगा।

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