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मानवाधिकार आयोग ने विधवा महिलाओं के कल्याण के लिए परामर्श जारी किया

नई दिल्ली : राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने देश में विधवा महिलाओं की चुनौतियों को देखते हुए उनके कल्याण और मानव अधिकारों का संरक्षण सुनिश्चित करने के लिए केंद्र, राज्य सरकारों एवं केंद्रशासित प्रदेशों के लिए परामर्श जारी किया है। आयोग ने बुधवार को बताया कि इस परामर्श की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि आयोग ने देखा है कि विधवा महिलाओं को अक्सर अपने जीवनसाथी को खोने के भावनात्मक संकट के अलावा कई अन्य चुनौतियों का भी सामना करना पड़ता है जिसमें सामाजिक बहिष्कार, आय की हानि और यहां तक कि निवास की समस्‍या आदि प्रमुख हैं।
आयोग ने कहा कि 2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार भारत में 5.6 करोड़ विधुर एवं विधवाओं की कुल आबादी में लगभग 78 प्रतिशत महिलाएं हैं। विधवा महिलाओं को अक्सर अपने जीवनसाथी के निधन के बाद खुद की देखभाल के लिए छोड़ दिया जाता है। अपने परिवारों से पर्याप्त मदद के बिना और वित्तीय आत्‍मनिर्भरता की कमी के कारण, उन्हें समुदाय से अलग-थलग कर दिया जाता है, यहां तक कि उन्हें अपने घर छोड़ने और आश्रय घरों या आश्रमों में शरण लेने के लिए मजबूर किया जाता है। निरक्षरता और बढ़ती उम्र के कारण उनकी आर्थिक स्थिति और खराब हो जाती है।
विधवा महिलाओं के समग्र कल्याण पर ध्यान देते हुए आयोग ने परामर्श में केंद्र, राज्यों और केंद्रशासित प्रदेश प्रशासनों द्वारा कार्रवाई के लिए 10 प्रमुख क्षेत्रों और अन्य उपायों पर ध्यान केंद्रित किया है। इनमें उनके उचित पहचान दस्तावेजों को सुनिश्चित करना, उनके लिए आश्रय घरों का निर्माण और रखरखाव, संपत्ति तक समान पहुंच, घरों से बेदखल होने की रोकथाम और शोषण से सुरक्षा, कौशल विकास का प्रावधान और स्थायी आजीविका तक पहुंच, आसान बैंकिंग और वित्तीय स्वतंत्रता तक पहुंच, स्वास्थ्य देखभाल की पहुंच, सामर्थ्य और उपलब्धता, मानसिक स्वास्थ्य, समुदाय-आधारित नेटवर्क, निराश्रित विधवाओं के मुद्दों के बारे में डेटा की कमी, साहित्य का सदुपयोग तथा पहले दिए गए सुझावों के आधार पर 17वीं लोकसभा में सांसद जनार्दन सिंह सिग्रीवाल द्वारा पेश किए गए विधवा (संरक्षण और भरण-पोषण) विधेयक, 2015 की समीक्षा करना और साथ ही उच्‍चतम न्‍यायालय के निर्देशों के तहत गठित समिति की 2017 की रिपोर्ट की समीक्षा करना शामिल है ताकि विधवाओं के कल्याण हेतु कानून बनाया जा सके।

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