नई दिल्ली। दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी द्वारा संविधान दिवस (26 नवम्बर 2022) के उपलक्ष्य में भारतीय संविधान एवं संसदीय लोकतंत्र के बुनियादी मूल्य विषय पर संगोष्ठी का आयोजन दिनांक 28.11.2022 को सायं 4 बजे से केन्द्रीय पुस्तकालय के गीतांजलि सभागार में किया गया । इस संगोष्ठी की अध्यक्षता सुभाष चंद्र कानखेड़िया, अध्यक्ष, दिल्ली लाइब्रेरी बोर्ड द्वारा की गई, मुख्य वक्ता के रूप में डॉ. सत्यनारायण जटिया, पूर्व कैबिनेट मंत्री, भारत सरकार और वक्ता के रूप में भारत एस. सत्यार्थी, निदेशक, ग्लोबल कॉलेज ऑफ़ लॉ उपस्थित रहे । अतिथियों का स्वागत डॉ. आर. के. शर्मा, महानिदेशक, दि.प.ला. द्वारा किया गया। डॉ. आंबेडकर के चित्र पर पुष्प अर्पण एवं दीप प्रज्ज्वलन से कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ।
डॉ. सत्यनारायण जटिया ने श्रोताओं को बताया कि संविधान के सम्बन्ध में बोलना अच्छा है, उसको पढ़ना और भी अच्छा है और उसकी बातों को अमल करना, सबसे महत्वपूर्ण है। विश्व में बहुत से देश आज़ाद हुए लेकिन आज़ादी के बाद भी सतत रूप से विधि का शासन स्थापित न कर सके, लेकिन भारत आज़ादी के साथ ही संविधान बनाकर आज भी सुचारू रूप से चल रहा है हमारा देश इतना विशाल ओर विविधता पूर्ण होने के बावजूद भी अपने सभी नागरिकों को जीवन जीने के लिए सामान अधिकार प्रदान करता, उनको न्याय दिलाने के लिए न्यायपालिका सजगता से कार्य करती है । मुख्य वक्ता द्वारा अम्बेडकर जी के जीवन के संक्षित्प परिचय देते हुए, उन्होंने उनके आरंभिक वंचित और शोषित जीवन के कई उद्धरण दिए, पारसी धर्मशाला से उनकों अछूत मानकर बाहर कर देने, मंदिर में उनके प्रवेश निषेध, महाड़ तालाब की घटना, आदि की उन्होंने चर्चा की और इन सभी व्यथाओं को एक उन्नत संविधान निर्माण की प्रक्रिया का अंग बताया। भारतीय संविधान की उद्देशिका की विस्तार से चर्चा करते हुए तथा उसकी सुन्दर प्रस्तुति को उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिये, तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिये किये गए आह्वाहन को श्रोताओं के समक्ष रखकर सबका ज्ञानवर्धक किया द्य उन्होंने अपनी काव्यात्मक शैली से अपने विचार रखकर श्रोताओं को मन्त्र-मुग्ध किया और पत्थर कविता का सुन्दर काव्य बिम्ब श्रोताओं के समक्ष प्रस्तुत किया।

भारत एस. सत्यार्थी ने अपने वक्तव्य में बताया की लगभग 800 वर्षों तक भारत विदेशी ताकतों के आधीन रहा द्य इन विदेशी हुकूमत ने देश को आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं न्यायिक तौर पर टुकड़ों में विभजित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने बाबासाहेब को नमन करते हुए बताया कि बाबा साहेब ने विभिन्न देशों के संविधानो का गहन अध्ययन कर देश के सभी लोगों की आवश्कताओं के अनुरूप एक लोकतांत्रिक संविधान निर्मित किया द्य देश का संविधान प्रथम है, फिर संसद का स्थान आता है, इसमें संवैधानिक सर्वोच्चता को माना गया है ढ्ढ हमारा संविधान हमें जीवन का अधिकार, संपत्ति का अधिकार, जीवन की गरिमा का अधिकार, दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करें, दूसरों