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बेटियों-महिलाओं के मन में डर राष्ट्रीय चिंता का विषय: धनखड़

नई दिल्ली : जगदीप धनखड़ ने राष्ट्रपति के “बस बहुत हुआ” के आह्वान को आत्मसात करने की अपील करते हुए कहा है कि समान आचार संहिता महिलाओं के लिए न्याय का एक उपाय होगा।
श्री धनखड़ ने शुकवार को दिल्ली विश्वविद्यालय भारती महिला महाविद्यालय में “विकसित भारत में महिलाओं की भूमिका” विषय पर छात्रों और शिक्षकों को संबोधित करते हुए कहा कि बेटियों और महिलाओं के मन में डर एक राष्ट्रीय चिंता का विषय है। उन्होंने कहा, “जहां महिलाएं और लड़कियां सुरक्षित नहीं महसूस करतीं, वह समाज सभ्य नहीं है। वह लोकतंत्र भी धूमिल हो जाता है। यह हमारे विकास के लिए सबसे बड़ी बाधा है।” उन्होंने वित्तीय स्वतंत्रता की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि महिलाओं को वित्तीय रूप से स्वतंत्र बनना चाहिए। यह ऊर्जा और क्षमता को उजागर करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
उन्होंने कहा, “लड़कियां हमारे देश के विकास में सबसे महत्वपूर्ण हिस्सेदार हैं। वे ग्रामीण अर्थव्यवस्था, कृषि अर्थव्यवस्था और अनौपचारिक अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। लिंग आधारित असमानताओं को समाप्त करने की आवश्यकता पर जोर देते हुए, उपराष्ट्रपति ने कहा, “क्या हम कह सकते हैं कि आज लिंग आधारित असमानता नहीं है? समान योग्यता के बावजूद भिन्न वेतन, बेहतर योग्यता के बावजूद समान अवसर नहीं। यह मानसिकता बदलनी चाहिए। पारिस्थितिकी तंत्र को समान होना चाहिए, असमानताएं समाप्त होनी चाहिए।”
उच्चतम न्यायालय में कोलकाता के आर जी कर अस्पताल में दुष्कर्म और हत्या के मामले में सुनवाई के दौरान सामने आयी एक टिप्पणी पर श्री धनखड़ ने कहा ,“मैं आश्चर्यचकित हूं, मैं दुखी हूं और कुछ हद तक चकित हूं कि उच्चतम न्यायालय के “बार” के एक सदस्य और संसद का एक सदस्य ऐसे शब्दों का बोलते हैं? लक्षणात्मक रोग और यह सुझाव देते हैं कि ऐसी घटनाएं सामान्य हैं? शर्मनाक। ऐसी स्थिति की निंदा करने के लिए शब्द भी कम हैं। यह उस उच्च पद के साथ सबसे बड़ा अन्याय है।”
उपराष्ट्रपति ने इस तरह के बयान को अत्यंत शर्मनाक बताते हुए कहा कि ये बयान महिलाओं और बेटियों की पीड़ा को तुच्छ बनाते हैं। उन्होंने कहा, “क्या आप पार्टी के हितों या व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए ऐसा कहते हैं? आप अपने अधिकार का इस्तेमाल करके इस तरह के घृणित अन्याय को बढ़ावा देते हैं? क्या मानवता के लिए इससे बड़ा अन्याय हो सकता है? हमारी बेटियों की पीड़ा को तुच्छ बनाया जाये? अब नहीं।”
श्री धनखड़ ने नागरिकों से राष्ट्रपति के “बस बहुत हुआ” के आह्वान को आत्मसात करने की अपील की और कहा, “राष्ट्रपति ने कहा, बस बहुत हुआ!” आइए, इसे राष्ट्रीय आह्वान बनाएं। मैं चाहता हूं कि यह आह्वान सभी के लिए हो। चलिए संकल्प लें कि हम एक ऐसा सिस्टम बनाएंगे जिसमें कोई भी लड़की या महिला पीड़ित न हो। आप हमारी सभ्यता को नुकसान पहुंचा रहे हैं, आप अति क्रूरता का प्रदर्शन कर रहे हैं। किसी भी चीज को बीच में न आने दें और मैं चाहता हूं कि देश के हर नागरिक इस समय की सटीक चेतावनी को सुने।”
उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत की वर्तमान प्रगति को महिलाओं की पूर्ण भागीदारी के बिना प्राप्त नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि भारत को एक विकसित देश के रूप में सोचने का विचार बिना लड़कियों और महिलाओं की भागीदारी के तर्कसंगत नहीं है। उनके पास ऊर्जा और प्रतिभा है। आपकी भागीदारी के साथ, भारत के विकसित होने का सपना 2047 से पहले पूरा होगा।
समान आचार संहिता की आवश्यकता पर बल देते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि यह एक संवैधानिक आदेश है। यह नीति निदेशक सिद्धांतों में है। उच्चतम न्यायालय ने कई बार कहा है कि इसे विलंबित किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि महिलाओं के लिए एक छोटे न्याय का उपाय है। यह कई तरीकों से मदद करेगा, लेकिन मुख्य रूप से यह मददगार होगा।
उन्होंने कहा कि जब राष्ट्रीय हित और विकास की बात हो, तो हमें राजनीतिक, पार्टी और व्यक्तिगत हितों को अलग रखना चाहिए।

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