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तीन महीने में बने मीडिया ब्रीफिंग नियमावली

नई दिल्ली : उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्रालय को निर्देश दिया कि वह लंबित आपराधिक जांच के मामलों में मीडिया के समक्ष खुलासे की प्रकृति के संबंधित एक नियमावली तीन महीने के अंदर तैयार करे। मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति पी एस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने एनजीओ पीयूसीएल और अन्य की जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कहा कि लंबित आपराधिक मामलों पर मीडिया ट्रायल न्याय प्रशासन को प्रभावित करता है।
पीठ ने कहा कि मीडिया ट्रायल पीड़ितों के साथ-साथ अभियुक्तों के हित को भी प्रभावित करता है। मीडिया ट्रायल का न होना पीड़ितों, आरोपियों और आम जनता के भी हित में है। शीर्ष अदालत ने सभी पुलिस महानिदेशकों (डीजीपी) को दिशानिर्देशों पर अपने सुझाव गृह मंत्रालय को देने का भी निर्देश दिया।
पीठ ने कहा, “केंद्र सरकार द्वारा दिशानिर्देश लगभग एक दशक पहले एक अप्रैल 2010 को तैयार किए गए थे। तब से न केवल प्रिंट मीडिया, बल्कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में भी अपराध की रिपोर्टिंग में वृद्धि हुई है। ऐसे में यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि एक संतुलन हो।” शीर्ष अदालत ने पुलिस अधिकारियों को संवेदनशील बनाने की जरूरत पर जोर दिया कि जांच के विवरण किस स्तर पर सामने आ सकते हैं। यह तय करने की जरूरत है।

पीठ ने कहा कि मीडिया को बयान के दौरान पुलिस द्वारा किया गया खुलासा वस्तुनिष्ठ प्रकृति का होना चाहिए, न कि व्यक्तिपरक। पीठ ने कहा कि मीडिया ट्रायल एक महत्वपूर्ण मुद्दा है, क्योंकि इसमें पीड़ितों के हित और मामले में एकत्र किए गए सबूत शामिल हैं। एनजीओ पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) और अन्य द्वारा दायर याचिकाओं में आपराधिक मामलों के मीडिया कवरेज के लिए दिशानिर्देश जारी करने की गुहार लगाई गई थी।

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