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Facebook खोलते ही दिखेंगी Reels! भारत में नए फीचर की टेस्टिंग

फेसबुक का नया प्रयोग सोशल मीडिया पर वीडियो की बढ़ती अहमियत को दिखाता है। यदि यह अनुभव आगे बड़े स्तर पर लागू होता है, तो यूजर्स के ऐप खोलने से लेकर कंटेंट देखने तक का तरीका बदल सकता है।

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Gauravshali Bharat
Gauravshali Bharat News
  • October 10, 2026 10:01 pm IST, Published 2 hours ago

नई दिल्ली। अगर आप फेसबुक खोलते ही सबसे पहले दोस्तों की पोस्ट, फोटो, स्टेटस और ग्रुप अपडेट देखने के आदी हैं, तो आने वाले समय में आपका अनुभव बदल सकता है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक की पैरेंट कंपनी मेटा भारत में एक नए Reels-First Experience की टेस्टिंग कर रही है। इस प्रयोग के तहत कुछ चुनिंदा यूजर्स को ऐप खोलते ही पारंपरिक होम फीड के बजाय फुल-स्क्रीन वीडियो दिखाई दे रहे हैं। यानी फेसबुक खोलने के साथ ही रील्स सामने आ सकती हैं और यूजर्स सीधे वीडियो देखना शुरू कर सकते हैं।

टेक्नोलॉजी रिपोर्टों के मुताबिक, यह बदलाव फिलहाल सीमित यूजर्स के लिए परीक्षण के तौर पर किया जा रहा है। इसका मतलब यह नहीं है कि भारत में सभी फेसबुक यूजर्स का होमपेज एक साथ बदल दिया गया है। मेटा इस नए इंटरफेस के जरिए यह समझना चाहती है कि वीडियो-केंद्रित अनुभव लोगों को कितना पसंद आता है और इससे प्लेटफॉर्म पर उनकी गतिविधियों में क्या बदलाव होता है।

फेसबुक के पुराने होमपेज पर क्या पड़ेगा असर?

अब तक फेसबुक खोलने पर सामान्य तौर पर यूजर्स को न्यूज फीड दिखाई देती है। इसमें दोस्तों की पोस्ट, तस्वीरें, पेजों के अपडेट, ग्रुप की गतिविधियां और दूसरे प्रकार की सामग्री शामिल होती है। इसके बाद यूजर अपनी पसंद के अनुसार रील्स, वीडियो या अन्य सेक्शन में जाता है।

लेकिन नए प्रयोग में कुछ यूजर्स को ऐप लॉन्च करते ही फुल-स्क्रीन वीडियो इंटरफेस दिखाया जा रहा है। इससे फेसबुक का शुरुआती अनुभव पहले की तुलना में अधिक वीडियो-केंद्रित हो जाता है। यूजर्स को वीडियो देखने के लिए अलग से रील्स सेक्शन तलाशने की जरूरत कम हो सकती है।

यह बदलाव फेसबुक के कंटेंट दिखाने के तरीके में एक महत्वपूर्ण प्रयोग माना जा रहा है। हालांकि, पारंपरिक फीड को पूरी तरह समाप्त करने की घोषणा नहीं हुई है। रिपोर्ट के अनुसार, टेस्ट में शामिल यूजर्स को पुराने फीड-केंद्रित अनुभव पर लौटने का विकल्प भी मिल सकता है और क्लासिक फीड अलग टैब के रूप में उपलब्ध रहेगी।

भारत में ही क्यों शुरू हुआ यह प्रयोग?

