नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के तीसरे कार्यकाल के दौरान मंत्रिपरिषद में संभावित बदलाव को लेकर एक बार फिर राजनीतिक चर्चाएं तेज हो गई हैं। इसकी बड़ी वजह भारतीय जनता पार्टी की ओर से उत्तर प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटों के लिए घोषित आठ उम्मीदवारों की सूची है। भाजपा ने अपने मौजूदा राज्यसभा सदस्यों और केंद्रीय मंत्रियों हरदीप सिंह पुरी तथा बीएल वर्मा को इस बार उम्मीदवार नहीं बनाया है। दोनों नेताओं का राज्यसभा कार्यकाल समाप्त होने वाला है। इस फैसले के बाद उनके केंद्रीय मंत्रिपद को लेकर भी अटकलें तेज हो गई हैं।
भाजपा ने सोमवार को उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के लिए धर्मपाल सिंह, राधाकांत ओझा, प्रकाश पाल, विद्यासागर सोनकर, गोपी कृष्ण पांडेय, प्रियंका सिंह रावत, राम प्रताप सिंह चौहान और श्रुति गंगवार के नाम घोषित किए। पार्टी ने इस सूची में सभी नए चेहरों को मौका दिया है। दो महिला उम्मीदवारों के साथ संगठन से जुड़े नेताओं और अलग-अलग सामाजिक समूहों को प्रतिनिधित्व दिया गया है। राज्यसभा चुनाव 16 अक्टूबर को होने हैं।
उत्तर प्रदेश से हरदीप सिंह पुरी और बीएल वर्मा को दोबारा राज्यसभा नहीं भेजे जाने को केंद्र सरकार के स्तर पर संभावित बदलाव से जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि, अभी तक दोनों नेताओं के इस्तीफे या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से मंत्रिमंडल में बदलाव को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। इसलिए फिलहाल इसे राजनीतिक अटकल के तौर पर ही देखा जा रहा है। पुरी वर्तमान में पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हैं, जबकि बीएल वर्मा केंद्रीय स्तर पर राज्यमंत्री हैं।
मंत्रिपरिषद की मौजूदा संरचना पर नजर डालें तो कई मंत्रियों के पास एक से अधिक मंत्रालयों या विभागों की जिम्मेदारी है। प्रधानमंत्री कार्यालय की आधिकारिक सूची के अनुसार अमित शाह के पास गृह और सहकारिता, जेपी नड्डा के पास स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण तथा रसायन एवं उर्वरक, शिवराज सिंह चौहान के पास कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास और निर्मला सीतारमण के पास वित्त एवं कॉरपोरेट मामलों का प्रभार है। मनोहर लाल के पास आवास एवं शहरी मामलों के साथ बिजली मंत्रालय भी है। इसके अलावा कुछ राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार के पास भी एक से अधिक जिम्मेदारियां हैं। इससे यह चर्चा बढ़ती रही है कि सरकार भविष्य में कामकाज के बोझ को संतुलित करने के लिए मंत्रालयों के बंटवारे में बदलाव कर सकती है।
उपलब्ध रिपोर्टों में मौजूदा मंत्रिपरिषद में 68 मंत्री होने और अधिकतम संवैधानिक सीमा 81 तक होने का उल्लेख किया गया है। इस हिसाब से मंत्रिपरिषद में नए चेहरों को शामिल करने की गुंजाइश मौजूद है।हरदीप सिंह पुरी और बीएल वर्मा को राज्यसभा का टिकट नहीं मिलने से मंत्रिपरिषद में संभावित खाली होने वाली जगहों को लेकर चर्चा और बढ़ गई है। इससे पहले भी राज्यसभा में दोबारा नहीं भेजे जाने के बाद कुछ मंत्रियों को केंद्रीय मंत्रिपरिषद से बाहर होना पड़ा है। हालांकि, किसी मंत्री का राज्यसभा कार्यकाल समाप्त होना अपने आप में मंत्रिपद समाप्त होने का तत्काल कारण नहीं है। आगे की स्थिति प्रधानमंत्री और पार्टी नेतृत्व के फैसले पर निर्भर करेगी।

मंत्रिपरिषद में फेरबदल की चर्चा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि केंद्र सरकार अपने तीसरे कार्यकाल के मध्य चरण में पहुंच चुकी है। सरकार के सामने प्रशासनिक जिम्मेदारियों के साथ आने वाले राज्यों के विधानसभा चुनाव भी हैं। उत्तर प्रदेश में 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं और भाजपा की नई राज्यसभा सूची में सामाजिक तथा क्षेत्रीय संतुलन पर जोर दिखाई देता है। ऐसे में संभावित केंद्रीय मंत्रिमंडल बदलाव में भी राजनीतिक और क्षेत्रीय समीकरणों पर ध्यान दिए जाने की अटकलें लगाई जा रही हैं।
पंजाब को लेकर भी संभावित बदलाव की चर्चा हो रही है। हरदीप सिंह पुरी के बाद केंद्र में सिख प्रतिनिधित्व से जुड़े सवाल उठ सकते हैं, जबकि मौजूदा मंत्रिपरिषद में अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व को लेकर भी राजनीतिक नजरें बनी हुई हैं। हालांकि, अगले मंत्रिमंडल विस्तार में किन राज्यों और सामाजिक समूहों को प्रतिनिधित्व मिलेगा, इसे लेकर अभी कोई आधिकारिक संकेत नहीं दिया गया है।संवैधानिक व्यवस्था के मुताबिक केंद्रीय मंत्रिपरिषद की कुल संख्या लोकसभा की कुल सदस्य संख्या के 15 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती। इस सीमा के भीतर सरकार के पास नए मंत्रियों को शामिल करने की पर्याप्त गुंजाइश है।
मौजूदा समय में कई वरिष्ठ मंत्रियों के पास अतिरिक्त मंत्रालय होने के कारण संभावित फेरबदल की चर्चा को प्रशासनिक जरूरतों से भी जोड़ा जा रहा है। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि उत्तर प्रदेश की राज्यसभा सूची में जगह नहीं पाने वाले हरदीप सिंह पुरी और बीएल वर्मा की आगे की भूमिका क्या होगी और क्या इसके बाद मोदी मंत्रिपरिषद में बदलाव होता है। भाजपा ने इस संबंध में अभी कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की है। इसलिए शीतकालीन सत्र से पहले संभावित विस्तार या फेरबदल को लेकर चल रही चर्चाओं पर अंतिम तस्वीर प्रधानमंत्री और भाजपा नेतृत्व के अगले फैसलों के बाद ही साफ होगी।