गवर्नमेंट स्कूल/काॅलेज प्रिसिंपल व काउंसलर हुए शामिल
नई – पुरानी शिक्षा नीति में बदलाव पर हुए सवाल
अध्यापक और गुरु में बताया अंतर
टीचर्स – स्टूडेंट्स के बीच घनिष्ठ संबंधों पर हुई चर्चा
प्राथमिकी शिक्षकों के बताए कर्त्तव्य और दायित्व
कपिल शर्मा/गौरवशाली भारत
जीवन में जितना मांँ का स्थान होता है उतना ही शिक्षक का स्थान होता है। शिक्षक एक व्यवसाय नहीं, शिक्षक एक नौकरी भी नहीं बल्कि, शिक्षक एक जीवन धर्म है। शिक्षक कभी रिटायर नहीं होते, सफल शिक्षक के विचार और मन में यही रहता है कि, वह नई पीढ़ी को नवीन ज्ञान और ऊर्जा प्रदान करते रहें। लेकिन, वही शिक्षक देश और समाज को आगे बढ़ा सकते हैं। जो समय से दो कदम आगे रहते हैं। जो समय से दो कदम आगे नहीं रहते हैं। वह देश व समाज को कभी भी आगे नहीं बढ़ा सकते। समय से दो कदम आगे वही हो सकता है। जो बदलते हुए जगत को जानता है, समझता है और प्रयास करता है।
भारत में प्रति वर्ष 5 सितम्बर को शिक्षक दिवस मनाने की परंपरा चली आ रही है। शिक्षा के क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ और अभूतपूर्व योगदान के ज़िक्र में महान शिक्षाविद और भारत के प्रथम उप-राष्ट्रपति व द्वितीय राष्ट्रपति रह चुके अवकाशप्राप्त डॉ.सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन स्वरूप यह दिवस मनाया जाता है। 5 सितम्बर 1888 को तमिलनाडु के तिरुट्टनी में उनका जन्म हुआ और 17 अप्रैल 1975 को चेन्नई में उनका निधन हो गया था। डॉ.सर्वपल्ली राधाकृष्णन अपने जीवन में स्वामी विवेकानंद द्वारा मिली प्रेरणा से अत्यंत प्रभावित थे। वे भारतीय संस्कृति के संवाहक, प्रख्यात शिक्षाविद, महान दार्शनिक सहित एक आस्थावान हिन्दू विचारक थे। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की इन्हीं विशेषताओं के कारण सन् 1954 में भारत सरकार ने उन्हें सर्वोच्च सम्मान सहित भारत रत्न से अलंकृत किया था।
इससे पूर्व शिक्षा के पुरोधा अवकाशप्राप्त डाॅ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन भारत सरकार द्वारा 27 बार नोबेल पुरस्कार के लिए भी नामित किए गए थे। जब वे राष्ट्रपति बने, तब बच्चों ने उनका जन्मदिन मनाना चाहा। इस पर उन्होंने कहा- ‘मेरा जन्मदिन मनाने की बजाय 5 सितंबर को शिक्षक दिवस स्वरूप मनाया जाए। साथ ही उन्होंने कहा – एक अच्छा शिक्षक वही होता है, जिसके भितर का छात्र कभी मरता नहीं, इससे शिक्षकों के लिए गर्व की बात होगी।’ उस दिन से शिक्षक दिवस को पूरे भारतवर्ष में परंपरागत शुरू किया गया। इस सन्दर्भ में भारत सरकार ने भी उनके जन्मदिवस 5 सितंबर को भारतीय शिक्षक दिवस के रूप में मनाने का ऐलान किया।
गौरतलब है कि, आज़ादी के अमृत महोत्सव में इस वर्ष 5 सितंबर 2022 में भारत देश 61वांँ राष्ट्रीय शिक्षक दिवस सहित महान शिक्षाविद डाॅ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की 135वीं जयंती मनाई जा रही है। देश और दुनिया में शिक्षा सहित मानव व्यक्तित्व को आकार देने और भविष्य को उज्ज्वल बनाने में शिक्षक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और उन्हें देश का एक आदर्श नागरिक भी माना जाता है। शिक्षक दिवस का प्रमुख उद्देश्य शिक्षकों की महत्वपूर्ण उपलब्धियों का ज़िक के साथ-साथ उन्हें गौरवशाली भारत में गौरव दिलवाना साथ ही शिक्षक दिवस उपलक्ष्य देशभर में शिक्षकों के प्रति सम्मान स्वरूप विभाग द्वारा भव्य कार्यक्रम आयोजन में उन्हें सम्मानित किया जाता है। इस दिवस को स्कूल काॅलेज मेंं विद्यार्थी उत्सव स्वरूप मनाते हुए एक दिवसीय कक्षाओं में शिक्षक की भूमिका निभाते हैं।
शिक्षक दिवस उपलक्ष्य शिक्षाविदों ने रखे विचार
गवर्नमेंट गर्ल्स स्कूल प्रिसिंपल
विक्रम सिंह रोहिल्ला

सवाल- शिक्षक दिवस पर विद्यालय में क्या विशेष होता है.?
