प्रयागराज : सनातन धर्म रक्षक समिति के सलाहकार आचार्य सरस्वती प्रसाद पाण्डे ने सोमवार को कहा कि अयोध्या में श्रीराम मंदिर में रामलला के प्राण प्रतिष्ठा का अद्भुत नजारा देख देश-दुनिया में सनातनियों का मन त्रेतायुग की कल्पना कर अह्लादित हो गया है। आध्यात्म, आस्था और श्रद्धा के माघ मेला में एक मुलाकात में आचार्य सरस्वती प्रसाद पाण्डे ने बताया कि दिव्य और भव्य राम मंदिर में भगवत रामलला का प्राण प्रतिष्ठा और साज-सज्जा देखकर कलयुग की अयोध्या में एक बार फिर से त्रेतायुग की झलक महसूस हो रही है। ये सब देखकर लग रहा है कि त्रेतायुग में भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण के अयोध्या वापसी पर इसी प्रकार खुशियां मनाई गयी होंगी।
पाण्डे ने रामचरित मानस की चौपाई “सुमन बृष्टि नभ संकुल भवन चले सुखकंद, चढ़ी अटारिन्ह देखहिं नगर नारि नर बृंद।” “कंचन कलस बिचित्र संवारे। सबहिं धरे सजि निज निजद्वारे, बंदनवार पताका केतू। सबन्हि बनाए मंगल हेतू।” “बीथीं सकल सुगंध सिंचाई।गजमनि रचि बहु चौक पुराईं, नाना भांतिसुमंगल साजे। हरषि नगर निसान बहु बाजे।”“जहं तहंनारि निछावरि करहीं। देहिं असीस हरष उर भरहीं, कंचन थार आरतीं नाना। जुबतीं सजें करहिं सुभ गाना।” “होहिं सगुन सुभबिबिधि बिधि बाजहिं गगन निसान। पुर नर नारि सनाथ करि भवन चले भगवान।” का उदाहरण देते हुए वनवास से वापस लौटने वाली खुशी बताई।
आचार्य ने बताया कि राम से बड़ा राम के नाम का महत्व है। वह भारतीय अस्मिता की पहचान है और वह किसी भी धर्म, संप्रदाय, समय और काल से परे हैं। त्रेतायुग में उन्होंने भले ही अवतार लिया, लेकिन उनके जीवन मूल्य आज भी समाज के लिए प्रेरणास्रोत हैं। युग, साल, महीने, दिन, सब क्रमवार बदलते गए लेकिन अगर कुछ नहीं बदला, तो वो है श्रीरामलला के लिए लोगों की श्रद्धा, और प्रेम। उन्होंने श्रीराम को हमारी आत्मा का प्रतीक तो लक्ष्मण सजकता, माता सीता को मन प्रतीक बताया है।
श्री पाण्डे ने बताया कि अयोध्या का श्रीराम मंदिर भारत का ऐतिहासिक प्रतीक बन गया है। अयोध्या में विवादित बाबरी मस्जिद का निर्माण मुगल शासक बाबर के जनरल मीर बकी ने 1528 में करवाया था किंतु कारसेवकों की बेकाबू भीड़ पर 1990 में तत्कालीन मुलायम सिंह सरकार के शासनकाल में चली गाेलियाें की दबी चिंगारी ने शोला बनकर छह दिसंबर, 1992 को अयोध्या में 16वीं सदी की बाबरी मस्जिद को ढहा दिया। आज भव्य और दिव्य राम मंदिर में राम लला की प्राण प्रतिष्ठा हो गयी। कलयुग का 2024 अयोध्या में त्रेतायुग की वापसी का ऐतिहासिक साल बन गया।
लगभग 500 वर्षों में न जानें कितने लोगों ने अपने आराध्य के इंतजार में जान गंवा दी। कई पीढ़ियों की आस आज पूरी हो रही है। आखिरकार आज मंगल बेला आ ही गई। रामलला के इंतजार में पलकें बिछाए बैठे लोगों में आज अपने आराध्य के लिए उस युग जैसी भक्ति और जुनून महसूस किया जा रहा है।
अयोध्या में त्रेतायुग की झलक से सनातनी अह्लादित
