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मुर्गा युग – “ऊरूवा” सभ्यता

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रवि शंकर राय

लेखक. प्रख्यात उद्यमी होने के साथ ही समाजिक कार्यों और लेखन के क्षेत्र में भी सक्रीय है। स्वतंत्र टिप्पणीकार के रूप में राजनीति और समाज से जुड़े विभिन्न ज्वलंत, सम-सामाजिक विषयों पर लेखनरत रहते है।

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सनातन धर्म के हिसाब से मुख्य रूप से चार युग कलियुग, सतयुग, द्वापर और त्रेता हैं। इसी तरह अलग-अलग धार्मिक मतों के हिसाब से युग और काल का निर्धारण होता है। इसके अलावा विभिन्‍न संस्कृतियों और शासकों के हिसाब से जैसे पाषाण युग, ताम्र एवं कांस्य युग, लौह युग, मौर्य काल, मुगल काल तथा और भी बहुत सारे युग और काल हुए। इसी तरह सभ्यता भी पूरी दुनियाँ में रहन-सहन और रीति-रिवाज के हिसाब से निर्धारित हुई। उदाहरण के तौर पर सिन्धुघाटी सभ्यता जिसे हडप्पा सभ्यता के नाम से भी जाना जाता है, वैदिक सभ्यता, मिस्त्र की सभ्यता जिसे नील नदी की सभ्यता भी कहा जाता है, मेसोपोटामिया की सभ्यता जिसे इराक की  सभ्यता भी कहते है, माया सभ्यता जिसे मेक्सिको की सभ्यता या अमेरिका की प्राचीन सभ्यता के नाम से भी जाना जाता है, चीन की सभ्यता तथा कई और सभ्यताएँ मानवता के इतिहास में दर्ज हैं।

हर युग में अलग-अलग संस्कृतियों के बीच वर्चस्व को लेकर टकराव होता रहा है। देवताओं और दैत्यों के बीच भी कई टकराव हुए हैं जो इतिहास में दर्ज हैं। ज्यादातर टकराव शक्ति और सत्ता के विस्तार को लेकर हुआ। हालाँकि शासक हमेशा सभ्यता, संस्कृति की आड़ लेकर अपनी सत्ता और शक्ति का विस्तार करता रहा है। विचारधाराओं के टकराव के बीच भी हर युग में एक तटस्थ विचारधारा रहती थी जो समाज को आइना दिखाने का काम करती थी। वो तटस्थ विचारधारा सही को सही और गलत को गलत बोलने का ताकत रखती थी। कई बार वो तटस्थ विचारधारा समाज में हो रहे अन्याय के खिलाफ खुद खड़ी होकर अन्यायी का सफाया कर देती थी। उदाहरण के तौर पर सहस्त्रबाहु, धनानंद अपने- अपने समय के सबसे ताकतवर शासक थे, लेकिन भगवान परशुराम, आचार्य चाणक्य ने उनका समूल नाश कर दिया।

आज जो टकराव हो रहे हैं सांस्कृतिक विचारधारा को लेकर वो एक अलग तरह के युग की शुरूआत का संकेत है। बंगाल में घरों में जिंदा जलाने की घटना, राजस्थान और कई प्रदेशों में हिन्दू नव वर्ष पर आगजनी और पत्थरबाजी की घटना, महाराष्ट्र और कई प्रदेशों में अजान के विरोध में हो रही घटना तथा इस तरह की अनेकों घटनायें केवल सांस्कृतिक और वैचारिक मतभेद तक सीमित नहीं हैं। 

ये एक नए युग की शुरूआत है, जहां तटस्थ विचारधारा का अस्तित्व ही खत्म हो गया और सही-गलत की पहचान अब असम्भव हो रही है। हर युग में समाज, समय और जरूरतों के हिसाब से संस्कृति में बदलाव लाता रहा है। कुछ पुरानी परम्पराओं को छोड़ता है और कुछ नई परंपरायें अपनाता है। समाज में हजारों प्रथाएँ थीं जैसे पर्दा प्रथा, सती प्रथा, बाल विवाह और ऐसे बहुत सारी परम्पराएँ समय के साथ खत्म हो गयीं।

लगभग हर प्रथा एकाध अपवाद को छोड़कर अपने समय के हिसाब से सही होती है। समय बदलने के साथ परम्परा को भी जरूरतों के हिसाब से बदला जाता है। पहले गावों और कस्बों में रात को चोरी के डर से पहरा दिया जाता था और पहरा देने वाला बोलता रहता था ““जागते रहो’” | अब समय के हिसाब से इसकी जरूरत नहीं रही और प्रथा खत्म हो गई।

