नई दिल्ली। देश में पहली बार की गई स्प्रिंग सेंसस यानी झरनों की गणना के दूसरे हिस्से की रिपोर्ट जारी की गई है। इसमें 10 राज्यों में कुल 14,468 झरने दर्ज किए गए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, सबसे ज्यादा झरने मणिपुर और महाराष्ट्र में पाए गए हैं। वहीं, मणिपुर में आकलन किए गए झरनों में 1,336 यानी 34.5% झरने खतरे में पाए गए।
जल शक्ति मंत्रालय की यह रिपोर्ट 25 सितंबर को नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित 9वें इंडिया इंटरनेशनल वाटर वीक 2026 के समापन समारोह में जारी की गई। रिपोर्ट का नाम ‘फर्स्ट सेंसस ऑफ स्प्रिंग्स, वॉल्यूम II, पार्ट-II’ है।
इस चरण में आंध्र प्रदेश, असम, गोवा, महाराष्ट्र, मणिपुर, ओडिशा, राजस्थान, तेलंगाना, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल को शामिल किया गया है।
रिपोर्ट में नीति आयोग की 2018 की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा गया है कि देश की करीब 15% आबादी यानी लगभग 20 करोड़ लोग सीधे या परोक्ष रूप से झरनों के पानी पर निर्भर हैं।
सेंसस का मुख्य उद्देश्य झरनों से जुड़ा भरोसेमंद, एक समान मानकों वाला और जियो-रेफरेंस्ड डेटा तैयार करना था। इससे झरना क्षेत्रों के प्रबंधन, संरक्षण और भविष्य की योजनाएं तैयार करने में मदद मिल सकती है।
महाराष्ट्र में कुल 3,652 झरने दर्ज किए गए। इनमें 2,629 पूरे साल बहने वाले, 909 मौसमी और 114 सूखे झरने हैं। इनमें 3,612 झरने ग्रामीण और 40 शहरी इलाकों में पाए गए।
करीब 86.5% झरने सरकारी या सार्वजनिक स्वामित्व में हैं, जबकि 13.5% निजी स्वामित्व में हैं। संसाधनों पर खतरे के लिए 3,508 झरनों का आकलन किया गया, जिनमें 265 यानी 7.6% खतरे में पाए गए।
मणिपुर में 3,941 झरने दर्ज किए गए। इनमें 3,419 पूरे साल बहने वाले, 457 मौसमी और 65 सूखे हैं। राज्य के करीब 91.4% झरने सार्वजनिक स्वामित्व में हैं।
संसाधनों पर खतरे के लिए जिन झरनों का आकलन किया गया, उनमें 1,336 यानी 34.5% खतरे में पाए गए। रिपोर्ट के अनुसार, स्थानीय लोग 3,127 झरनों का इस्तेमाल करते हैं, जबकि बाहरी लोग 634 और जंगली जानवर 113 झरनों का इस्तेमाल करते हैं।
ओडिशा में कुल 1,957 झरने दर्ज किए गए। इनमें 1,568 पूरे साल बहने वाले, 315 मौसमी और 74 सूखे हैं। करीब 96% झरने सार्वजनिक स्वामित्व में हैं। खतरे के आकलन में शामिल 1,878 झरनों में से 295 यानी 15.7% खतरे में पाए गए।
पश्चिम बंगाल में 1,686 झरने दर्ज किए गए। इनमें दार्जिलिंग में 1,200 और कलिम्पोंग में 427 झरने मिले। रिपोर्ट के मुताबिक, इन क्षेत्रों के कई ग्रामीण और आदिवासी समुदायों के लिए झरने पीने के पानी का महत्वपूर्ण स्रोत हैं।
गोवा में 1,196 झरने मिले हैं। इनमें 1,105 पूरे साल बहने वाले, 66 मौसमी और 25 सूखे हैं। खतरे के आकलन में शामिल झरनों में 61 यानी 5.2% खतरे में पाए गए।
त्रिपुरा में भी बड़ी संख्या में झरने दर्ज हुए। सबसे ज्यादा 398 झरने धलाई, 238 नॉर्थ त्रिपुरा और 205 खोवाई में मिले हैं।
असम में 792 झरने दर्ज किए गए। इनमें 662 पूरे साल बहने वाले, 127 मौसमी और 3 सूखे हैं। खतरे के आकलन में शामिल 784 झरनों में से 41 यानी 5.2% खतरे में पाए गए।
तेलंगाना में 148 झरने मिले, जबकि आंध्र प्रदेश में सिर्फ 34 झरने दर्ज किए गए। राजस्थान में सबसे कम 13 झरने मिले, जिनमें 8 पूरे साल बहने वाले और 5 मौसमी हैं।
देश की पहली स्प्रिंग सेंसस को डिजिटल तरीके से पूरा किया गया। डेटा एंड्रॉयड आधारित मोबाइल ऐप के जरिए जुटाया गया और केंद्रीय वेब प्लेटफॉर्म पर सुरक्षित किया गया। इसका आधार वर्ष 2023-24 रखा गया था।
रिपोर्ट में झरनों की सुरक्षा के लिए व्यवस्थित मैपिंग और नियमित निगरानी की जरूरत बताई गई है। साथ ही, बुनियादी ढांचा तैयार करते समय झरना क्षेत्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और इनके प्रबंधन के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार करने की सिफारिश की गई है।
जल शक्ति मंत्रालय के अनुसार, यह रिपोर्ट शामिल किए गए 10 राज्यों में झरना-क्षेत्र प्रबंधन की योजनाएं बनाने और उन्हें लागू करने के लिए नीति-निर्माताओं तथा संबंधित एजेंसियों के संदर्भ दस्तावेज के रूप में काम करेगी।