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किसानों ने अपनायी प्राकृतिक कृषि

गांधीनगर : आचार्य देवव्रत ने मंगलवार को कहा कि मई 2023 तक पांच लाख 37 हजार किसानों ने प्राकृतिक कृषि पद्धति अपनायी है। प्राकृतिक कृषि के लिए लगातार प्रयासरत देवव्रत ने राजभवन में आयोजित समीक्षा बैठक में कृषि विभाग और ‘आत्मा’ के अधिकारियों के साथ गुजरात में प्राकृतिक खेती की स्थिति पर समीक्षा की और कहा कि राज्य सरकार द्वारा किसानों को उनके घर पर जाकर प्राकृतिक कृषि पद्धति की तालीम दी जा रही है। उन्होंने कहा कि इस खरीफ सीजन में ज्यादा से ज्यादा किसान प्राकृतिक कृषि अपनाएं और मिलकर गुजरात को जहरमुक्त करने की क्रांति करें।
राज्यपाल ने इस समीक्षा बैठक में कहा कि प्राकृतिक खेती के लिए देशी गाय अनिवार्य है। इसके लिए चार- पांच किसान मिलकर देशी गाय रखें। राज्य के पांजरापोल और गौशालाएं भी अच्छी गुणवत्तापूर्ण जीवामृत और घनजीवामृत पर्याप्त प्रमाण में तैयार कर किसानों को उपलब्ध करवाएं तो यह काफी सहायक सिद्ध होगा। तालीम ले रहे किसान प्राकृतिक कृषि के मॉडल फार्म बनाएं और ज्यादा से ज्यादा किसानों को प्रेक्टिकल तालीम दी जाए। यह सुझाव देते हुए उन्होंने कहा कि प्राकृतिक कृषि उत्पादों की बिक्री के लिए राज्य में 185 अस्थायी बाजार और 24 स्थायी बाजारों की व्यवस्था की गई है। प्राकृतिक कृषि उत्पादों की बिक्री व्यवस्था को और ज्यादा सुदृढ़ करने पर भी उन्होंने बल दिया।
उन्होंने कहा कि मई 2023 से समग्र गुजरात में 10-10 गांवों के क्लस्टर्स बनाकर किसानों को प्राकृतिक खेती कर रहे विशेषज्ञ किसानों द्वारा घर पर ही तालीम दी जा रही है। बिल्कुल कम खर्च पर प्रभावी तालीम देने के अभियान से बेहतर परिणाम प्राप्त हुए हैं। मात्र मई माह में इसी तरह 4 लाख, 26 हजार किसानों ने प्राकृतिक खेती की तालीम ली है। अब तक राज्य में 17 लाख 71 हजार किसानों को राज्य सरकार द्वारा प्राकृतिक खेती की नि:शुल्क तालीम दी गई है। गुजरात विद्यापीठ के रांधेजा-गांधीनगर, देथली और अंभेटी-वलसाड सहित मुन्द्रा-कच्छ और सणोसरा-भावनगर के कृषि विज्ञान केन्द्रों में प्राकृतिक कृषि की तालीम देने के लिए किसान मास्टर ट्रेनर और कृषि विभाग- आत्मा के टेक्नीकल मास्टर्स ट्रेनर्स को तालीम दी जा रही है। मई 2023 तक 16,274 किसानों को टेक्नीकल मास्टर ट्रेनर्स को तालीम दी गई।
बैठक में कृषि, किसान कल्याण और सहकारिता विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव ए.के. राकेश, राज्यपाल के अग्र सचिव राजेश मांजु, ‘आत्मा’ के विशेष कार्य अधिकारी दिनेश पटेल, गुजरात एग्रो इंडस्ट्रीज कॉर्पोरेशन के मैनेजिंग डिरेक्टर डी.एच. शाह, कृषि निदेशक एस.जे. सोलंकी, आत्मा के निदेशक श्री प्रकाश रबारी, वरिष्ठ अधिकारी और किसान अग्रणी उपस्थित रहे।
उल्लेखनीय है कि हिमाचल प्रदेश में अब तक 99.8 प्रतिशत पंचायतों में प्राकृतिक कृषि पद्धति अपना ली है। आचार्य देवव्रत गुजरात से पहले हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल थे। तब उन्होंने वहां किसानों को प्राकृतिक कृषि अपनाने का जनजागृति अभियान चलाया था।
एकेडमी ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज, लखनऊ और राष्ट्रीय कृषि विस्तार प्रबंधन संस्थान हैदराबाद की हाल ही की एक सर्वेक्षण रिपोर्ट में कहा गया है कि प्राकृतिक कृषि अपनाने से हिमाचल प्रदेश के किसानों के कृषि उत्पादन खर्च में 36 प्रतिशत की कमी आई है और उत्पादन आठ प्रतिशत बढ़ गया है। किसानों को रासायनिक कृषि की तुलना में 28.6 प्रतिशत ज्यादा लाभ हो रहा है। साथ ही 75 प्रतिशत किसान रासायनिक खेती की तुलना में प्राकृतिक खेती को महत्व दे रहे हैं।
हिमाचल प्रदेश में बागायती खेती में फल उत्पादन करने वाले किसानों का प्राकृतिक खेती से 21.44 प्रतिशत शुद्ध लाभ बढ़ा है। उत्पादन खर्च में भी 13.34 प्रतिशत से लेकर 45.55 प्रतिशत जितनी कमी आई है। फलों का स्वाद तो बेहतर हुआ ही है, साथ ही उत्पादन भी बढ़ा है। नीति आयोग ने भी देशभर में प्राकृतिक कृषि का दायरा बढ़ाने के लिए हिमाचल प्रदेश के मॉडल को आधार बनाया है। भारत में गुजरात के साथ ही, हरियाणा, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश भी बड़े पैमाने पर प्राकृतिक कृषि पद्धति अपना रहे हैं।

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