ईरान से जुड़े युद्ध और मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव का असर अब वैश्विक तेल बाजार पर साफ दिखाई दे रहा है। कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर से ऊपर बनी हुई हैं और सप्लाई को लेकर अनिश्चितता ने दुनिया के कई देशों की चिंता बढ़ा दी है। ऐसे समय में तेल बाजार की नजर OPEC+ के फैसले पर थी। संगठन के सात प्रमुख देशों ने नवंबर के लिए तेल उत्पादन में किसी बदलाव से फिलहाल परहेज किया है। इसका मतलब है कि अगले महीने उत्पादन न तो बढ़ाया जाएगा और न ही मौजूदा स्तर से घटाया जाएगा।
OPEC+ का यह निर्णय ऐसे समय आया है जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों पर भू-राजनीतिक तनाव का दबाव बना हुआ है। 5 अक्टूबर की सुबह ब्रेंट क्रूड लगभग 102 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार करता नजर आया। शुरुआती कारोबार में इसकी कीमत 103 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को भी पार कर गई थी। बाजार में तेजी के पीछे सबसे बड़ी चिंता मध्य पूर्व से होने वाली तेल आपूर्ति को लेकर है।
ईरान से जुड़े संघर्ष ने तेल के उत्पादन और निर्यात के साथ-साथ समुद्री मार्गों की सुरक्षा को लेकर भी सवाल खड़े किए हैं। खासतौर पर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर दुनिया की नजर बनी हुई है। यह जलमार्ग वैश्विक ऊर्जा व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इस रास्ते से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पाद अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचते हैं। यहां किसी भी तरह की बड़ी रुकावट से वैश्विक सप्लाई प्रभावित होने की आशंका रहती है।
तेल की कीमतों में तेज उछाल का असर सिर्फ ऊर्जा कंपनियों तक सीमित नहीं रहता। कच्चा तेल महंगा होने पर पेट्रोल, डीजल, परिवहन, उत्पादन और कई दूसरी वस्तुओं की लागत बढ़ सकती है। इससे पहले से महंगाई का सामना कर रहे देशों के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं। तेल आयात पर ज्यादा निर्भर अर्थव्यवस्थाओं पर इसका असर अपेक्षाकृत ज्यादा पड़ सकता है।
इसी बीच G7 देशों ने बाजार में अतिरिक्त तेल और ईंधन उपलब्ध कराने की दिशा में कदम बढ़ाया है। रिपोर्टों के अनुसार, G7 करीब 10 करोड़ बैरल तेल और पेट्रोलियम उत्पाद रणनीतिक भंडार से बाजार में लाने की योजना पर आगे बढ़ रहा है। इसकी शुरुआत डीजल से किए जाने की बात सामने आई है और शुरुआती खेप आने वाले कुछ हफ्तों में बाजार में पहुंच सकती है।
रणनीतिक भंडार से ईंधन जारी करने का उद्देश्य बाजार में उपलब्धता बढ़ाना और सप्लाई को लेकर बनी चिंता को कम करना है। यदि अतिरिक्त आपूर्ति पर्याप्त मात्रा में बाजार तक पहुंचती है तो इससे कीमतों पर कुछ हद तक दबाव कम हो सकता है। हालांकि, इसका असर इस बात पर निर्भर करेगा कि युद्ध की स्थिति और मध्य पूर्व से तेल निर्यात पर इसका प्रभाव किस दिशा में जाता है।
दूसरी ओर, OPEC+ की ओर से उत्पादन नहीं बढ़ाने का फैसला बाजार में अतिरिक्त सप्लाई की उम्मीद को सीमित करता है। ऐसे में आने वाले दिनों में तेल बाजार के लिए दो प्रमुख पहलू अहम रहेंगे—एक तरफ मध्य पूर्व में संघर्ष और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की स्थिति, जबकि दूसरी तरफ G7 के रणनीतिक भंडार से बाजार में आने वाली अतिरिक्त आपूर्ति।
अगर मध्य पूर्व से तेल की आवाजाही में बड़ी बाधा आती है तो कच्चे तेल की कीमतों में और तेजी देखने को मिल सकती है। इसके उलट यदि समुद्री मार्ग सामान्य रहते हैं और G7 का अतिरिक्त ईंधन बाजार में पहुंचता है, तो कीमतों को कुछ राहत मिल सकती है। अब बाजार की नजर OPEC+ की अगली बड़ी बैठक पर रहेगी, जो 1 नवंबर को प्रस्तावित है। इस बैठक में उत्पादन नीति को लेकर होने वाला फैसला आने वाले महीनों के तेल बाजार की दिशा के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।