जवाब- प्रतिवर्ष की भांति विद्यालय में शिक्षक दिवस मनाया जाता है। इस दिवसीय प्रत्येक कक्षाओं से एक बच्चे को टीचर बनाया जाता है। बच्चों से पढ़वाया जाता है।
सवाल- गुरु और अध्यापक में क्या अन्तर है?
जवाब – गुरू प्राचीन समय में कहा जाता था। जब गुरु पद्धति होती थी। जब बच्चा गुरू के चरणों में और पास रहकर शिक्षा ग्रहण करता था। उस समय गुरु शब्द प्रयोग होता था। अब अध्यापक हैं। अध्यापक का कार्य अध्यापन है। बच्चों को गाइड करना, बच्चों को पढ़ना है। पढ़ाते तो प्राचीन समय में भी थे। केवल, मात्र शिक्षा के साथ-साथ अन्य शिक्षाएंँ भी गुरु देते थे।
सवाल – प्राथमिक शिक्षा को लेकर और शिक्षकों को क्या संदेश देंगे?
जवाब – प्राथमिक शिक्षा बच्चों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण होती है। अगर बच्चे की नींव मज़बूत नहीं होगी तो, आगे बच्चा सफल नहीं हो पाएगा। पाँचवीं तक बच्चों की पढ़ाई में ध्यान देना अत्यंत आवश्यक है। उसके बाद में बच्चे की नींव मजबूत है तो बच्चा आगे किसी भी कंपटीशन में किसी भी कक्षा में वह पिछे नहीं रह पाता। प्राथमिक शिक्षा बच्चे का आधार है। प्राथमिक शिक्षकों से निवेदन करता हूंँ कि, अधिक से अधिक मेहनत कराकर बच्चों को योग्य बनाएंँ।
सवाल : टीचर्स का स्टूडेंट्स के प्रति कैसा व्यवहार होना चाहिए?
जवाब – स्टूडेंट्स के प्रति टीचर का व्यवहार और सोच सदैव सकारात्मक होना चाहिए नकारात्मक विचार कभी नहीं आने चाहियें। अध्यापक बच्चों के साथ जितना निष्ठा और प्रेम से पढ़ाया जाएगा उतना ही बच्चे पढ़ाई में रुचि लेंगे और सिखेगें। जबकि, डांट-फटकार से बच्चा इतना नहीं सिख पाता। अध्यापक बच्चों के साथ घुल-मिलकर उनकी मानसिकता और योग्यता को पहचाने और उसे शिक्षा देवें।
सवाल : सरकारी स्कूल और प्राइवेट स्कूल की पढ़ाई व शिक्षकों पर क्या कहेंगे?
