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हिंदी साहित्य में मुस्लिम साहित्यकारों का योगदान बताने वाली पुस्तक लॉन्च

साहित्य एक ऐसा स्रोत्त है जो समाज के आइनें का काम करता है। इस साहित्य में समाज का हर वर्ग शामिल होता है चाहे वह किसी भी धर्म या जाति से सम्बन्ध रखता हो। भारत के अगर साहित्य की बात की जाए तो हिंदी भाषा का साहित्य भारतीय समाज में व्यापक रूप से जाना पहचाना रहा है उसके कई ऐसे साहित्यकार और पात्र है जिसने लोगों के दिलों दिमाग में  जगह बनायी है। भारत के साहित्य को रचने में यहाँ रहने वाले विभिन्न समाज के लोगों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है फिर चाहे वह व्यक्ति किसी भी धर्म और समाज या जाति से जुड़ा हुआ हो। भारत का साहित्य व्यक्तिगत बौद्धिक विकास में बढ़ौतरी करने की क्षमता रखता है। यह सकारात्मक रूप से समाज को आगे बढ़ाने के लिए एक अच्छी दिशा प्रदान कर सकता है बशर्ते बस जरूरत है भारतीय साहित्य और उन से जुड़े लेखकों को करीब से जानने की। इसी प्रयास को पूरा करने के लिए सहित्य जगत में मुस्लिम साहित्यकारों के योगदान से परिचित कराने के लिए दिल्ली के इण्डिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर में एक पुस्तक का विमोचन हुआ जिसमे मुस्लिम साहित्यकारों के विषय में विस्तार से बताने की कोशिश की गई। मुस्लिम साहित्यकारों में कबीर,रहीम, मलिक मुहम्मद जायसी, मुल्ला दाऊद, कुतुबन, मंझन इत्यादि कई ऐसे नाम है जिनका नाम हिंदी साहित्य में बड़ी प्रमुखता से पहचाना जाता है।

दिनाँक 29-07-2022 को डॉ. आसिफ उमर के द्वारा लिखित पुस्तक ‘हिंदी साहित्य में मुस्लिम साहित्यकारों का योगदान’ का विमोचन किया गया। डॉ। आसिफ उमर, जामिया मिल्लिया इस्लामिया में सहायक प्राध्यापक के पद पर कार्यरत हैं। यह पुस्तक ख़ुसरो फाउंडेशन द्वारा प्रकाशित की गयी है। पुस्तक विमोचन का आयोजन ख़ुसरो फाउंडेशन एवं इण्डिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर के संयुक्त तत्वावधान में किया गया। इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि वरिष्ठ पत्रकार एवं विचारक श्री वेदप्रताप वैदिक जी थे। कार्यक्रम में विशेष अतिथि एवं विशिष्ठ अतिथि के रूप में हलीमा अज़ीज़ विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो। डॉ। अफ़रोजुल हक़ तथा निदेशक लेखापरीक्षा के डायरेक्टर श्री मोहम्मद परवेज़ आलम ने शिरकत की। कार्यक्रम का संचालन प्रो। अख्तरुल वासे ने किया।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्री वेदप्रताप वैदिक जी ने अपने वक्तव्य में पुस्तक की सराहना करते हुए कहा कि यह पुस्तक गंगा-जमुनी तहज़ीब को समझने में अत्यंत सहायक होगी। हिंदी भाषा और साहित्य की सेवा भारतियों ने बगैर भेदभाव के की है और हिंदी ने भी सभी को सामान नज़र से देखा है। उन्होंने कहा कि डॉ। आसिफ उमर, हिंदी साहित्य के पूरे दौर का सफ़र कर के पाठकों के सामने एक ज्ञानवर्धक और तथ्यपरक पुस्तक लाते हैं। विमर्शों के इस दौर में इस तरह की पुस्तकों की बेहद आवश्यकता है। यह पुस्तक समाज की उस एकता को  दृष्टिगोचर करता है कि कोई भी साहित्य किसी सीमा में नहीं बांधा जा सकता है।  वैदिक जी ने ख़ुसरो फाउंडेशन के डायरेक्टर प्रो। अख्तरुल वासे व डॉ। आसिफ उमर को बधाई देते हुए कहा कि इस तरह का कार्य विद्यार्थियों और शोधार्थियों के लिये सहायक होगा।

विशेष अतिथि प्रो। अफरोजुल हक़ ने पुस्तक की तथ्यात्मकता पर ज़ोर देते हुए कहा कि यह पुस्तक पूरे हिंदी साहित्य का एक ब्यौरा है। हिंदी साहित्य में होने वाले सभी परिवर्तनों, उसकी स्थितियों-परिस्थितियों को इस पुस्तक में बहुत बारीकी से रखा गया है। इस पुस्तक को पढ़ने से विद्यार्थियों में हिंदी और हिंदी साहित्य को लेकर एक समझ विकसित होगी।

विशिष्ठ अतिथि श्री परवेज़ आलम ने हिंदी भाषा की विशेषता पर बल देते हुए कहा कि भाषा और साहित्य की तमाम विशेषताओं में से एक विशेषता यह भी है कि इसकी कोई सीमा नहीं है। यह मनुष्य को जाति, धर्म, संप्रदाय आदि में बाँट कर नहीं देखता। यह सभी को सृजन का एक समान अवसर देता है। इसलिए अब यह विषय बेमानी हो गया है कि हिंदी लिखने या बोलने वाले कौन हो सकते हैं। हिंदी भाषा और साहित्य ने अपने आगोश में कई भाषाओं के शब्दों को जगह दी है। इसीलिए हिंदी साहित्य का फलक अत्यंत व्यापक हो जाता है। उन्होंने आगे कहा कि जैसा कि इस पुस्तक का विषय है- हिंदी साहित्य में मुस्लिम साहित्यकारों का योगदान। पुस्तक के शीर्षक से ही ज्ञात हो जाता है कि हिंदी साहित्य के आरंभिक दौर से ही विभिन्न जाति, धर्म। संप्रदाय के  साहित्यकारों ने हिंदी भाषा में साहित्य लिखना आरंभ कर दिया था।

पुस्तक विमोचन के अवसर पर जामिया मिल्लिया इस्लामिया, दिल्ली विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, अंबेडकर विश्वविद्यालय आदि के अध्यापक में विद्यार्थी उपस्थित रहे।

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