यात्राएं: यह मुद्दा भी यही सिद्ध करता है की हमारा समाज जैविक नाभिकीय युद्ध के हिसाब से रचित (Designer) है

सुमिता धीमान
लेखिका विभिन्न समाचार पत्र पत्रिकाओं आदि के लेखन कायों में सक्रीय है।

पुराने समय में अपनी धार्मिक आस्था, जिज्ञासा, खोजी प्रवृति के कारण, जरूरतें और उद्देश्यों (needs & objectives) के कारण इंसानो ने कई बड़ी बड़ी यात्राएँ की। ये बड़े-बड़े खोज अभियान तब किए जब technology ना के ही बराबर थी और सुविधाएँ भी कुछ खास नही होती थी। कोलम्बस, वास्को डा गामा, ह्वेनसांग, गुरु नानक देव जी आदि लोगों ने बहुत लम्बी-लम्बी यात्राएँ की हैं। समुंद्री यात्राओं के दौरान, खोज अभियानों मे कभी-कभी हफ़्तों या फिर महीनो कोई तट दिखाई नही देता था। जहाजियों को लगातार विशाल, विकराल समुन्द्र मे सफर करना पड़ता था। सूखा राशन तो चलो ख़राब नही होता, माँसाहारी के लिए समुन्द्र एक खेत की तरह है। पर पानी, पानी का क्या ? कितना पानी वो लोग अपने साथ store कर ले जाते थे? तब Bisleri Bottles तो उपलब्ध नही होंगी। पीने का पानी कितने दिन सम्भाल कर रख सकते हैं ? वैसे भी नहाने धोने, कपडे धोने, बर्तन धोने, सफाई करने और खाना आदि बनाने में कितना पानी इस्तेमाल होता है।
चीनी यात्री ह्वेनसांग जो भारत आया था महात्मा बुद्ध और बौद्ध धरम की जानकारी हासिल करने के लिए। Uffff , OMG क्या उन दिनो malls, super markets, five star hotels, Gucci, Armani के showrooms, laundry etc रास्ते में उपलब्ध थे ? सुरक्षा के सब इंतजाम थे ? तन्हाई, अकेलापन, home sickness अपने आप में एक बहुत बड़ा अवसाद है। क्या तब वीरान, विशाल वियावान में Google Map, GPS की सुविधा थी ? गर्मी, सर्दी, बरसात, बर्फ़बारी, आंधी, तूफान, रेगिस्तान आदि क्या-क्या ह्वेनसांग ने रास्ते मे आते जाते नही देखा होगा ? ऐसे मे ह्वेनसांग भारत से ढेर सारी बौद्ध धर्म की और बौद्धि साहित्य की किताबे, कई और दूसरी किताबे कुल लगभग 600 + किताबें, अपना यात्रा विवरण (यहाँ यहाँ वो घूमा, ठहरा, तरह तरह की चीजें देखी, अनुभव, जगहो आदि के बारे मे लिखित विवरण) ले कर अकेला प्रकृति के साथ हँसते-खेलते कभी गर्मी, कभी सर्दी, कभी बारिश, कभी बर्फ़बारी, कभी पहाड़, कभी नाले, कभी रेगिस्तान, तो कभी तूफ़ान, आँधी तो कभी कोई हिंसक जंगली पशु आदि मे अपने सामान के साथ सही सलामत पैदल चीन वापिस पहुँच गया। Really tooooo much। यहाँ लोगों को आराम से घर बैठे सुबह या शाम की चाय ना मिले तो सिर दुखने लगता है। बिना पंखे के गर्मी/लू लग जाती है और AC में जुकाम, जोड़ों में दर्द शुरू हो जाता है।
ह्वेनसांग 630 ई के आस पास भारत आया था और भाषा, अगर भाषा का उचित ज्ञान ना हो तो स्थिति कुछ ऐसे ही हो जाती है जैसे Coloured LED 85 cm (दुनिया) without electric current। ह्वेनसांग अपनी लम्बी पैदल यात्रा के दौरान कई जगह रुका। यह गोबी रेगिस्तान से किर्घिस्तान, तोकमत, उज्बेकिस्तान, ताशकंद, फारस, समरकंद, पामीर पर्वत माला, अमुदरिया, तामेज़, कुण्डूज़, बलख, नवविहार, बामियान, शिबिर दर्रे,, गांधार, जलालाबाद से होते हुए भारत आया। तब globalization इतना प्रचलित नही था। बहुत हद तक boxism ही चलता था। हर जगह पर भाषा, संस्कृति, सोच, समझ अलग अलग होती है। ऐसे मे ह्वेनसांग थका मंदा, भूखा प्यासा, बिना नहाए धोए फ्रेश हुए क्या और कैसे बात करता था? अगर किसी से खाने पीने का पूछना होता, रास्ता या कोई जरुरी जानकारी हासिल करनी होती थी तो कैसे बात करता था ? Dialect or pronunciation के कारण तब एक ही भाषा मे 25 km के बाद बहुत अंतर आ जाता था। पंजाबी होने के बावजूद मैं हिंदी भाषा को कुछ ठीक ठाक पढ़, लिख, सुन और बोल लेती हूँ। पर भारत एक विशाल देश है। सो यहाँ बहुत ही विभिन्नता है। मैं कई UP MP बिहार के लोगों की हिंदी नही समझ पाती। हिंदुस्तानी होने के बावजूद मैं हर तरह की हिंदी की dialect और pronunciation नही समझ पाती तो ऐसे में एक चीनी ने कैसे काम चलाया होगा ? जो अलग अलग भाषा, इलाका, संस्कृति, रीती रिवाज, वहमो आदि में घूमा ! हर जगह की currency अलग अलग होती है। यह बोद्धि भिक्षुक इस परिस्थिति से कैसे गुजरा होगा ? यह सब तो हमारे राज कपूर जी की फिल्म Around the world in eight dollar से भी ज्यादा dramatic है।
गुरु नानक देव जी ने 24 सालों में 28 हजार किमी पैदल यात्रा की। इन उदासियों (यात्रा) के दौरान वह पंजाब, से हरियाणा, उत्तराखंड, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार, नेपाल, सिक्किम, भूटान, ढाका, असम, नागालैंड, त्रिपुरा, चटगाँव, बर्मा, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, पाकिस्तान, सिंध, समुंद्री तट के किनारे घूमते घूमते हुए गुजरात, महाराष्ट्र, केरल, तमिलनाडु, श्रीलंका, आंध्राप्रदेश, कर्णाटक, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, सुमेर पर्वत का इलाका, लेह लद्दाख, कश्मीर, अफगानिस्तान, मुल्तान, सिंध, बलोचिस्तान, जैदा, मक्का, मदीना, बगदाद, ईरान, खुर्माबाद, इस्फाहन, करतारपुर आदि जगहों पर घूमे। यानि 365 दिनों में इन्होने कोई औसतन 1167 किमी का सफर तय किया। इस दौरान गुरु जी यहाँ यहाँ से भी गुजरे उस रियासत के राजा को ऊँच नीच, जात पात, अन्धविश्वास, पाखंड आदि को ले कर अपने विचारों से अवगत करवाया। और इन सब को खत्म कर सदभाव, समानता कायम करने पर जोर दिया। और तमाम सफर मे जगह जगह लोगों को भी प्रवचन दिया और कीर्तन किया।