जवाब : प्राइवेट और सरकारी स्कूलों में सभी शिक्षक का एक ही कर्तव्य और लक्ष्य होना चाहिए, बच्चों के सर्वांगीण विकास अहम भागीदारी निभाएं।
गवर्नमेंट ब्वॉय स्कूल प्रिसिंपल
विकास जयदीप

सवाल- अध्यापक और गुरू में क्या अंतर है?
जवाब – यह सवाल बहुत महत्वपूर्ण है। वास्तव में, अध्यापक में गुरु भी शामिल है। गुरु में गुरुत्वा होती है। जिसकी महत्वता अधिक होती है। जो कई मामलों में संपूर्ण है। गुरु के दायित्व और दायरे अधिक बड़े होते हैं। गुरु पूरे जीवन की जिम्मेदारी लेकर चलता है। अध्यापक सिर्फ़ अध्यापन का कार्य करता है। जो बच्चों का पाठ्यक्रम पूरा करवाता है। बच्चों को परिक्षा अच्छे अंक दिलवाता है।
सवाल- प्राचीन पढ़ाई और अब की पढ़ाई में क्या बदलाव हुए?
जवाब – प्राचीन शिक्षा पद्धति और अब की पढ़ाई में दिन – रात जितना परिवर्तन होते हुए काफी बदलाव हुआ है। सेलेबस अपडेट होने के साथ-साथ पढा़ई में बेसिक स्किल्स जोड़ दिए गये हैं साथ ही सिखाने के तौर तरिके बदल गए हैं। पहले विद्यार्थियों की संख्या अधिक होती थी और अध्यापक कम होते थे। अब कम विद्यार्थीयों पर अध्यापक अधिक होते हैं। नई शिक्षा नीति में विद्यार्थियों की सुविधाओं का विशेष ख्याल रखा जाता है। प्रत्येक विद्यार्थियों पर ध्यान केंद्रित करते हुए कोशिश की गई है कि, नई शिक्षा नीति के तहत शिक्षकों द्वारा व्यवहारिक ज्ञान बच्चों को अधिक से अधिक देने का प्रयास किया गया है।
सवाल – सरकारी स्कूल और प्राइवेट स्कूल की पढ़ाई को लेकर आप क्या कहेंगे.?
जवाब – पाठ्यक्रम दोनों में एक ही है। प्राइवेट स्कूल के बारे में कुछ नहीं कहूंगा! दोनों स्कूलों के प्लेटफार्म अलग-अलग हैं। लेकिन, सरकारी स्कूल में भी बहुत ज्यादा सुविधाएं है। पहले की तुलना में सरकार द्वारा स्कूल में पढ़ाई व्यवस्था को लेकर प्रत्येक बच्चे पर ध्यान केन्द्रित किया जाता है। पूरे भारत में हरियाणा सरकार सबसे ज्यादा व्यय करती है। इसलिए सरकारी स्कूलों का ढांचागत सुधार भी बहुत हुआ है। सुविधाओं के साथ-साथ अध्यापकों की बढ़ोतरी हुई है। मिड डे मील से लेकर अन्य सरकारी योजनाओं का लाभ बच्चों को देते हुए सरकारी स्कूल बेहतर हैं। कम नाम मात्र फिस में शिक्षा प्रदान किया जाता है। लेकिन, आज के समाज की मानसिक दृष्टिकोण को देखते हुए प्राइवेट स्कूल की तरफ़ झुकाव अधिक है। इसलिए अभिभावक बच्चों प्राइवेट स्कूलों में अधिक भेजते हैं। सरकारी स्कूल किसी भी रुप में प्राइवेट से कम आंकलन नहीं किया जा सकता। वहीं प्राइवेट स्कूल किसी भी रुप में सरकारी स्कूल से ज्यादा बेहतर नहीं हैं। सम्पन्न वर्ग प्राइवेट स्कूल का चयन कर सकता है तो वहीं दूसरा वर्ग के लिए सरकारी विद्यालय अमृत व रामबाण का काम कर रहे हैं।
सवाल : प्राथमिक शिक्षा और स्नातक शिक्षा में कौनसी महत्वपूर्ण है?
