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प्राकृतिक कृषि से जुड़ना समय की मांग है

गांधीनगर : आचार्य देवव्रत ने मंगलवार को यहां कहा कि वर्तमान समय में प्राकृतिक कृषि के साथ जुड़ना समय की मांग है।
देवव्रत ने आगे कहा कि बढ़तें जा रहे ग्लोबल वार्मिंग के नकारात्मक प्रभाव, घटते जा रहे कृषि उत्पादन और स्वास्थ्यप्रद जीवन के लिए प्राकृतिक खेती ही एकमात्र प्रभावी उपाय है। गांधीनगर राजभवन में प्राकृतिक कृषि विषय पर आयोजित परिसंवाद में उपस्थित विभिन्न समाचार माध्यमों के सम्पादकों, प्रतिनिधियों को आज उन्होंने सम्बोधित करते हुए प्राकृतिक कृषि पद्धति को विस्तार से समझाया।
उन्होंने देश में हुई हरित क्रांति का उल्लेख करते हुए कहा कि लगभग 60 के दशक में हुए अभ्यास के मुताबिक भारत की जमीन में दो से ढाई फीसदी कार्बन था, जो बेहतरीन उर्वरकता का कारण था। उस समयकाल की आवश्यकता के युरिया सहित रासायनिक खादों का उपयोग किया जाता था, जो आज भी चल रहा है। इसके कारण आज कार्बन का प्रमाण 0.5 से भी कम रह गया है और इसके चलते जमीन की उर्वरकता घट गई है। जमीन, हवा और पानी प्रदूषित हो गये हैं और विभिन्न रोगों के प्रमाण बढ़ रहे हैं।
इन सभी समस्याओं के निराकरण के लिए प्राकृतिक कृषि पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि रासायनिक खेती के उपाय के तौर पर जैविक खेती का विकल्प आया। परंतु जैविक खेती से भी मेहनत और खर्च घटता नहीं है। इतना ही नहीं, उल्टा उपज घट जाती है और पर्यावरण को भी नुकसान होता है।
राज्यपाल ने कहा कि जंगल के वृक्षों को कुदरती तौर पर पोषण मिलता है और वहां किसी भी प्रकार की खाद के बिना फल अपने-आप आ जाते हैं। उसी तरह, प्राकृतिक खेती में भी जीवामृत और घनजीवामृत आधारित कुदरती पद्धतियों द्वारा खेती पोषक तो बनती ही है, साथ ही किसानों का खर्च भी शून्य हो जाता है।
उन्होंने युनेस्को की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि अगर रासायनिक खाद का उपयोग अब घटाया नहीं गया तो आगामी 40-50 वर्ष में ग्लोबल वार्मिंग की समस्या के कारण जमीन बिल्कुल बंजर और अनुपजाऊ बन जाएगी। विदेशों से मंगवाए जाने वाले युरिया और अन्य रासायनिक खादों में देश का धन खर्च होता है जबकि प्राकृतिक खेती से जमीन में पोषक तत्व भी जमीन में ही बने रहते हैं। बरसाती पानी भी जमीन में उतरने के कारण जमीन का जल स्तर भी ऊपर आएगा।
श्री देवव्रत ने कहा कि देशी गाय के एक ग्राम गोबर में 300 करोड़ जीवाणु होते हैं। देशी गाय के गोबर और गौ-मूत्र आधारित प्राकृतिक खेती में प्रथम वर्ष से ही पूरा उत्पादन मिलता है। प्राकृतिक खेती पद्धति में किसान का खर्च शून्य हो जाता है और इसी से प्रधानमंत्री के किसानों की आय दोगुनी करने का संकल्प पूरा किया जा सकता है। उन्होंने केंचुआ आधारित कुदरती खाद बनाने की विधि, जीवामृत, घनजीवामृत और आच्छादन की भी विस्तृत जानकारी दी।
गुजरात में प्राकृतिक खेती अपनाने वाले किसानों की संख्या में हुई वृद्धि की जानकारी देते हुए उन्होंने कहा कि पिछले चार वर्षों के दौरान राज्य में 7.13 लाख किसानों ने प्राकृतिक खेती अपनायी है। सिर्फ पिछले तीन माह में ही 10.39 लाख किसानों को प्राकृतिक खेती की तालीम दी गई है। आजादी का अमृत महोत्सव के अनुसंधान में आयोजित किसान सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेन्द्रभाई मोदी ने आह्वान किया था कि देश की प्रत्येक ग्राम पंचायत में कम से कम 75 किसान प्राकृतिक खेती करें। परिणामस्वरूप आज गुजरात की 5233 ग्राम पंचायतों में 75 अथवा इससे ज्यादा किसान प्राकृतिक खेती कर रहे हैं। इसमें अन्य 3679 ग्राम पंचायतें आगामी एकाध माह में ही शामिल होने की सम्भावना है।
राज्यपाल ने कहा कि यह एक सामूहिक प्रयास है। उन्होंने प्राकृतिक कृषि नवजागरण के इस कार्य में शामिल होकर राज्य के किसानों और सामान्य नागरिकों में प्राकृतिक खेती संबंधी जागरूकता लाने की सभी मीडिया माध्यमों से अपील की। कार्यक्रम में राज्यपालश्री के अग्र सचिव राजेश मांजु, मुख्यमंत्री की सचिव सुश्री अवंतिका सिंघ, सूचना निदेशक धीरज पारेख, ‘आत्मा’ प्रोजेक्ट के विशेष अधिकारी दिनेश पटेल, विभिन्न प्रिंट, इलेक्ट्रिक, रेडियो माध्यमों के प्रतिनिधिगण, सरकारी माध्यमों के सम्पादक एवं प्रतिनिधि उपस्थित थे। विभिन्न जिलों में से भी भारी संख्या में पत्रकार वीडियो कांफ्रेंस के माध्यम से शामिल हुए।

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