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कांग्रेस, भाजपा को कभी खुशी कभी गम की सौगात देती रही बिलासपुर लोस सीट

बिलासपुर : देश की आजादी के बाद अब तलक संपन्न 17 आम चुनावों में बिलासपुर लोकसभा सीट प्रमुख प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक दल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को कभी खुशी तो कभी गम की सौगात देता रहा है। अविभाजित मध्य प्रदेश और राज्य पुनर्गठन के बाद बने छत्तीसगढ़ की हाई-प्रोफाइल बिलासपुर लोकसभा सीट समय-समय पर सामान्य और सुरक्षित दोनों ही श्रेणियों में आरक्षित भी होता रहा।

अतीत के झरोंखों में देखा जाए तो बिलासपुर का चुनावी इतिहास बहुत दिलचस्प नजर आता है। बीते 17 आम चुनावों में भाजपा ने सबसे अधिक आठ बार जीत का स्वाद चखा है जबकि कांग्रेस ने सात बार जीत हासिल की है। वहीं एक बार जीत का श्रेय निर्दलीय उम्मीदवार के खाते में गया तथा एक दफा भारतीय लोकदल ने चुनाव जीता।
पिछले 27 सालों के दरम्यान लगातार आठ चुनावों में विजयपताका लहरा रही भाजपा ने जीत का सिलसिला बरकरार रखने के लिए 2024 के आसन्न लोकसभा चुनाव में बिलासपुर सीट से भाजपा ने तोखन साहू को चुनाव मैदान में उतारा है। वहीं कांग्रेस ने गत विधानसभा चुनाव में भिलाई नगर से निर्वाचित विधायक देवेंद्र सिंह यादव को अपना उम्मीदवार बनाया है। यहां इन दोनों ही पार्टियों के बीच सीधी टक्कर की स्थिति है जबकि अन्य दलो ने अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं।
करीब 400 वर्ष पुराने तथा किवदंतियों के मुताबिक एक खूबसूरत मछुआरन ‘बिलासा’ के नाम पर बना बिलासपुर अपने भीतर कई विभिन्न विशिष्टताओं को समेटे हुए हैं। वर्ष 2000 तक बिलासपुर लोकसभा क्षेत्र मध्य प्रदेश का हिस्सा था।
बिलासपुर लोकसभा का पहला आम चुनाव 1951 में हुआ और कांग्रेस के रेशमलाल जांगड़े पहले सांसद निर्वाचित हुए। श्री जांगड़े ने 1957 के आम चुनाव में अपनी जीत दोहराई। इसके बाद 1962 के चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार रूप से आश्चर्यजनक रूप से चुनावी फतह हासिल , हालांकि उन्हें कांग्रेस ने अपना समर्थन दिया था और इसे कांग्रेस ने अपनी जीत मानी।
वर्ष 1967 के लोकसभा चुनाव में बिलासपुर सीट से कांग्रेस का विजय-रथ फिर चल पड़ा और उसके उम्मीदवार अमर सिंह विजयी हुए। कांग्रेस की जीत का सिलसिला जारी रहा और 1971 के चुनाव में कांग्रेस के राम गोपाल तिवारी ने जीत का परचम लहाराया। देश में आपातकाल के बाद वर्ष 1977 में हुए चुनाव में कांग्रेस के विजयरथ को भारतीय लोकदल ने रोक दिया और उसके उम्मीदवार निरंजन प्रसाद केशरवानी ने फतह हासिल की। वर्ष 1980 के आम चुनाव आने तक कांग्रेस के दो हिस्से हो गये। इस चुनाव में कांग्रेस (आई) के गोदिल प्रसाद अनुरागी ने विजयश्री हासिल की। इसके बाद 1984 में कांग्रेस के खेलनराम जांगड़े ने चुनाव जीतकर पार्टी का वर्चस्व कायम रखा।
वर्ष 1989 का आम चुनाव भाजपा के लिए बदलाव लेकर आया। सबसे पहले आम चुनाव और उसके बाद दूसरे चुनाव में भी कांग्रेस से विजयी उम्मीदवार रहे रेशमलाल जांगड़े बदली परिस्थिति में भाजपा के खेमे में आ चुके थे और 1989 के चुनाव में वह भाजपा की टिकट पर चुनावी जीत कन्फर्म करवाकर एक बार फिर राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली पहुंचे। चुनाव की बिसात पर कांग्रेस और भाजपा के बीच जीत-हार की की सांप-सीढ़ी का खेल चलता रहा । वर्ष 1991 में कांग्रेस का सिक्का एक बार फिर चमका और पार्टी ने 1984 वाली शानदार जीत की यादें ताजा कर दी।
