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फिर निकला विवादित नारे का जिन्न

इटावा : नब्बे के दशक में समाजवादी पार्टी(सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के गठबंधन के समय निकले एक विवादित ढांचे के सुर तीन दशक बाद फिर से सुनायी दिये हैं। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव की मौजूदगी में पार्टी के वरिष्ठ नेता स्वामी प्रसाद मौर्य रायबरेली में एक सभा में पुराना जिक्र करते हुए इस नारे को सुना डाला जिसके बाद स्वामी प्रसाद मौर्य के खिलाफ अपराधिक मामला दर्ज कर लिया गया है। अब मौर्य इस बाबत सफाई दे रहे हैं कि सरकार उन पर मेहरबान है तो फिर मुकदमा दर्ज होना स्वाभाविक है। उन्होंने तो 1993 में सपा बसपा गठबंधन के समय सबसे लोकप्रिय पुराने नारे का जिक्र किया है जिसमे कुछ भी गलत नही है।
प्रदेश की राजनीति में बदलाव लाने वाले इस नारे के सृजनकर्त्ता इटावा के बसपा नेता खादिम अब्बास थे। खादिम अब्बास आज भले ही बसपा की मुख्यधारा से ना जुड़े हों लेकिन वह कांशीराम की नीतियों से बहुत प्रभावित हैं। बसपा छोडऩे के बाद उनकी विचारधारा किसी और से नहीं मिल पायी इसलिए वह अब किसी भी दल का हिस्सा नहीं हैं। खादिम अब्बास विधानसभा से लेकर नगर निगम तक के कई दफा चुनाव लड़ चुके हैं। लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिली। खादिम कौमी तहफफुज्ज कमेटी के संयोजक भी हैं।
अब्बास बताते हैं कि इटावा में कांशीराम 1991 के उप चुनाव में उम्मीदवार थे। तब उनकी मुलायम ने मदद की थी। इसके एवज में कांशीराम ने बसपा का कोई भी प्रत्याशी मुलायम के खिलाफ जसवंतनगर विधानसभा से नहीं उतारा था। उपचुनाव में कांशीराम समेत कुल 48 प्रत्याशी मैदान में थे। इस चुनाव में कांशीराम को एक लाख 44 हजार 290 मत मिले थे। उन्होने बताया कि 1992 में मैनपुरी में एक सभा थी। इसमें कांशीराम और मुलायम को आना था लेकिन तब तक दोनों नेता नहीं पहुंचे थे। तब बोलने के लिए उन्हें मंच पर बुलाया गया। वह बताते हैं कि उनके मुंह से अचानक ‘ मिले मुलायम कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम’ का नारा निकल पड़ा। भीड़ ने वाह-वाही में तालियां बजायीं। नारे को दोहराने की मांग बढ़ती गयी। मंच से ही करीब 100 बार यह नारा अब्बास ने ही दोहराया। इसके बाद तो इतिहास बन गया। बाद में यह नारा पूरे देश में गूंजा। बाबरी विध्वंस की वजह से इस नारे के बाद राजनीतिक माहौल बन गया।
वर्ष 1991 में इटावा से जीत और उसके बाद बाबरी ध्वंस से यूपी का माहौल बदल गया। इस बीच मुलायम और कांशीराम के नारे के साथ प्रदेश में मुलायम और कांशीराम की जो जुगलबंदी शुरू हुई उसका लाभ 1995 में मुलायम सिंह यादव की सरकार के रूप में सामने आया। बाद में 2 जून 1995 को हुए गेस्ट हाउस कांड के बाद सपा-बसपा के बीच तकरार इस कदर बढ़ी कि दोनों दल एक दूसरे को खत्म करने पर आमादा हो गए।
वर्ष 2019 में सपा बसपा का संसदीय चुनाव के लिए गठबंधन किया गया जोर शोर से चुनाव भी लड़ा गया लेकिन नतीजा मन मुताबिक नही आया परिणाम स्वरूप सपा बसपा गठबंधन ठंडे बस्ते में चला गया। 2022 के विधानसभा चुनाव में बसपा के तमाम छोटे-बड़े नेताओं ने सपा की सदस्यता तो ग्रहण की। साथ ही सपा ने उन्हें चुनाव मैदान में उतरने का मौका दिया। कई प्रभावशाली कहे जाने वाले बसपा नेताओं को कामयाबी भी मिल गई जो आज समाजवादी पार्टी के प्रमुख नीतिकार और निर्णायक बने हुए है।

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