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दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी द्वारा ‘गुरु रविदास जयंती’ के उपलक्ष्य पर कार्यक्रम

‘संत रविदास का जीवन दर्शन एवं सामाजिक चेतना’ विषय पर व्याख्यान का आयोजन

नई दिल्ली : दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी द्वारा ‘गुरु रविदास जयंती’ के उपलक्ष्य पर दिनांक 06 फरवरी 2023 को प्रात: 11.00 बजे संत रविदास का जीवन दर्शन एवं सामाजिक चेतना विषय पर व्याख्यान का आयोजन किया गया। दिल्ली लाइब्रेरी बोर्ड के अध्यक्ष श्री सुभाष चंद्र कानखेड़िया की अध्यक्षता एवं महानिदेशक डॉ. आर. के. शर्मा के मार्गदर्शन में आयोजित इस कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में भारत सरकार के पूर्व कैबिनेट मंत्री डॉ. सत्यनारायण जटिया एवं वक्ता के रूप में सतगुरु रविदास रिसर्च एंड चैरिटेबल ट्रस्ट (रजि.) के चेयरमैन डॉ. मनोज दहिया उपस्थित रहे ।

इस अवसर पर गणमान्य अतिथियों के मध्य दिल्ली नगर निगम (दक्षिण) के पूर्व महापौर श्री कैलाश सांखला भी कार्यक्रम में विशेष रूप से उपस्थित रहे ।
सहायक पुस्तकालय एवं सूचना अधिकारी, दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी श्रीमती उर्मिला रौतेला द्वारा मंच संचालन किया गया । कार्यक्रम की रूपरेखा रखते हुए उन्होंने कहा कि संत रविदास से हम सभी भली-भांति परिचित हैं। लेकिन उनके द्वारा प्रतिपादित मूल्यों को सूक्ष्मता से जानने की आवश्यकता है, उन्होंने अपने पदों के माध्यम से मानवतावादी मूल्यों की नींव रखी है । उन्होंने ऐसे राज्य की परिकल्पना की जिसमे कोई दरिद्र ना हो, कोई ऊंच-नीच ना हो, घृणा न हो, किसी का शोषण न हो और राजशाही के स्थान पर गणतांत्रिक व्यवस्था हो । इस राज्य को इन्होंने बेगमपुरा का नाम दिया। उनके वृहद ज्ञान का यह परिणाम है कि गुरु ग्रंथ साहिब में रैदास के पदों को सम्मिलित किया गया ।
वक्ता डॉ. मनोज दहिया ने बताया कि उनके द्वारा सतगुरु रविदास पर शोध किया गया है। सतगुरु शब्द को परिभाषित करते हुए उन्होंने कहा कि सही ज्ञान और सतमार्ग को प्रदर्शित करने के कारण संत रविदास को सतगुरु रविदास कहा जाता है। अपने शोध के माध्यम से उन्होंने बताया कि सतगुरु रविदास एक बड़े व्यापारी परिवार से थे । सभी शास्त्रों और धर्म ग्रंथों का उन्होंने अध्ययन किया था। सतगुरु रविदास ने अपने पद विभिन्न रागों के प्रयोग कर लिखे थे जो कि बेहद कठिन कार्य है । गुरु ग्रंथ साहिब में संग्रहित उनके दोहों में चालीस से अधिक ऐसे शब्द हैं जिन्हें आज तक और किसी अन्य रचयिता द्वारा प्रयोग नहीं किया गया हैं, जो यह दर्शाता है कि वह शब्द निर्माता भी थे। उनकी धर्मपत्नी लोना माता भी अद्वितीय महिला थीं। उन्हें औषधियों का प्रकांड ज्ञान था और उन्हें उस समय की आयुर्वेद का चिकित्सक कहा जा सकता है । सतगुरु रविदास के स्वभाव पर चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि वह परोपकारी स्वभाव के व्यक्ति थे । मीराबाई ने उन्हें अपना गुरु स्वीकार किया और राणा सांगा, सिकंदर लोदी जैसे 52 राजा रानी सतगुरु रविदास के शिष्य बने । कबीरदास, मीराबाई, नामदेव, एकनाथ, दरबारी दास, राजबली, बालकदास, चरणदास, तुकाराम आदि ने अपनी लेखनी में सतगुरु रविदास पर प्रशस्ति लिखी। सतगुरु रविदास ने एक आदर्श समाज की स्थापना की परिकल्पना की थी, जिसमें सभी को सम्मान प्राप्त हो और किसी के साथ कोई भेदभाव न हो।