इसी तरह मस्जिदों और मन्दिरों पर बारहों महीने लाउडस्पीकर लगाकर पूरी आबादी को सुनाने की प्रथा हो या धार्मिक पहनावों, हिजाब, बुर्का, भगवा चोंगा को समाज में अनिवार्य करने की प्रथा हो अपने समय के हिसाब से हो सकता है सही रही हों, लेकिन आज के परिप्रेक्ष्य में ये प्रासंगिक नहीं हैं।

इनको चालू रखना या इसके तर्क में खड़े होना किसी भी बुद्धिजीवी समाज के लिए ठीक नहीं है। तटस्थ विचारधाराओं का समाज से विलुप्त होना समाज के लिए बहुत घातक है। जब मुगल काल का परचम हिंदुस्तान में लहरा रहा था उस समय भी तटस्थ विचारधारा के रूप में बाबा कबीर चुनौती देते थे। उनके बहुत से दोहे आज के समाज की जरूरत हैं।

कांकर पाथर जोरि कै
मस्जिद लई बनाय।
ता चढि मुल्ला बांग दे
क्या बहरा हुआ खुदाय॥

पहले के जमाने में घड़ी होती नहीं थी, मुर्गा बाँग देता था सुबह-सुबह तो समय का अंदाजा चलता था। अब आबादी के आस-पास मुर्गे तो रहते नहीं हैं, इसलिए हर गली मोहल्ले में लाउडस्पीकर ‘लगवा कर हर घंटे बाँग दिलवाना चाहिए। इस तरह से हम मुर्गों के पूर्वजों को सम्मान भी देते रहेंगे और एक शानदार नए युग “मुर्गा युग” में भी प्रवेश कर जाएँगे। इस तरह हमें इन पुराने दकियानूसी युगों से मुक्ति मिल जाएगी। हमारे यहाँ पूर्वांचल में जब कोई बुद्धिजीबी कुछ बोलता है और लोगों को बात समझ में नहीं आती है तो बोल देते हैं कि ‘““ऊरूवा है कुछ भी बोलता रहता है’” | “ऊरूवा’ भोजपुरी में उल्लू को बोला जाता है जो एक ऐसा पक्षी है, जिसे दिन में दिखाई नहीं देता है। मन्द बुद्धि वाले व्यक्ति को भी ऊरूवा (उल्लू) बोला जाता है। समाज भी अब ऐसी ही सभ्यता में प्रवेश कर रहा है, जहाँ ना कुछ दिखाई देता है ना समझ आता है। इस तरह से हम एक नई सभ्यता ‘“ऊरूवा सभ्यता” में धीरे-धीरे प्रवेश कर रहे हैं।
एक दौर था 1990 से 2000 का जब हम पढ़ाई- लिखाई करते थे। मैंने लगभग अपनी सारी कविताएँ उसी दौर में लिखी थीं। उसी दौर में एक कविता लिखी थी, मैंने और लिख कर उसे डायरी में कैद कर दिया था। कविता मुझे थोड़ा साम्प्रदायिक लगती थी, इसलिए कभी उसे मैंने डायरी से बाहर आने नहीं दिया। जब जब डायरी खोलता था तो कविता मुझसे शिकायती लहजे में बोलती थी कि उसे भी डायरी की कैद से बाहर आने दूँ और दुनियाँ देखने  दूँ।

अब इस “’मुर्गा युग-ऊरूवा सभ्यता” में जब हर गलत सोच धर्मनिरपेक्ष है तो मैं कविता को साम्प्रदायिक बोलकर कब तक कैद में रखूँ | अब मैं कविता को डायरी की जेल से आजाद करता हूँ। अब आप लोग फैसला करें कि कविता साम्प्रदायिक है या धर्मनिरपेक्ष –

जंग छिड़ गयी

बीच शहर में

दो मोहल्लों के बीच

राम नगर हिन्दू मोहल्ला

अकबर पुर मुस्लिम क्षेत्र

मुद्दा भी गम्भीर था

अकबर पुर की मुर्गी

भगा ले गया था

राम नगर का मुर्गा

दोनों प्यार करते थे

मामला साम्प्रदायिक हो गया

दोनों मोहल्ले के मुर्गे

करने लगे मार-काट

दुश्मन बन गए

एक-दूसरे की जान का

क्योंकि दोनों मुर्गे-मुर्गी

अलग धर्मों के थे

यह दोनों मोहल्ले की

इज्जत का सवाल था

अकबर पुर का नेता

जिगरा खान चल दिया

मुर्गों की सेना लेकर

राम नगर का शेर सिंह भी

निकल पड़ा मैदाने जंग में

अपनी मुर्गा बिरादरी लेकर

कत्ल हो गए कितने

मुर्गे और मुर्गियों का

कुकडू-कू, कुकडू-कू की आवाज

चारों तरफ गूँजती रही

मामले की नजाकत देखकर

शहर में कफ्यू लगा दिया गया

अनिश्चित काल के लिए।