भारत मेटा के लिए एक बड़ा डिजिटल बाजार है। यहां स्मार्टफोन और इंटरनेट के जरिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल व्यापक स्तर पर होता है। वीडियो देखने, साझा करने और छोटे वीडियो बनाने की लोकप्रियता ने फेसबुक, इंस्टाग्राम और दूसरे प्लेटफॉर्मों की रणनीति को भी प्रभावित किया है।

टेकक्रंच की 6 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, मेटा ने भारत में फेसबुक के Reels-First अनुभव की टेस्टिंग शुरू की है। कंपनी ने पहले इस तरह के वीडियो-केंद्रित अनुभव को वीडियो देखने में अधिक रुचि रखने वाले देशों में आजमाने की योजना का संकेत दिया था। बाद में मेटा के एक प्रवक्ता ने इंडोनेशिया में भी इस परीक्षण की पुष्टि की।

इस रणनीति के पीछे यूजर्स की बदलती आदतें अहम हो सकती हैं। अब बड़ी संख्या में लोग सोशल मीडिया पर केवल लिखित पोस्ट या तस्वीरें देखने के बजाय मनोरंजन, जानकारी, समाचार और शिक्षा से जुड़े वीडियो भी देखते हैं। छोटे वीडियो कम समय में अधिक जानकारी या मनोरंजन उपलब्ध करा सकते हैं। इसी वजह से सोशल मीडिया कंपनियां अपने प्लेटफॉर्म पर वीडियो की उपलब्धता और उन्हें खोजने के अनुभव को लगातार बेहतर बनाने में जुटी हैं।

हालांकि, यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि फेसबुक का भविष्य पूरी तरह रील्स पर ही निर्भर होगा। मौजूदा परीक्षण से कंपनी यूजर्स की पसंद और उनके व्यवहार को समझने की कोशिश कर रही है।

क्या सभी फेसबुक यूजर्स को दिखेंगी रील्स?

इस खबर का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि नया फीचर फिलहाल चुनिंदा यूजर्स के लिए टेस्ट किया जा रहा है। इसलिए यदि किसी यूजर के मोबाइल में फेसबुक पहले की तरह खुल रहा है, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि उसके फोन में कोई तकनीकी समस्या है।

टेस्टिंग के दौरान अलग-अलग यूजर्स को ऐप का अलग अनुभव मिल सकता है। कुछ लोगों को शुरुआत में फुल-स्क्रीन वीडियो दिखाई दे सकते हैं, जबकि अन्य यूजर्स को पारंपरिक न्यूज फीड ही नजर आ सकती है।

रिपोर्ट के मुताबिक, परीक्षण में शामिल यूजर्स के पास फीड-केंद्रित अनुभव पर वापस जाने का विकल्प भी हो सकता है। ऐसे में फिलहाल पुराने होमपेज को पूरी तरह खत्म किए जाने की बात कहना सही नहीं होगा।

यूजर्स को सलाह है कि वे इस बदलाव को लेकर किसी अफवाह पर भरोसा न करें। यदि उनके फेसबुक ऐप में नया इंटरफेस दिखाई देता है, तो उपलब्ध विकल्पों को देखकर अपनी पसंद के अनुसार उसका इस्तेमाल कर सकते हैं।

कंटेंट क्रिएटर्स के लिए क्या है इसका मतलब?

फेसबुक पर वीडियो बनाकर दर्शकों तक पहुंचने वाले क्रिएटर्स, डिजिटल मीडिया संस्थानों और छोटे कारोबारियों के लिए यह बदलाव महत्वपूर्ण हो सकता है। यदि ऐप खुलते ही वीडियो को प्रमुखता मिलती है, तो यूजर्स की नजर शुरुआत में ही वीडियो सामग्री पर जा सकती है।

इससे समाचार, शिक्षा, मनोरंजन, स्थानीय घटनाओं और उत्पादों से जुड़े वीडियो बनाने वालों के लिए नए अवसर पैदा होने की संभावना है। उदाहरण के तौर पर, स्थानीय समाचार संस्थान किसी घटना की छोटी वीडियो रिपोर्ट, संवाददाता का कैमरा बाइट या किसी सरकारी योजना की जानकारी रील्स के रूप में प्रस्तुत कर सकते हैं।