जवाब – प्राथमिक शिक्षा विद्यार्थियों के जीवन काल की सबसे महत्वपूर्ण शिक्षा है। परिश्रम निष्ठा लग्न इमानदारी से कोई बच्चा पूरी करता है। निश्चित तौर पर उसके आगे की शिक्षा बेहद आसान हो जाती है।
सवाल – जो टीचर बच्चों पर गौर नहीं करते उनके लिए आपका क्या संदेश है?
जवाब – मैं कहूँगा कि, हम सभी को अपने पेशे से न्याय करना चाहिए। सरकारी स्कूल शिक्षकों पर जिम्मेदारियाँ अधिक होती हैं। बजाय दूसरे पक्ष के हम सबको अधिक मेहनत करना चाहिए। क्योंकि, हमारे बच्चे ऐसे होते हैं, जिनके अभिभावक व अध्यापक भी हम ही होते हैं। यहांँ तक कि, माता-पिता की भूमिका भी हमें ही निभानी पड़ती है। हमारे पास है ऐसे बच्चे आते हैं, उन बच्चों को यदि हम न्याय और स्थान नहीं दिलवाएंगे तो कहीं न कहीं एक अन्याय साबित होगा।
सवाल – शिक्षा को लेकर विद्यार्थियों को क्या कहेंगे.?
जवाब – विद्यार्थियों के लिए सबसे प्राथमिक कार्य मन लगाकर पढ़ना चाहिए। यदि दो कार्य है तो एक पढ़ाई को चयन करना चाहिए। शिक्षा का उदेश्य सिर्फ़ नौकरी पाना नहीं बल्कि, स्वयं के जीवन को समझना क्या करना है और कैसे करना है। शिक्षा मानसिक बौद्धिक विकास के लिए अहम है।
गवर्नमेंट गर्ल्स काॅलेज प्रिसिंपल
डाॅ. अनीता तंवर

शिक्षक दिवस सभी शिक्षक वर्ग के लिए विशेष है। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन अपना जन्मदिन राष्ट्रपति के रूप में नहीं बल्कि एक शिक्षक के रूप में उन्होंने मनाने की अपील की। शिक्षक दिवस पर हम सभी को यह शपथ लेनी चाहिए। जो गुरु है वह गुरु की भूमिका निभाए जो प्राचीन काल से शिक्षक की शिक्षा के प्रति दायित्व और मर्यादा बताई गई है उसे निभाए। गुरु को ब्रम्हा विष्णु महेश जैसे त्रिदेवों में स्थान दिया गया है। गुरु का सर्वोच्च स्थान है। आदिकाल से चली आ रही गुरु महिमा की विशेषताएं और उनका विस्तार अशेष है। आजकल देखा जा रहा है कि, गुरु की भूमिका पूर्णतया बदल गई है। समाज की सोच बदल गई है। इसलिए इस कमी को खोजना होगा और उस कमी को सुधारते हुए गुरु के प्रति जो समर्पण भाव होता है। जो निष्ठा इमानदारी और मर्यादा होती है। उस समाज की बदली हुई सोच को वापस लाना है।
विद्यार्थियों के लिए कहना चाहूंगी कि, शिक्षक के प्रति आदर मान भाव सम्मान होना चाहिए। समाज में शिक्षा देने वाला गुरु से बढ़कर नहीं हुआ है ना कोई होगा। सारे गुरु एक जैसे नहीं होते, जिनकी मान लिजिये बुद्धि खराब हो गई है चाहे गुरु हो या चाहे शिष्य की जो दोनों में पथ भ्रमित हो गए है। उसे कभी शिक्षा हासिल नहीं हो सकती और इससे शिक्षा स्तर में भी गिरावट आएगी।
टीचर का स्टूडेंट के प्रति अपनत्व का व्यवहार होना चाहिए। टीचर को चाहिए विद्यार्थी को अपने बच्चे की तरह समझना चाहिए। जो भाव मन में बनेगा कि मेरा बच्चा है अभिभावक ने मेरे पास इसको सभ्य नागरिक बनाने के लिए भेजा है। इसलिए अपने शिक्षक दायित्व को समझते हुए बखूबी से शिक्षक भूमिका निभानी चाहिए।
भारतीय विद्या भवन स्थित एसपी काॅलेज कम्यूनिकेशन एंड मैनेजमेंट के मीडिया फेकल्टी और काउंसलर –
रमेश प्रसाद साहू

सवाल- अध्यापक और गुरु में क्या अन्तर है?
