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सेंथिलबालाजी की गिरफ्तारी अवैध नहीं

ईडी को हिरासत में लेने का अधिकार

चेन्नई : के मंत्री वी सेंथिलबालाजी को बड़ा झटका देते हुए मद्रास उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को कहा कि उनकी गिरफ्तारी अवैध नहीं है और प्रवर्तन निदेशालय को उन्हें हिरासत में लेने का अधिकार है। गौरतलब है कि पिछले माह इसी तारीख को धनशोधण मामले में ईडी ने सेंथिलबालाजी गिरफ्तार किया था।
न्यायमूर्ति सीवी कार्तिकेयन, जो मंत्री की पत्नी द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर दो सदस्यीय पीठ द्वारा खंडित फैसला सुनाए जाने के बाद इसमें शामिल तीसरे न्यायाधीश हैं, ने कहा कि ईडी के पास उन्हें कथित नकदी के बदले नौकरी मामले में हिरासत में लेने का पर्याप्त अधिकार हैं।
न्यायमूर्ति डी भरत चक्रवर्ती के फैसले को बरकरार रखते हुए न्यायाधीश ने कहा कि ईडी ने सेंथिलबालाजी को गिरफ्तार किया, जो अब बिना विभाग के मंत्री हैं और कानूनी प्रावधानों के अनुसार 26 जुलाई तक न्यायिक हिरासत में हैं। न्यायमूर्ति कार्तिकेयन ने यह भी कहा कि इलाज की अवधि को न्यायिक हिरासत का हिस्सा नहीं माना जा सकता है।
मंत्री की पत्नी ने अपनी याचिका दायर कर कहा था कि उनके पति की गिरफ्तारी अवैध है और गिरफ्तारी किस आधार पर हुई उन्हें या उनके परिवार के सदस्यों को सूचित नहीं किया गया। उल्लेखनीय है कि प्रधान सत्र न्यायाधीश सुश्री एस. अल्ली ने 12 जुलाई को सेंथिलबालाजी की न्यायिक हिरासत 26 जुलाई तक बढ़ा दी थी, जो बाईपास सर्जरी के बाद अब तक एक निजी अस्पताल में स्वास्थ्य लाभ ले रहे थे।
मंत्री की 21 जून को शहर के कावेरी अस्पताल में बाईपास सर्जरी हुई थी, जहां उन्हें 15 जून को मद्रास उच्च न्यायालय के आदेश के बाद भर्ती किया गया था। मंत्री को उनके आधिकारिक आवास और राज्य सचिवालय में उनके चैंबर में 17 घंटे की छापेमारी के बाद ईडी ने 14 जून की सुबह गिरफ्तार किया था और 28 जून तक न्यायिक हिरासत में भेज दिया था।
पूछताछ के लिए ईडी कार्यालय ले जाते समय मंत्री ने सीने में दर्द की शिकायत की थी और उन्हें ओमनदुरार सरकारी मल्टी सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल में भर्ती किया गया, जहां एंजियोग्राफी में उनकी रक्त वाहिकाओं में तीन ब्लॉक का पता चला और डॉक्टरों ने जल्द से जल्द उन्हें बाईपास सर्जरी कराने की सलाह दी थी।
उनकी पत्नी ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर कर उन्हें कावेरी अस्पताल में स्थानांतरित करने मांग की थी, जहां उनका गिरफ्तारी से पहले नियमित रूप से इलाज चल रहा था, उच्च न्यायालय ने इसकी अनुमति दी, जिसके बाद उन्हें उनकी पसंद के अस्पताल में स्थानांतरित किया गया।
इस बीच, तमिलनाडु के राज्यपाल आर. एन. रवि ने मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन की सिफारिश पर सेंथिलबालाजी के विभागों को अन्य मंत्रियों को आवंटित कर दिया और राज्य मंत्रिमंडल में उनके बने रहने पर अपनी असहमति व्य्क्त की क्योंकि वह आपराधिक कार्यवाही का सामना कर रहे हैं। राज्य में विपक्षी दलों ने भी मांग की थी कि उन्हें मंत्रिमंडल से हटाना चाहिए। तमिलनाडु सरकार ने हालांकि, एक आदेश जारी कर कहा कि वह बिना विभाग के मंत्री बने रहेंगे।
बाद में, श्री रवि ने राज्यपाल के रूप में प्राप्त शक्तियों का उपयोग करते हुए उन्हें मंत्रिमंडल से बर्खास्त कर दिया और बाद में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की सलाह पर इसे स्थगित कर दिया, जिन्होंने उन्हें अटॉर्नी जनरल से सलाह लेने का सुझाव दिया। इसके बाद सत्तारूढ़ द्रमुक और राजभवन के बीच वाकयुद्ध शुरू हो गया, जो पहले से ही कई मुद्दों पर आमने-सामने थे।
उनकी सलाह के बिना मंत्री की बर्खास्तगी पर मुख्यमंत्री ने दलील दी कि राज्यपाल को इस तरह का निर्णय लेने का अधिकार नहीं है और यह मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार है कि कौन उनके मंत्रिमंडल में रहेगा और कौन नहीं।
इस बीच, मद्रास उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति जे निशा बानो और न्यायमूर्ति भरत चक्रवर्ती की पीठ ने चार जुलाई को मंत्री की पत्नी द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर खंडित फैसला सुनाया था। न्यायमूर्ति बानू ने कहा कि याचिका विचार योग्य है और ईडी पुलिस हिरासत मांगने की हकदार नहीं है, जबकि न्यायमूर्ति भरत चक्रवर्ती ने कहा कि बालाजी की गिरफ्तारी ईडी द्वारा अवैध नहीं है। इसके बाद इस मामले को तीसरे न्यायाधीश न्यायमूर्ति सी वी कार्तिकेयन के पास भेजा गया जिन्होंने आज कहा कि ईडी द्वारा मंत्री की गिरफ्तारी अवैध नहीं है।

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