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बंगाली शरणार्थियों के मामले में न्यायालय ने केंद्र से मांगा जवाब

नैनीताल : उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने नमो शूद्र बंगाली शरणार्थियों को अनुसूचित जाति का दर्जा मिलने के बावजूद योजनाओं का लाभ नहीं दिये जाने के मामले में केन्द्र सरकार से दो सप्ताह में जवाब देने को कहा है। इस मामले में सितारगंज (ऊधम सिंह नगर) के सामाजिक कार्यकर्ता निखिलेश घरामी की ओर से याचिका दायर की गयी है। सुनवाई मुख्य न्यायाधीश रितु बाहरी और न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल की युगलपीठ में हुई।
याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि केन्द्र सरकार की ओर से 1962, 1964 और 1970 में तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (बंगाल) से आये शरणार्थियों को उस समय के उत्तर प्रदेश के नैनीताल (अब के ऊधमसिंह नगर) जिले में शरण दी गयी थी। उप्र सरकार की ओर से उन्हें भूमि भी उपलब्ध करायी गयी। इन शरणार्थिर्यों को नमो शूद्र कहा और उन्हें नमो शूद्र, पौंड और माझी के रूप में वर्गीकृत किया गया। केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने भी 1962 में इन शरणार्थियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने की सिफारिश कर दी।
इसके बाद इन शरणार्थियों को नैनीताल जिले के तत्कालीन अधिकारियों ने अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र जारी कर दिया। इसके साथ ही 16 सितम्बर, 1989 में तत्कालीन उप्र हरिजन एवं समाज कल्याण विभाग ने शरणार्थियों के बच्चों को भी छात्रवृत्ति का लाभ दे दिया।
याचिकाकर्ता की ओर से आगे कहा गया कि इसके बावजूद उन्हें अनुसूचित जाति का दर्जा नहीं मिल पाया है। उन्हें अनुसूचित जाति को मिलने वाली योजनाओं का लाभ नहीं दिया जा रहा है। याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि वर्ष 2021 में उन्होंने इस संबंध में प्रत्यावेदन सक्षम अधिकारियों को दिया है लेकिन अभी तक कोई लाभ नहीं हुआ है।
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि नैनीताल-ऊधमसिंह नगर के लोकसभा सांसद और केन्द्रीय मंत्री अजय भट्ट ने भी वर्ष 2019 में संसद में नमो शूद्र समुदाय के लोगों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने की मांग की। उन्होंने शून्यकाल में उठाये गये प्रश्न में कहा कि 1.60 लाख नमो शूद्र समुदाय के लोग उत्तराखंड के विभिन्न जिलों में रहते हैं और उन्हें योजनाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है।

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