लोकसभा चुनाव में बिलासपुर सीट से दूसरी बार जीत के लिए छटपटा रही भाजपा ने 1996 के चुनाव में जबरदस्त प्रदर्शन किया और कांग्रेस से यह सीट छीन ली। यही वह दौर था जिसके बाद भाजपा ने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा और 1998 और 1999 में लगातार जीत हासिल की।
एक नवम्बर 2000 को पृथक छत्तीसगढ़ राज्य का अभ्युदय हुआ। संस्कृति और भाईचारा को लेकर संस्कारधानी कहलाने वाले बिलासपुर में प्रदेश के नये उच्च न्यायालय ( देश का सबसे बड़ा उच्च न्यायालय भवन) की स्थापना के बाद इसे ‘न्यायधानी’ की भी संज्ञा दी जाती है। छत्तीसगढ़ के अलग राज्य बनने के बाद 2004 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने अपना कब्जा बरकरार रखा। लगातार हार की पराजय से जूझ रही कांग्रेस ने 2009 के संसदीय चुनाव में नयी रणनीति के तहत पहली बार महिला उम्मीदवार को चुनाव मैदान में उतारने का फैसला किया और छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी की पत्नी श्रीमती रेणु जोगी को पार्टी की टिकट दी। भाजपा ने इस मौके पर अलग दांव खेला और जशपुर क्षेत्र के दिलीप सिंह जूदेव की लोकप्रियता को देखते हुए बिलासपुर लोकसभा के चुनावी समर में उतारा और कांग्रेस की रणनीति को भेदने में सफल भी रही।
वर्ष 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस महिला उम्मीदवार को चुनाव मैदान पर खड़ा करने की रणनीति पर कायम रहने के साथ ही पार्टी ने एक और दांव खेला । अंतरविरोधों के चलते भाजपा का दामन झटककर कांग्रेस में शामिल हुई पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी की भतीजी करूणा शुक्ला को कांग्रेस ने अपना उम्मीदवार बनाया। इसके बावजूद कांग्रेस की यह रणनीति कारगर साबित नहीं हुई जबकि भाजपा ने बिलासपुर के लिए नितांत अनजान रहे लखन साहू पर दांव आजमाया। भाजपा की चुनावी व्यूहकौशल और रणनीति का ही परिणाम रहा कि श्री साहू चुनाव जीत गये।
बिलासपुर लोकसभा क्षेत्र के मतदाताओं में कुर्मी , साहू समुदाय की संख्या सर्वाधिक है जबकि अन्य पिछड़ा वर्ग में यादव समुदाय के लोगों की तादाद सबसे अधिक है। भाजपा ने जातीय समीकरण की रणनीति को कायम रखते हुए 2019 के आम चुनाव में आरएसएस से जुड़े अरूण साव को चुनाव मैदान में उतारा था। वहीं कांग्रेस ने युवा चेहरे अटल श्रीवास्तव पर दांव लगाया , लेकिन यह दांव जीत में नहीं बदल सकी और श्री साव ने यहां भाजपा की जीत का परचम लहराना जारी रखा।
विश्व में सर्वाधिक मनोकामना ज्योति प्रज्वलित करने के लिए विख्यात दैवीय आस्था का केंद्र देवी महामाया मंदिर और देश में रेलों के जरिए सर्वाधिक माल लदान का राजस्व अर्जित करने वाला साउथ ईस्ट सेंट्रल रेलवे जोन मुख्यालय तथा कोयला उत्पादन में रिकार्ड-दर-रिकार्ड बनाने वाला साउथ ईस्टर्न कोल फील्ड लिमिटेड मुख्यालय वाले बिलासपुर संसदीय क्षेत्र में आठ विधानसभा सीटें हैं। इनमें छह सीटों बिलासपुर, तखतपुर, बिल्हा,बेलतरा , लोरमी और मुंगेली में भाजपा का कब्जा है जबकि कोटा एवं मस्तूरी(सु) सीट कांग्रेस के कब्जे में है।

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