झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का दुर्लभ चित्र

इतिहासकारों ने बताया जीवित अवस्था का पहला संभावित चित्र भोपाल। मध्य प्रदेश के दतिया संग्रहालय में एक बेहद दुर्लभ और ऐतिहासिक महत्व का चित्र मिला है, जिसे झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की जीवित अवस्था का पहला संभावित चित्र माना जा रहा है। यह खोज ज्ञान भारतम मिशन के तहत पांडुलिपियों के संग्रहण और संरक्षण अभियान […]

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  • July 26, 2026 6:43 am IST, Published 2 hours ago

इतिहासकारों ने बताया जीवित अवस्था का पहला संभावित चित्र

भोपाल। मध्य प्रदेश के दतिया संग्रहालय में एक बेहद दुर्लभ और ऐतिहासिक महत्व का चित्र मिला है, जिसे झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की जीवित अवस्था का पहला संभावित चित्र माना जा रहा है। यह खोज ज्ञान भारतम मिशन के तहत पांडुलिपियों के संग्रहण और संरक्षण अभियान के दौरान हुई।

करीब दो फीट लंबा और पौने दो फीट चौड़ा यह रंगीन चित्र संग्रहालय के एक कोने में सुरक्षित रखा मिला। चित्र में रानी लक्ष्मीबाई को घोड़े पर सवार दिखाया गया है। विशेषज्ञों के अनुसार यह चित्र वर्ष 1849-50 के आसपास का हो सकता है, यानी महाराजा गंगाधर राव के वर्ष 1853 में निधन से पहले का।

मध्य प्रदेश राज्य पुरातत्व संग्रहालय एवं अभिलेखागार के इतिहासकार डॉ. मो. वसीम खान के अनुसार, चित्र में वह दृश्य दर्शाया गया है जब रानी लक्ष्मीबाई कड़ी सुरक्षा के बीच अपनी कुलदेवी के दर्शन करने जाती थीं। उनका कहना है कि रानी आम लोगों से बहुत कम मिलती थीं, इसलिए उनके जीवनकाल के चित्र अत्यंत दुर्लभ हैं।

सोने के कणों से बनाया गया चित्र

इतिहासकारों का मानना है कि यह चित्र संभवतः तत्कालीन दरबारी चित्रकार सुखलाल ने बनाया होगा, जिन्हें महाराजा गंगाधर राव के शासनकाल में संरक्षण प्राप्त था। इस पेंटिंग की विशेषता यह है कि इसमें सोने के कणों का भी उपयोग किया गया है, जिससे इसकी ऐतिहासिक और कलात्मक महत्ता और बढ़ जाती है।

कैसे पहुंचा दतिया संग्रहालय?

बताया जाता है कि 18 जून 1858 को रानी लक्ष्मीबाई के वीरगति प्राप्त करने के बाद दतिया रियासत के कर्मचारियों ने उनके महल से इस चित्र को सुरक्षित निकालकर अपने पास रखा था। बाद में रियासतों के विलय के बाद यह चित्र पुरातत्व विभाग के संग्रहालय में संरक्षित कर दिया गया, जहां वर्षों तक यह अनदेखा पड़ा रहा।

अब तक केवल एक प्रमाणित चित्र था

डॉ. वसीम खान के अनुसार, अब तक रानी लक्ष्मीबाई का केवल एक ही व्यापक रूप से प्रचलित चित्र उपलब्ध था, जिसे उनके निधन के बाद उनके दत्तक पुत्र दामोदर राव ने अपनी स्मृतियों के आधार पर एक चित्रकार से बनवाया था। इंटरनेट और अधिकांश पुस्तकों में वही चित्र देखने को मिलता है।

वंशज ने बताया बहुमूल्य धरोहर

झांसी की रानी के वंशज योगेश राव नेवालकर ने कहा कि दतिया में मिला यह चित्र प्रचलित प्रमाणित चित्र से काफी समानता रखता है। उन्होंने इसे देश की बहुमूल्य ऐतिहासिक धरोहर बताते हुए इसके वैज्ञानिक संरक्षण की आवश्यकता पर जोर दिया।

पुरातत्व विभाग के आयुक्त मदन कुमार नागरगोजे ने बताया कि इस दुर्लभ चित्र का संरक्षण और अध्ययन किया जाएगा, ताकि इसके इतिहास और प्रामाणिकता पर आगे विस्तृत शोध किया जा सके।

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