नई दिल्ली: देश के प्रतिष्ठित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) लंबे समय से विश्वस्तरीय तकनीकी शिक्षा और शोध के लिए जाने जाते हैं। लेकिन अब इन्हीं संस्थानों में बड़ी संख्या में फैकल्टी पद खाली होने का मामला चिंता का विषय बन गया है। उपलब्ध सरकारी रिकॉर्ड और आईआईटी परिषद (IIT Council) के आंकड़ों के अनुसार देश के 23 आईआईटी संस्थानों में स्वीकृत शिक्षकों के हजारों पद अब भी रिक्त हैं। स्थिति यह है कि देश के शीर्ष संस्थानों—आईआईटी दिल्ली, आईआईटी बॉम्बे और आईआईटी कानपुर—में भी बड़ी संख्या में प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और असिस्टेंट प्रोफेसर के पद खाली पड़े हैं।
आंकड़ों के मुताबिक देश के सभी 23 आईआईटी में कुल 12,498 फैकल्टी पद स्वीकृत हैं, जबकि इनमें से 4,804 पद अभी भी रिक्त हैं। इसका अर्थ है कि लगभग 38 प्रतिशत फैकल्टी पद खाली हैं। यानी हर पांच स्वीकृत पदों में से लगभग दो पदों पर नियुक्ति नहीं हो सकी है। यह स्थिति तब है जब लगातार नए आईआईटी स्थापित किए जा रहे हैं, छात्र संख्या बढ़ाई जा रही है और नए शैक्षणिक एवं अनुसंधान कार्यक्रम शुरू किए जा रहे हैं।
बढ़ते संस्थान, लेकिन पर्याप्त शिक्षक नहीं
पिछले कुछ वर्षों में केंद्र सरकार ने तकनीकी शिक्षा के विस्तार पर विशेष जोर दिया है। नए आईआईटी कैंपस विकसित किए गए हैं, विभिन्न क्षेत्रों में नई शाखाएं शुरू हुई हैं और छात्रों के प्रवेश की संख्या भी बढ़ी है। इसके बावजूद शिक्षकों की भर्ती अपेक्षित गति से नहीं हो पा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी उच्च शिक्षण संस्थान की गुणवत्ता उसकी फैकल्टी पर निर्भर करती है। यदि पर्याप्त संख्या में योग्य शिक्षक उपलब्ध नहीं होंगे तो छात्रों की पढ़ाई, शोध कार्य, प्रयोगशालाओं का संचालन और नवाचार परियोजनाएं प्रभावित हो सकती हैं।
शीर्ष आईआईटी भी समस्या से अछूते नहीं
आमतौर पर माना जाता है कि आईआईटी दिल्ली, आईआईटी बॉम्बे, आईआईटी कानपुर, आईआईटी मद्रास और आईआईटी खड़गपुर जैसे संस्थानों में फैकल्टी बनने के लिए देश-विदेश के योग्य उम्मीदवार उत्सुक रहते हैं। हालांकि उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि इन प्रतिष्ठित संस्थानों में भी बड़ी संख्या में शिक्षकों के पद रिक्त हैं।
इन संस्थानों में कई विभाग ऐसे हैं जहां लंबे समय से नियमित नियुक्तियों का इंतजार किया जा रहा है। इसका असर शोध परियोजनाओं, पीएचडी छात्रों के मार्गदर्शन और उद्योगों के साथ होने वाले सहयोगी कार्यक्रमों पर भी पड़ सकता है।
नए आईआईटी में स्थिति अलग-अलग
जहां कई पुराने और बड़े आईआईटी में रिक्तियों का प्रतिशत अधिक है, वहीं कुछ नए संस्थानों ने अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार आईआईटी धारवाड़ में केवल लगभग 1 प्रतिशत फैकल्टी पद खाली हैं, जबकि आईआईटी पालक्काड में यह आंकड़ा करीब 5 प्रतिशत बताया गया है। इससे स्पष्ट होता है कि कुछ संस्थानों ने समय पर भर्ती प्रक्रिया पूरी कर बेहतर संतुलन बनाए रखा है।
भर्ती में देरी क्यों?
उच्च शिक्षा क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि फैकल्टी भर्ती में कई कारणों से देरी होती है। इनमें योग्य उम्मीदवारों की उपलब्धता, चयन प्रक्रिया का लंबा समय, अंतरराष्ट्रीय स्तर के शोध अनुभव की अपेक्षा, विदेशी विश्वविद्यालयों से प्रतिस्पर्धा और बेहतर वेतन एवं अनुसंधान सुविधाओं की मांग प्रमुख कारण माने जाते हैं।
इसके अलावा कई बार चयन प्रक्रिया पूरी होने के बाद भी उम्मीदवार अन्य संस्थानों या विदेशी विश्वविद्यालयों में अवसर मिलने के कारण नियुक्ति स्वीकार नहीं करते। इससे रिक्त पद लंबे समय तक भरे नहीं जा पाते।
शिक्षा और शोध पर असर
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि फैकल्टी की कमी लंबे समय तक बनी रहती है तो इसका सीधा असर शिक्षा की गुणवत्ता पर पड़ सकता है। एक शिक्षक पर अधिक छात्रों का भार आने से व्यक्तिगत मार्गदर्शन प्रभावित होता है। शोध परियोजनाओं की गति धीमी हो सकती है और नए पाठ्यक्रमों के संचालन में भी कठिनाइयां आती हैं।
आईआईटी देश के नवाचार, स्टार्टअप और तकनीकी विकास के प्रमुख केंद्र माने जाते हैं। ऐसे में फैकल्टी की कमी केवल शैक्षणिक चुनौती नहीं बल्कि राष्ट्रीय तकनीकी विकास से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय भी है।
सरकार और संस्थानों की कोशिशें
केंद्र सरकार और विभिन्न आईआईटी प्रशासन समय-समय पर फैकल्टी भर्ती अभियान चलाते रहे हैं। भारतीय मूल के विदेशी शिक्षाविदों को आकर्षित करने, युवा शोधकर्ताओं को अवसर देने और अंतरराष्ट्रीय स्तर की भर्ती प्रक्रिया अपनाने जैसे प्रयास भी किए जा रहे हैं। कई संस्थानों ने पोस्ट-डॉक्टोरल शोधकर्ताओं को फैकल्टी के रूप में जोड़ने और विशेष भर्ती अभियान शुरू करने की दिशा में भी कदम उठाए हैं।
हालांकि शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि केवल भर्ती प्रक्रिया शुरू करना पर्याप्त नहीं होगा। योग्य शिक्षकों को आकर्षित करने के लिए बेहतर अनुसंधान सुविधाएं, प्रतिस्पर्धी वेतन, आधुनिक प्रयोगशालाएं और दीर्घकालिक करियर अवसर भी उपलब्ध कराने होंगे।
देश के आईआईटी संस्थान भारत की तकनीकी शिक्षा और अनुसंधान की रीढ़ माने जाते हैं। ऐसे में लगभग 38 प्रतिशत फैकल्टी पदों का रिक्त रहना एक गंभीर संकेत है। यदि समय रहते इन पदों पर योग्य शिक्षकों की नियुक्ति नहीं होती, तो इसका प्रभाव उच्च शिक्षा, अनुसंधान, नवाचार और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भारत की स्थिति पर भी पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार, आईआईटी प्रशासन और शिक्षा नीति से जुड़े सभी पक्षों को मिलकर इस चुनौती का स्थायी समाधान निकालना होगा, ताकि देश के शीर्ष तकनीकी संस्थानों की गुणवत्ता और वैश्विक प्रतिष्ठा बनी रहे।