हालांकि, ऐप खुलते ही रील्स दिखने का अर्थ यह नहीं है कि हर वीडियो को अधिक व्यूज मिलेंगे। वीडियो की पहुंच कई कारकों पर निर्भर कर सकती है, जैसे दर्शकों की रुचि, कंटेंट की गुणवत्ता, देखने का समय और प्लेटफॉर्म की वितरण व्यवस्था। मेटा ने इस परीक्षण के आधार पर सभी क्रिएटर्स की पहुंच बढ़ने की कोई गारंटी नहीं दी है।

इसलिए क्रिएटर्स को केवल छोटे वीडियो बनाने पर ध्यान देने के बजाय उनकी तथ्यात्मक शुद्धता, आकर्षक प्रस्तुति और दर्शकों के लिए उपयोगिता पर भी काम करना चाहिए।

फेसबुक की वीडियो रणनीति में बड़ा बदलाव

मेटा पिछले कुछ समय से फेसबुक पर वीडियो को अधिक प्रमुखता दे रही है। कंपनी ने पहले घोषणा की थी कि फेसबुक पर पोस्ट किए जाने वाले नए वीडियो रील्स के रूप में साझा किए जाएंगे, चाहे उनकी लंबाई या प्रारूप कुछ भी हो। इसके साथ ही ऐप में वीडियो टैब का नाम बदलकर रील्स किया गया था।

यह रणनीति सोशल मीडिया के बदलते स्वरूप को दर्शाती है। पहले फेसबुक की पहचान दोस्तों से जुड़ने, तस्वीरें साझा करने और स्टेटस अपडेट करने वाले प्लेटफॉर्म के रूप में थी। अब इसमें वीडियो, लाइव प्रसारण, क्रिएटर कंटेंट और मनोरंजन की भूमिका भी बढ़ रही है।

कंपनियों के लिए वीडियो यूजर्स को लंबे समय तक प्लेटफॉर्म पर बनाए रखने का एक माध्यम हो सकता है। वहीं, यूजर्स को अपनी पसंद के अनुसार सामग्री देखने के अधिक अवसर मिल सकते हैं। दूसरी ओर, जो लोग केवल दोस्तों की पोस्ट और जरूरी अपडेट देखना चाहते हैं, उनके लिए वीडियो-केंद्रित इंटरफेस कम सुविधाजनक भी साबित हो सकता है।

इसी संतुलन को समझना इस तरह की टेस्टिंग का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

आगे क्या हो सकता है?

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि मेटा इस प्रयोग को कितने व्यापक स्तर पर लागू करेगी। परीक्षण के परिणामों के आधार पर कंपनी इंटरफेस में बदलाव कर सकती है या इसे चुनिंदा यूजर्स तक सीमित रख सकती है। भविष्य में दूसरे देशों में विस्तार की संभावना भी कंपनी की रणनीति और परीक्षण के नतीजों पर निर्भर करेगी।

फिलहाल फेसबुक यूजर्स के लिए जरूरी बात यह है कि रील्स-फर्स्ट अनुभव की टेस्टिंग को सभी अकाउंट्स पर लागू होने वाला स्थायी बदलाव न समझें। आने वाले समय में मेटा की ओर से होने वाली आधिकारिक घोषणाओं से इसकी स्थिति और स्पष्ट हो सकती है।

निष्कर्ष: फेसबुक का नया प्रयोग सोशल मीडिया पर वीडियो की बढ़ती अहमियत को दिखाता है। यदि यह अनुभव आगे बड़े स्तर पर लागू होता है, तो यूजर्स के ऐप खोलने से लेकर कंटेंट देखने तक का तरीका बदल सकता है। लेकिन अभी इसे सीमित परीक्षण के रूप में ही देखना चाहिए। पुराने न्यूज फीड के पूरी तरह खत्म होने या सभी यूजर्स को रील्स दिखने की पुष्टि नहीं हुई है।

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