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उत्तराखंड हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला

आरोप पत्र के बावजूद अग्रिम जमानत प्रार्थना पत्रों पर होगी सुनवाई

नैनीताल : उत्तराखंड उच्च न्यायालय की तीन सदस्यीय खंडपीठ (लार्जर बेंच) ने गुरुवार को जारी अपने महत्वपूर्ण निर्णय में आरोप पत्र दाखिल होने के बावजूद अग्रिम जमानत प्रार्थना पत्र की पोषणीयता पर अपनी मुहर लगा दी है। यानी अदालत में आरोप पत्र दाखिल होने के बावजूद अग्रिम जमानत प्रार्थना पत्र पर सुनवाई की जा सकेगी। दरअसल उच्च न्यायालय के नियम-कायदों के अनुसार आरोप पत्र दाखिल होेने के बाद अग्रिम जमानत प्रार्थना पत्र को पोषणीय नहीं माना जाता रहा है। उच्च न्यायालय के समक्ष यह सवाल तब खड़ा हुआ जब आरोप पत्र दाखिल होने के बावजूद विभिन्न अदालतों में अग्रिम जमानत के लिये 33 प्रार्थना पत्र पेश हुए या फिर लंबित थे।
इस यक्ष प्रश्न के समाधान के लिये सभी मामलों को तीन न्यायाधीशों की पीठ को भेजा गया। मुख्य न्यायाधीश विपिन सांघी, वरिष्ठ न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी और न्यायमूर्ति रवीन्द्र मैठाणी की पीठ ने इस मसले पर सुनवाई की और कुछ समय पहले निर्णय सुरक्षित रख लिया था। आज पीठ ने इस मामले पर अपना मंतव्य स्पष्ट कर दिया। एक के मुकाबले दो न्यायाधीशों ने आरोप पत्र दाखिल होने के बावजूद अग्रिम जमानत प्रार्थना पत्र की पोषणीयता को उचित ठहराया।
मुख्य न्यायाधीश विपिन सांघी और न्यायमूर्ति मनोज तिवारी ने अग्रिम जमानत प्रार्थना पत्र के पक्ष में जबकि न्यायमूर्ति रवीन्द्र मैठाणी ने विरोध में अपना निर्णय दिया। अब इससे साफ है कि आरोप पत्र दाखिल होने के बावजूद अग्रिम जमानत प्रार्थना पत्र दाखिल किया जा सकता है। या पहले से दाखिल प्रार्थना पत्र पर सुनवाई की जा सकती है। अदालत अग्रिम जमानत प्रार्थना पत्र पर हालांकि गुणदोष के आधार पर अपना फैसला करेगी।
अदालत के इस फैसले से यह भी साफ हो गया है कि फिलहाल अदालत के समक्ष 33 अग्रिम जमानत प्रार्थना पत्र पोषणीय हैं और उन पर सुनवाई हो सकेगी और गुण-दोष के आधार पर अंतिम फैसला होगा। उच्च न्यायालय के इतिहास में यह निर्णय महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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