का सम्मान कैसे करें, हम अपनी गरिमा को कैसे महसूस करें आदि को देश के आखिरी कोने में स्थित व्यक्ति तक पहुंचाता है । यह संविधान प्रजातांत्रिक व्यवस्था प्रदान करता है जिसमें समानाधिकारवादी समाज की स्थापना हेतु विभिन्न अधिकारों, अनुच्छेदों, धाराओं, राज्य नीति के निदेशक सिद्धांत सहित एक ऐसा ढांचा तैयार किया गया जो देश के सभी लोगों को समानता, न्याय, बंधुत्व का भाव जगाने, एक लोक हितकारी राज्य बनाने में सक्षम है। भारत में न्यायपालिका संविधान में निर्धारित मूल्यों, नियमों, अधिनियमों, धाराओं आदि की संरक्षक है और समाज में न्याय व्यवस्था को बनाए रखने के लिए कार्य करती है।
बाबा साहेब ने संविधान के निर्माण करते समय समाज के न केवल वंचित वर्ग को अधिकार प्रदान किये बल्कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति के हितों को इसमें समाविष्ट किया है; जैसे महिलाओं को मातृत्व अवकाश, महिलाओं के लिए समान कार्य समान वेतन, सभी नागरिकों को 18 वर्ष की आयु में मतदान का अधिकार आदि । संविधान की प्रस्तावना की विस्तृत चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि हमारा संविधान भारत के सभी नागरिकों को जम्मू कश्मीर से कन्याकुमारी एवं गुजरात से अरुणाचल प्रदेश तक सभी को बिना भेदभाव के समान अधिकार प्रदान करता है और यह हमारे देश को एक प्रभुसत्ता सम्पन्न, समाजवादी, धर्म-निरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य के रूप में स्थापित करता है। अंत में उन्होंने श्रोताओं से कहा कि हमारा संविधान विश्व का एक सुंदर, प्रिय एवं अद्भुत संविधान है, इसे सभी को अधिक से अधिक पढ़ना चाहिए सभी भारतियों को इसका अध्ययन करना चाहिए।

अध्यक्ष, दिल्ली लाइब्रेरी बोर्ड, सुभाष चंद्र कानखेड़िया ने संगोष्ठी का आरंभ महात्मा ज्योतिबा फुले को उनकी पुण्यतिथि पर नमन कर किया तथा सभी श्रोताओं से भी उन्हें दो मिनट मौन रह कर श्रद्धासुमन अर्पित करने को कहा द्य उन्होंने भारतीय संविधान की प्रस्तावना तथा डॉ. भीमराव अंबेडकर जी द्वारा दिए गये संविधान के निर्मात्री समिति की अंतिम बैठक में समापन भाषण को श्रोताओं के समक्ष रखा द्य देश का संविधान उसकी राजनैतिक व्यवस्था का बुनियादी ढांचा निर्धारित करता है, जिसके अंतर्गत उसकी जनता शासित होती है। भारतीय संविधान उसके संस्थापक डॉ. भीमराव अंबेडकर जी के आदर्शों, सपनों तथा मूल्यों का दर्पण है। उन्होंने संविधान से जुड़े कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर भी चर्चा की।
महानिदेशक डॉ. आर. के. शर्मा ने सभी अतिथियों एवं श्रोताओं का स्वागत एवं अभिनन्दन किया तथा संविधान दिवस की महत्ता पर चर्चा करते हुए इसके द्वारा प्रदत्त अधिकारों एवं कर्तव्यों के सम्बन्ध में जानकारी दी। कार्यक्रम का मंच संचालन उर्मिला रौतेला, सहायक पुस्तकालय एवं सूचना अधिकारी, दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी द्वारा किया गया तथा उनके द्वारा सभी मंचासीन अतिथियों, अधिकारियों, स्टाफ सदस्यों एवं समस्त श्रोताओं को धन्यवाद ज्ञापित करने के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।