मुख्य वक्ता डॉ. सत्यनारायण जटिया ने कहा कि संत रविदास की पहचान आध्यात्मिकता से है, धन और कुल से नहीं। उन्होंने शोधन और एकाग्रता से तथ्यों को सम्यक रूप से समझाते हुए ज्ञान अर्जन करने की प्रेरणा दी। उन्होंने संत रविदास के दोहों और भजनों का अर्थ समझाते हुए सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन में उनका महत्व समझाया। डॉ. जटिया ने सत्य के विविध रूप की काव्यात्मक समीक्षा प्रस्तुत करते हुए कहा सच में कुछ भी जोड़ों और घटनाओं तो सच सच नहीं रहता। उन्होंने कहा कि सतगुरु रविदास ने मोती रूपी समाज को एकता के धागे में पिरोकर रखने का कार्य किया । आज आलोचना करना ही सबका धर्म हो गया है और बहुत से लोग समाज में विषमता फैलाने का कार्य ही अपना धर्म समझते हैं। उन्होंने संत रविदास के प्रिय भजन प्रभु जी तुम चन्दन हम पानी को गाकर भावार्थ सहित व्याख्या प्रस्तुत की ।
कोई भी महान व्यक्ति संत तभी बनता है जब वह समाज को जोड़ता है। संत रविदास ने व्यक्ति ही परमात्मा है इस भाव को ही सदैव प्रतिपादित किया और उन्होंने कहा कि हमें यह संकल्प लेना है कि किसी से काम के आधार पर, जन्म के आधार पर और जाति के आधार पर उंच-नीच का भाव नहीं रखना तभी हम संत रविदास के जीवन मूल्यों को सार्थक कर पाएंगे। उन्होंने समता, समानता, समरसता से पूर्ण समाज स्थापित करने में सभी जनों को सहयोग देने और आज इसका संकल्प लेने को कहा, तभी इस आयोजन की सार्थकता फलीभूत हो पाएगी।
अध्यक्ष श्री सुभाष चंद्र कानखेड़िया ने कार्यक्रम में उपस्थित सभी गणमान्य जनों का अभिनंदन किया। उन्होंने बताया कि कार्ल मार्क्स जैसे दार्शनिकों द्वारा की गई सामाजिक परिकल्पना और उनके मित्र सर थॉमस मोर द्वारा यूटोपिया की परिकल्पना से संत रविदास जी की बेगमपुरा शहर की कल्पना काफी मिलती-जुलती कही जा सकती है।
सतगुरु रविदास ने बेगमपुर राज्य की परिकल्पना के रूप में आज से छ: सौ साल पहले एक समरसतावादी समाज अथवा राज्य की परिकल्पना की थी । उन्होंने कहा कि संतों को वर्गों में ना बांटकर सभी संतों को समान रूप से जानने और मानने पर बल दिया जो समाज के सभी वर्गों को जोड़ने का कार्य करते हैं और उन पर वर्गीकरण की गलत अवधारणाओं को त्यागने पर जोर दिया कार्यक्रम के अंत में श्री नरेंद्र सिंह धामी, पुस्तकालय एवं सूचना अधिकारी, दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी द्वारा धन्यवाद ज्ञापन के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ ।

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