चेन्नई : तमिलनाडु के मद्रास उच्च न्यायालय में लम्बी बहस के बाद अदालत ने तमिलनाडु के मंत्री वी. सेंथिल बालाजी की पत्नी की ओर से दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (एचसीपी) पर अपना आदेश सुरक्षित रख लिया है। सेंथिल बालाजी को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने मनी लॉन्ड्रिंग मामले में गिरफ्तार किया था और वह अब बाईपास सर्जरी के बाद एक निजी अस्पताल में स्वास्थ्य लाभ ले रहे हैं।
जब वह अन्नाद्रमुक सरकार में मंत्री थे तब परिवहन विभाग में 2014-15 में नौकरी के बदले नकद घोटाले के सिलसिले में 2021 में मनी लॉन्ड्रिंग का मामला दर्ज किया गया था। मंत्री की पत्नी मेगाला द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति निशा बानू और न्यायमूर्ति भरत चक्रवर्ती की खंडपीठ ने अपना आदेश सुरक्षित रखने से पहले मंगलवार शाम तक लगभग सात से आठ घंटे तक चली दोनों पक्षों की अंतिम दलीलें सुनीं।
अदालत के आदेश के अनुसार दोनों पक्षों के वकीलों ने बुधवार को अपनी लिखित दलीलें दाखिल कीं। सुनवाई के दौरान, ईडी की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि पूछताछ की 15 दिन की अवधि सिर्फ अभियोजन का अधिकार नहीं है, बल्कि उन शिकायतकर्ताओं का भी अधिकार है, जिन्होंने कैश फॉर जॉब घोटाले में अपना पैसा खो दिया है। जिसमें मनी लॉन्ड्रिंग श्री सेंथिल बालाजी और उनके सहयोगियों के बीच होने का आरोप है।
यह तर्क देते हुए कि एचसीपी सुनने योग्य नहीं है श्री मेहता ने दोहराया कि श्री सेंथिल बालाजी को ईडी ने गिरफ्तार किया था क्योंकि यह मानने का आधार कि मनी लॉन्ड्रिंग हुई है और उन्होंने यह भी प्रस्तुत किया कि मंत्री और उनके रिश्तेदारों के खातों में बैंक जमा में बेहिसाब धन लेनदेन दिखाया गया है।
याचिकाकर्ता के इस दावे का खंडन करते हुए कि मंत्री की गिरफ्तारी की सूचना उनकी पत्नी और परिवार के सदस्यों को नहीं दी गई थी और ईडी ने भी गिरफ्तारी के आधार का खुलासा नहीं किया था। श्री मेहता ने कहा कि चूंकि श्री सेंथिल बालाजी गिरफ्तारी ज्ञापन को स्वीकार करने में विफल रहे, इसलिए उनके भाई अशोक और रिश्तेदारों को सूचित किया गया था। एसएमएस और ई-मेल के माध्यम से और सबूत उच्च न्यायालय और सत्र न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किए गए।
उन्होंने इस आरोप से भी पूरी तरह इनकार किया कि मंत्री को 14 जून को सुबह 1.39 बजे गिरफ्तारी के आधार के बारे में सूचित नहीं किया गया था। महाधिवक्ता ने मंत्री पर गिरफ्तारी के आधार प्राप्त करने और पावती पर हस्ताक्षर करने से इनकार करने का आरोप लगाया और कहा कि गिरफ्तारी का आधार क्या है, अपराह्न 3.30 बजे स्वयं सत्र न्यायाधीश ने उन्हें उसी दिन पढ़कर सुनाया।
यह आश्चर्य करते हुए कि सक्षम विशेष अदालत के न्यायाधीश द्वारा लगाए गए न्यायिक रिमांड को चुनौती दिए बिना न्यायिक हिरासत को अवैध हिरासत कैसे कहा जा सकता है। श्री मेहता ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति आश्वस्त है कि वह अवैध हिरासत में है, तो उसे जमानत याचिका क्यों दायर करनी चाहिए।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए एनआर एलांगो ने कहा कि ईडी द्वारा राज्य पुलिस नियमों और सीआरपीसी प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया और हिरासत को अवैध और संविधान द्वारा गारंटीकृत व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन बताया गया।
वर्तमान मामले में ईडी ने गिरफ्तारी की पूर्ण आवश्यकता स्थापित नहीं की है, उसे गिरफ्तारी का सहारा लेने से पहले सीआरपीसी की धारा 41-ए का पालन करना चाहिए। याचिकाकर्ता की ओर से बहस करते हुए वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने कहा
यह साबित करने के लिए कोई दस्तावेज़ नहीं थे कि जांच अधिकारी द्वारा मंत्री को गिरफ्तारी के आधार के बारे में सूचित किया गया था। चौदह जून को सुबह 10.30 बजे जब वर्तमान एचसीपी दायर की गयी थी तब कोई न्यायिक रिमांड आदेश पारित नहीं किया गया था और इसलिए याचिकाकर्ता ने गिरफ्तारी की वैधता पर ही सवाल उठाया है ।
उन्होंने यह भी दलील दी कि ईडी के पास कानून के तहत हिरासत में पूछताछ करने का कोई अधिकार नहीं है क्योंकि उसे पीएमएलए के तहत स्टेशन हाउस अधिकारी की शक्तियों का प्रयोग करने के लिए विशेष रूप से सशक्त नहीं किया गया है और इस मामले में पहली बार इस तरह का तर्क उठाया गया है। विस्तृत दलीलें सुनने के बाद खंडपीठ ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।
