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कोयला, लिग्नाइट सरकारी कंपनियों ने पिछले पांच साल में 2.35 करोड़ पौधे लगाए

नई दिल्ली : कोयला/लिग्नाइट का उत्खनन और विपण्न करने वाले सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) ने पिछले पांच साल में 10,784 हेक्टेयर से अधिक खनन क्षेत्र में दो करोड़ 35 लाख पौधे लगाए हैं।
देश में कोयला मंत्रालय के मार्गदर्शन और निगरानी में इन उपक्रमों द्वारा चलाये जा रहे हरियाली अभियान से देश में कार्बन सिंक क्षेत्र का विस्तार हुआ है। प्राकृतिक या कृत्रिम प्रक्रियाओं के माध्यम से वातावरण में उत्सर्जित होने वाले अधिक कार्बन को अवशोषित करने वाले स्थान या उत्पाद को कार्बन सिंक कहा जाता है। इन उपक्रमों ने इस अभियान के जरिये सम्बंधित इलाकों में 10 साल में सघन वन विकसित करने का लक्ष्य रखा है।
कोयला मंत्रालय की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि कोयला और लिग्नाइट क्षेत्र के ये सरकारी उपक्रम देश की ऊर्जा की मांगों को पूरा करने के लिए न केवल खनिज ईंधन का उत्पादन बढ़ा रहे हैं, बल्कि खनन क्षेत्रों में पर्यावरण संरक्षण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को भी पूरा कर रहे हैं।
कोयला/लिग्नाइट पीएसयू द्वारा विभिन्न स्थलों पर देशी प्रजातियों के साथ व्यापक वृक्षारोपण कार्यक्रम चलाए जाते हैं, जिनमें ओवरबर्डन डंप, ढुलाई सड़कें, खदान परिधि, आवासीय कॉलोनियां और पट्टा क्षेत्र के बाहर उपलब्ध भूमि शामिल हैं।
वृक्षारोपण कार्यक्रम में छाया देने वाले पेड़, वानिकी उद्देश्यों के लिए प्रजातियां, औषधीय और हर्बल पौधे (नीम, करंज, आंवला, अर्जुन), फलदार पेड़ (जामुन, इमली, गंगा इमली, बेल, आम, सीताफल), इमारती लकड़ी वाले पेड़ (साल, सागौन, शिवन , घमर, सिस्सू, काला सिरस, सफेद सिरस, बांस, पेल्टोफोरम, बबूल) और सजावटी/एवेन्यू (गुलमोहर, कचनार, अमलतास, पीपल, झारुल) पौधे शामिल हैं। औषधीय पौधों के साथ-साथ फल देने वाली प्रजातियां न केवल जैव विविधता संरक्षण में योगदान देती हैं बल्कि स्थानीय समुदायों को अतिरिक्त सामाजिक-आर्थिक लाभ भी प्रदान करती हैं। इसके अलावा, राज्य के वन विभागों और निगमों के साथ घनिष्ठ सहयोग से वृक्षारोपण के लिए सबसे उपयुक्त प्रजातियों का चयन किया जाता है।
उल्लेखनीय है कि कोयला/लिग्नाइट सार्वजनिक उपक्रमों ने अपने उपयुक्त कमांड क्षेत्रों में मियावाकी वृक्षारोपण पद्धति को अपनाया है। मियावाकी तकनीक वनीकरण और पारिस्थितिक बहाली के लिए एक विशिष्ट दृष्टिकोण है, जिसकी शुरुआत जापानी वनस्पतिशास्त्री डॉ. अकीरा मियावाकी ने की थी। इसका प्राथमिक लक्ष्य एक सीमित क्षेत्र में हरियाली को बढ़ाना है।
मियावाकी तकनीक के कार्यान्वयन में प्रति वर्ग मीटर दो से चार प्रकार के देशी पेड़ लगाना शामिल है। चयनित पौधों की प्रजातियाँ काफी हद तक आत्मनिर्भर हैं, जिससे निषेचन और पानी जैसे नियमित रखरखाव की आवश्यकता नहीं होती है।
इस पद्धति के अनुसार, पेड़ पारंपरिक तरीकों की तुलना में बहुत तेजी से विकास दर प्रदर्शित करते हैं और बढ़े हुए कार्बन सिंक के निर्माण में योगदान करते हैं। वृक्षारोपण पहल न केवल खनन गतिविधियों के पारिस्थितिक प्रभाव को कम करती है बल्कि जैव विविधता की बहाली, पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं को बढ़ाने, कार्बन सिंक बनाने, स्थानीय समुदायों के लिए आजीविका के अवसर प्रदान करने और सतत विकास को बढ़ावा देने में भी योगदान देती है।

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