नैनीताल : उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने लोकायुक्त की नियुक्ति व लोकायुक्त संस्थान पर किये जा रहे अनाप-शनाप खर्च को लेकर दायर जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए शुक्रवार को सरकार से पूछा है कि अभी तक लोकायुक्त की नियुक्ति क्यों नहीं की गई है।
सरकार को यह भी बताना है कि लोकायुक्त संस्थान पर अभी तक कितना खर्च हो चुका है। अदालत ने वर्षवार आधार पर इसका हिसाब प्रस्तुत करने को कहा है। हल्द्वानी गौलापार निवासी रवि शंकर जोशी की ओर से दायर जनहित याचिका पर मुख्य न्यायधीश विपिन सांघी व न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की युगलपीठ में सुनवाई हुई।
याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि प्रदेश में अभी तक लोकायुक्त की नियुक्ति नहीं हुई है। लोकायुक्त संस्थान के नाम पर प्रतिवर्ष दो से तीन करोड़ रुपए खर्च किए जा रहे हैं। आगे कहा गया कि कर्नाटक व मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकायुक्त प्रमुख अस्त्र साबित हुआ है।
याचिका में राष्ट्रीय राजमार्ग-74 (एनएच) घोटाला, छात्रवृत्ति घोटाला एवं एनएचएम दवा खरीद घोटाला का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि सभी घोटालों की सम्यक जांच नहीं हो पा रही है और उन्हें ठंडे बस्ते में डाल दिया जा रहा है। ऐसे घोटालों की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए और इसके लिए प्रदेश में लोकायुक्त की नियुक्ति जरूरी है।
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया है कि सभी जांच एजेंसियां प्रदेश सरकार के अधीन हैं। वर्तमान में कोई भी जांच एजेंसी ऐसी नहीं है कि बिना शासन की अनुमति के किसी भी राजपत्रित अधिकारी के विरुद्ध भ्रष्टाचार का मुकदमा पंजीकृत कर सके और मुख्यमंत्री समेत किसी भी जनप्रतिनिधि या लोकसेवक के विरुद्ध स्वतंत्र व निष्पक्ष जांच और कार्यवाही कर सके।
एकमात्र सतर्कता अधिष्ठान भी राज्य पुलिस के अधीन है जिसका नियंत्रण मुख्यमंत्री कार्यालय के पास ही रहता है।
राजनैतिक दबाव के चलते स्वतंत्र व निष्पक्ष जांच नहीं हो पाती है। अकसर मामलों में जांच के बीच में ही बिना उचित कारण बतातये जांच एजेंसी को ही बदल दिया जाता है। इस मामले में आठ मई को सुनवाई होगी।
उत्तराखंड में अभी तक लोकायुक्त की नियुक्ति क्यों नहीं हुई
