नई दिल्ली। होर्मुज संकट के बीच भारत अपनी ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए वैकल्पिक रास्तों पर काम कर रहा है। इसी रणनीति के तहत भारत और यूएई के बीच समुद्र के नीचे तेल और गैस पाइपलाइन बिछाने की तैयारी की जा रही है। प्रस्तावित पाइपलाइन अरब सागर के नीचे से होकर गुजरात और महाराष्ट्र के तट तक पहुंच सकती है।
केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने 28 सितंबर को यूएई के विदेश व्यापार मंत्री थानी बिन अहमद अल जेउदी से मुलाकात के बाद इस परियोजना से जुड़ी तैयारियों की पुष्टि की। सरकार ने ओमान और यूएई से भारत तक समुद्र के नीचे पाइपलाइन परियोजना को प्राथमिकता वाली योजनाओं में शामिल किया है।
प्रस्तावित MEIDP यानी मिडिल ईस्ट टू इंडिया डीप-वॉटर पाइपलाइन के तहत पाइपलाइन ओमान और यूएई के तट से शुरू होकर अरब सागर के नीचे से गुजरते हुए गुजरात और महाराष्ट्र के तट तक पहुंच सकती है।
इस परियोजना का उद्देश्य भारत तक ऊर्जा आपूर्ति के लिए समुद्री मार्ग पर निर्भरता के बीच एक वैकल्पिक बुनियादी ढांचा तैयार करना है। हालांकि, परियोजना की तकनीकी व्यवहार्यता, लागत और सुरक्षा से जुड़े पहलुओं का अभी विस्तृत अध्ययन किया जा रहा है।
जून में सरकार ने इस परियोजना को निजी क्षेत्र की परियोजना के तौर पर बताया था। शुरुआती योजना में मुख्य रूप से गैस पाइपलाइन बिछाने का प्रस्ताव था। अब इसमें समुद्र के रास्ते कच्चा तेल भारत तक पहुंचाने की संभावना पर भी तकनीकी अध्ययन शुरू किया गया है।
पेट्रोलियम मंत्रालय के निर्देश पर सरकारी कंपनियां परियोजना की विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर रही हैं। रिपोर्ट में गहरे समुद्र में पाइपलाइन बिछाने की तकनीक, अनुमानित लागत, सुरक्षा और अन्य तकनीकी पहलुओं का अध्ययन किया जाएगा।
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का करीब 88% हिस्सा आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों में तनाव या किसी तरह का व्यवधान देश की ऊर्जा आपूर्ति को प्रभावित कर सकता है।
होर्मुज क्षेत्र में तनाव के बीच भारत ऊर्जा आपूर्ति के लिए वैकल्पिक रास्ते और बुनियादी ढांचा तैयार करने पर जोर दे रहा है। इसी संदर्भ में समुद्र के नीचे पाइपलाइन परियोजना को महत्वपूर्ण विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है।
भारत को मिलने वाली आधे से अधिक LPG और LNG आपूर्ति भी कतर और यूएई जैसे खाड़ी देशों से समुद्री मार्ग के जरिए आती है। ऐसे में प्रस्तावित पाइपलाइन परियोजना भविष्य में ऊर्जा आपूर्ति के लिए एक अतिरिक्त विकल्प उपलब्ध कराने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकती है।