जवाब – गुरु एक शक्तिशाली और पावरफुल शब्द है। जिसमें आध्यात्मिकता समाई हुई है। गुरु अध्यापक से ऊपर होता है। गुरु को परमात्मा की संज्ञा भी दी गई है। गुरु क्लास से बाहर भी गुरु है और क्लास के भीतर भी गुरु है। गुरु जब तक धरती पर है तब भी गुरु है और धरती से जाने के बाद भी गुरु ही रहेंगे। गुरु भावनात्मक होता है। जबकि, अध्यापक भावनात्मक नहीं होता। अध्यापक अध्ययन तक सीमित है जब तक अध्ययन कराएंगे तब तक वह अध्यापक हैं। गुरु अध्यापक श्रेणी से ऊपर होता है।
सवाल – टीचर्स और स्टूडेंट्स के बीच कैसा व्यवहार होना चाहिए?
जवाब – टीचर और स्टूडेंट्स एक सिक्के के दो पहलू हैं। दोनों के बीच एक मधुर व्यवहार होना चाहिए। शिक्षक तभी कहलाता है जब स्टूडेंट्स होते हैं और स्टूडेंट्स तब कहलाते हैं जब शिक्षक होते हैं। इसलिए दोनों के कर्तव्य और दायित्व अलग-अलग है।
गुरु आत्मसात करता है, उसके व्यवहार से, उसके जीवन से, उसके बोल से उसे अपने जीवन के भीतर उतार लेता है। वह चहुंओर प्रकाश फैलाता है। गुरु हमेशा प्रकाश की तरफ ले जाता है। गुरु शिष्य की परंपरा में बहुत सारे मिसाल हैं।
पहले की शिक्षा की अपेक्षा बहुत ज्यादा अंतर हुआ है। भारत अपनी शिक्षा को लेकर आगे बढ़ गया है। शिक्षा का विस्तार अधिक हुआ है। और समाज हित में शिक्षा अहम योगदान रहा है।
सवाल- कई मीडिया रिपोर्ट के अनुसार खबरों में देखने और सुनने को मिलता है कि, रक्षक ही भक्षक बन जाते हैं.! यानी टीचर और फीमेल स्टूडेंट्स को लेकर स्टूडेंट्स हैवानियत का शिकार होती हैं.! उसके लिए आप क्या कहेंगे. ?
जवाब – यह आत्मचिंतन करने वाली बात है। शिक्षक पथ भ्रमित हो जाए और भूल जाए कि, मेरा क्या कर्तव्य है। वहांँ पर वह शिक्षक नहीं है। इस स्थिति में छात्र भी अपनी मर्यादाओं को भूल जाए तो वह छात्र भी नहीं है। आज के युग में दोनों को समझना होगा दोनों को मर्यादाओं का पालन करना होगा। शिक्षक हम उन्हें कहते हैं जिन्हें आत्मबोध हुआ है जिन्हें समय का ज्ञान है। जिनको देश का ज्ञान है। जिनको जीवन का ज्ञान है। अगर कोई शिक्षक यह नहीं समझ रहे हैं और गलत मार्ग पर चल रहे हैं। उन्हें शिक्षक और छात्र की संज्ञा नहीं मिलनी चाहिए। उस जगह कभी शिक्षा प्राप्ति नहीं हो सकती। एक शिक्षक को छात्र के प्रति और छात्र को शिक्षक के प्रति सकारात्मक विचार और विश्वास होना जरूरी है।
