नई दिल्ली। देश में प्रतिबंधित ई-सिगरेट की कथित तस्करी, ऑनलाइन बिक्री और युवाओं के बीच इसके बढ़ते इस्तेमाल को लेकर चिंता बढ़ रही है। पारंपरिक सिगरेट के विकल्प के रूप में प्रचारित किए जाने वाले इन इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को कई युवा कम नुकसानदेह समझ लेते हैं, लेकिन निकोटीन की लत और फेफड़ों पर पड़ने वाले संभावित दुष्प्रभावों के कारण यह धारणा जोखिमपूर्ण हो सकती है। खासकर किशोरों और कम उम्र के युवाओं में इसका इस्तेमाल स्वास्थ्य के साथ-साथ भविष्य की जीवनशैली को भी प्रभावित कर सकता है।
सोशल मीडिया पर सामने आई एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि थाईलैंड, कंबोडिया और चीन से ई-सिगरेट भारत में मंगाई जा रही हैं। रिपोर्ट के अनुसार, नशीले पदार्थों के खिलाफ कार्रवाई तेज होने के बाद कुछ लोग प्रतिबंधित उत्पादों की ओर रुख कर रहे हैं। हालांकि, इन देशों से होने वाली कथित तस्करी के दावों, जब्त उत्पादों की मात्रा और नेटवर्क की वास्तविक स्थिति की पुष्टि संबंधित आधिकारिक आंकड़ों से की जानी चाहिए।
ई-सिगरेट का मुद्दा केवल अवैध कारोबार तक सीमित नहीं है। इसका संबंध युवाओं के स्वास्थ्य, ऑनलाइन खरीद-बिक्री, स्कूल-कॉलेजों के आसपास जागरूकता और कानून के प्रभावी क्रियान्वयन से भी है।
ई-सिगरेट क्या है और यह कैसे काम करती है?
ई-सिगरेट एक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण है, जो तरल पदार्थ को गर्म करके एरोसोल बनाता है। इसे इस्तेमाल करने वाला व्यक्ति इस एरोसोल को सांस के जरिए शरीर के भीतर लेता है। बाजार में उपलब्ध कई उत्पादों में निकोटीन, फ्लेवर और अन्य रासायनिक तत्व हो सकते हैं। कुछ उत्पादों में मौजूद निकोटीन की मात्रा स्पष्ट रूप से बताई नहीं जाती या उनकी पैकेजिंग पर दी गई जानकारी भ्रामक हो सकती है।
इन उपकरणों को कई बार आकर्षक डिजाइन, फलों या मिठाइयों जैसे फ्लेवर और आधुनिक तकनीक वाले गैजेट के रूप में पेश किया जाता है। इससे युवाओं में इनके प्रति जिज्ञासा बढ़ सकती है। देखने में छोटा और सामान्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण जैसा लगने के कारण इसे छिपाकर इस्तेमाल करना भी कुछ लोगों के लिए आसान हो जाता है।
लेकिन किसी उत्पाद का छोटा आकार, अच्छी खुशबू या धुएं का कम दिखाई देना उसे सुरक्षित नहीं बनाता। ई-सिगरेट के एरोसोल में निकोटीन के अलावा सूक्ष्म कण और अन्य संभावित हानिकारक पदार्थ मौजूद हो सकते हैं।
युवाओं के ब्रेन पर निकोटीन का क्या पड़ता है असर?
ई-सिगरेट से जुड़ी सबसे बड़ी चिंताओं में निकोटीन की लत शामिल है। किशोरावस्था और युवावस्था में मस्तिष्क का विकास जारी रहता है। ऐसे समय में निकोटीन का सेवन ध्यान केंद्रित करने, सीखने, मनोदशा और व्यवहार को नियंत्रित करने वाली प्रक्रियाओं को प्रभावित कर सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) भी बच्चों और किशोरों में निकोटीन के इस्तेमाल को गंभीर स्वास्थ्य चिंता मानता है।
शुरुआत में कुछ युवा इसे दोस्तों के साथ प्रयोग करने या फैशन के तौर पर अपनाते हैं। धीरे-धीरे बार-बार इस्तेमाल करने की इच्छा बढ़ सकती है। जब शरीर निकोटीन का आदी होने लगता है, तो इसे छोड़ना मुश्किल हो सकता है। चिड़चिड़ापन, बेचैनी और ध्यान लगाने में परेशानी जैसे लक्षण भी सामने आ सकते हैं।
विशेषज्ञों की चिंता यह भी है कि कम उम्र में निकोटीन का संपर्क भविष्य में तंबाकू उत्पादों के इस्तेमाल की संभावना बढ़ा सकता है। इसलिए अभिभावकों और शिक्षकों के लिए जरूरी है कि वे बच्चों को केवल डांटने के बजाय इसके स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों के बारे में सही जानकारी दें।
फेफड़ों और सांस लेने की क्षमता पर खतरा
ई-सिगरेट का एरोसोल सामान्य जलवाष्प नहीं होता। इसमें निकोटीन, सूक्ष्म कण और विभिन्न रासायनिक पदार्थ हो सकते हैं। इनका सांस के साथ शरीर में प्रवेश फेफड़ों और श्वसन तंत्र को नुकसान पहुंचा सकता है। कुछ पदार्थों का संबंध फेफड़ों में जलन और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं से भी पाया गया है।
लगातार खांसी, गले में जलन, सांस फूलना और सीने में असहजता जैसे लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। हालांकि, हर व्यक्ति में लक्षण एक जैसे नहीं होते और केवल लक्षणों के आधार पर ई-सिगरेट से होने वाली बीमारी की पुष्टि नहीं की जा सकती।
यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि ई-सिगरेट के दीर्घकालिक प्रभावों पर शोध जारी है। इसके बावजूद उपलब्ध वैज्ञानिक साक्ष्य इसे सुरक्षित उत्पाद मानने का समर्थन नहीं करते। खासकर उन लोगों के लिए, जिन्होंने पहले कभी धूम्रपान नहीं किया है, इसका इस्तेमाल शुरू करना अनावश्यक स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर सकता है।
भारत में ई-सिगरेट पर प्रतिबंध, जानें कानून
भारत सरकार ने वर्ष 2019 में इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट के उत्पादन, निर्माण, आयात, निर्यात, परिवहन, बिक्री, वितरण, भंडारण और विज्ञापन पर प्रतिबंध लगाने के लिए कानून लागू किया था। इसका उद्देश्य सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा करना और लोगों को इन उत्पादों से होने वाले नुकसान से बचाना है।
इस कानून के तहत प्रतिबंधित गतिविधियों में शामिल होने पर कानूनी कार्रवाई का प्रावधान है। इसलिए ऑनलाइन या ऑफलाइन माध्यम से ई-सिगरेट बेचने, मंगाने अथवा वितरित करने से जुड़े मामलों में संबंधित कानून और परिस्थितियों के आधार पर जांच की जा सकती है।
हालांकि, सोशल मीडिया पर किसी उत्पाद की उपलब्धता का दावा सामने आने मात्र से यह साबित नहीं होता कि किसी विशेष व्यक्ति या कारोबारी ने कानून का उल्लंघन किया है। ऐसे मामलों में जांच एजेंसियों को बिक्री के रिकॉर्ड, आपूर्ति श्रृंखला, डिजिटल लेनदेन और अन्य साक्ष्यों की पुष्टि करनी होती है।
ऑनलाइन बिक्री और तस्करी पर निगरानी क्यों जरूरी?
डिजिटल प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया के माध्यम से प्रतिबंधित उत्पादों के प्रचार या बिक्री की आशंका को देखते हुए निगरानी महत्वपूर्ण है। आकर्षक तस्वीरों, फ्लेवर के नाम और छोटे वीडियो के जरिए किसी उत्पाद को सामान्य या हानिरहित बताने की कोशिश युवाओं को प्रभावित कर सकती है।
सीमा शुल्क, पुलिस और संबंधित प्रवर्तन एजेंसियों के बीच समन्वय से प्रतिबंधित उत्पादों की आपूर्ति पर कार्रवाई में मदद मिल सकती है। साथ ही, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर कानून के उल्लंघन से जुड़ी सामग्री की पहचान और नियमानुसार कार्रवाई भी आवश्यक है।
दिल्ली सहित अन्य शहरों में ऐसे मामलों की वास्तविक स्थिति समझने के लिए आधिकारिक जब्ती, प्राथमिकी और जांच संबंधी आंकड़ों का सहारा लेना चाहिए। थाईलैंड, कंबोडिया और चीन से ई-सिगरेट की आपूर्ति के दावों को भी स्वतंत्र रूप से सत्यापित करना जरूरी है, ताकि अपुष्ट जानकारी को तथ्य के रूप में प्रस्तुत न किया जाए।
माता-पिता और स्कूलों की भूमिका भी अहम
युवाओं को ई-सिगरेट से दूर रखने के लिए केवल पुलिस कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। परिवार, स्कूल, कॉलेज और स्वास्थ्य संस्थानों को भी जागरूकता अभियान चलाने चाहिए।
अभिभावकों को बच्चों के व्यवहार में अचानक बदलाव, निकोटीन उत्पादों से संबंधित सामग्री और संदिग्ध ऑनलाइन खरीदारी पर संवेदनशीलता के साथ ध्यान देना चाहिए। इसका उद्देश्य बच्चों की निजता में अनावश्यक हस्तक्षेप करना नहीं, बल्कि उन्हें सुरक्षित रखना और सही जानकारी उपलब्ध कराना होना चाहिए।
स्कूलों और कॉलेजों में विशेषज्ञों के माध्यम से जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जा सकते हैं। इनमें निकोटीन की लत, फेफड़ों पर पड़ने वाले प्रभाव और प्रतिबंधित उत्पादों से जुड़े कानूनी पहलुओं को सरल भाषा में समझाया जाना चाहिए।
यदि कोई युवा पहले से ई-सिगरेट का इस्तेमाल कर रहा है, तो उसे शर्मिंदा करने के बजाय डॉक्टर या तंबाकू छोड़ने में सहायता देने वाली स्वास्थ्य सेवाओं से संपर्क करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।
जागरूकता और सख्त निगरानी से ही रुकेगा खतरा
ई-सिगरेट का बढ़ता आकर्षण युवाओं के स्वास्थ्य और सार्वजनिक सुरक्षा से जुड़ा विषय है। प्रतिबंधित उत्पादों की बिक्री पर प्रभावी निगरानी, कानून का निष्पक्ष पालन और वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित जागरूकता इस चुनौती से निपटने के महत्वपूर्ण उपाय हैं।
सबसे जरूरी बात यह है कि युवा ई-सिगरेट को फैशन, स्टाइल या सामान्य गैजेट समझकर इस्तेमाल शुरू न करें। निकोटीन की लत और श्वसन तंत्र पर संभावित दुष्प्रभावों को देखते हुए इससे दूरी बनाना ही सुरक्षित विकल्प है।
संपादकीय निष्कर्ष: युवाओं को ई-सिगरेट के जोखिमों से बचाने के लिए परिवार, शिक्षण संस्थानों और प्रशासन को मिलकर काम करना होगा। साथ ही, तस्करी और अवैध बिक्री से संबंधित दावों को प्रमाणों के आधार पर जांचना आवश्यक है, ताकि जनहित में सही और विश्वसनीय जानकारी लोगों तक पहुंच सके।