भदोही : काशी-प्रयाग के मध्य स्थित भदोही जिले का अपना एक अलग पौराणिक महत्त्व रहा है। कभी काशी राज्य का अभिन्न अंग रहे भदोही के ऐतिहासिक शिव मंदिरों के ,काशी विश्वनाथ धाम से जुड़ाव के अपने अलग महामात्य हैं। अवधूत भगवान शिवशंकर भोले दानी के त्रिशूल पर बसी काशी नगरी को सनातन धर्म के तीर्थस्थलों में महत्वपूर्ण दर्जा प्राप्त है। जहां विराजमान बाबा काशी विश्वनाथ के दर्शन पूजन के लिए देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं। बताया जाता है कि भदोही के शिवालयों में स्थापित शिवलिंगों के जलाभिषेक के बिना काशी की यात्रा अधूरी मानी जाती है।
पंडित आलोक शास्त्री बताते हैं कि श्रावण मास में वाराणसी के जन्सा होते हुए रामेश्वर व त्रिलोचन महादेव जैसे प्रमुख मंदिरों की पैदल यात्रा का विधान है, जिसे काशी क्षेत्र में पंचकोशी यात्रा कहा जाता है, जहां सावन माह में महिलाएं घर परिवार त्याग कर साप्ताहिक पंचक्रोशी यात्रा पर निकलती हैं। पंचक्रोशी यात्रा की समाप्ति पर बाबा विश्वनाथ के जलाभिषेक का प्रावधान है।
बताया जाता है कि काशी विश्वनाथ के जलाभिषेक के साथ पंचक्रोशी यात्रा की तर्ज पर भदोही जिले में स्थित बाबा संगोनाथ धाम, सुंदरवन स्थित शिव मंदिर, कबूतर नाथ, गोपेश्वर महादेव, सिद्धेश्वर महादेव, मनकामेश्वर महादेव, जोगी वीर जागेश्वर महादेव, तिलेश्वर नाथ धाम, पांडव नाथ, स्वामी बड़ा महादेव शिव मंदिर, धनेश्वर महादेव व कमलेश्वर महादेव मंदिर के दर्शन पूजन का विधान है, जहां श्रावण मास भर प्रयागराज से काशी यात्रा के दौरान कांवडिए पहुंच कर जलाभिषेक करते हैं।
बदले परिवेश में सन् 1990 के दशक में भदोही को बनारस से अलग कर नया जिला बना दिया गया। बनारस जिले का विभाजन कर भले ही भदोही को काशी के दिल से प्रशासनिक स्तर पर अलग कर दिया गया, लेकिन आध्यात्मिक रूप से भदोही के दर्जनभर शिव मंदिर काशी विश्वनाथ से जुड़ाव रखते हैं। मान्यता है कि इन मंदिरों की यात्रा के बाद काशी विश्वनाथ का दर्शन पूजन आध्यात्मिक यात्रा का अंतिम पड़ाव होता है।
भदोही का है अपना अलग ही पौराणिक महत्व
