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यूपी में SIR पर बवाल, 85 हजार से अधिक फॉर्म-7 में कारण दर्ज नहीं होने का दावा !

स्पष्टीकरण के बाद भी फॉर्म में कारण दर्ज होने को लेकर सवाल कायम हैं। यदि नाम हटाने का आधार संबंधित आदेशों में मौजूद था, तो क्या उन आदेशों को सार्वजनिक किया जा सकता है? क्या प्रत्येक विवादित मामले में जांच और सुनवाई का पूरा रिकॉर्ड उपलब्ध है? इन प्रश्नों के जवाब मिलने से प्रक्रिया की पारदर्शिता…

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Gauravshali Bharat News
  • October 11, 2026 1:10 pm IST, Published 2 hours ago
उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची के विशेष प्रगाढ़ पुनरीक्षण (SIR) को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। मतदाताओं के नाम हटाने के लिए फॉर्म-7 तैयार किए जाने की प्रक्रिया और उसमें दर्ज विवरणों को लेकर उठे सवालों के बीच प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिणवा ने निर्वाचन कार्यालय का पक्ष रखा है। कार्यालय ने आरोपों को भ्रामक बताया है, लेकिन उसके स्पष्टीकरण के बाद भी फॉर्म-7 के इस्तेमाल, आवेदन में कारण दर्ज करने और निर्धारित समयसीमा के बाद आए अनुरोधों को लेकर कई सवाल बने हुए हैं।विवाद की शुरुआत द रिपोर्टर्स कलेक्टिव की एक खोजी रिपोर्ट से हुई। रिपोर्ट में चुनाव आयोग की वेबसाइट पर उपलब्ध 4.3 लाख से अधिकफॉर्म-7 का विश्लेषण करने का दावा किया गया है। इसके मुताबिक, निर्वाचन रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों और सहायक निर्वाचन रजिस्ट्रीकरणअधिकारियों से जुड़े 87,127 विलोपन अनुरोधों में से 85,854 फॉर्म में मतदाता का नाम हटाने का स्पष्ट कारण दर्ज नहीं था। रिपोर्ट के अनुसार,यह संख्या संबंधित अनुरोधों का लगभग 98.5 प्रतिशत है।

रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि निर्वाचन आयोग के ERONET सॉफ्टवेयर के माध्यम से फॉर्म-7 स्वतः तैयार किए गए और उन पर अधिकारियों के डिजिटल हस्ताक्षर मौजूद थे। कुछ निर्वाचन अधिकारियों के हवाले से बताया गया कि सुनवाई के दौरान किसी मतदाता को अपात्र घोषित करने के बाद सॉफ्टवेयर उनके नाम से फॉर्म तैयार कर देता था। इससे यह सवाल उठा कि मतदाता की पात्रता पर फैसला लेने वाले अधिकारी के नाम से ही नाम हटाने संबंधी आवेदन तैयार करने की आवश्यकता क्यों पड़ी।

मुख्य निर्वाचन अधिकारी के अनुसार, संबंधित अधिकारियों ने स्वतः संज्ञान लेकर मामलों की जांच की, मतदाताओं को नोटिस दिए और सुनवाई के बाद उनकी पात्रता पर निर्णय लिया। उनके पक्ष के मुताबिक, फॉर्म-7 तैयार करने का उद्देश्य संबंधित कार्रवाई का रिकॉर्ड सुरक्षित रखना था, ताकि भविष्य में यह पता लगाया जा सके कि मतदाता का नाम किस आधार पर हटाया गया।

हालांकि, इस स्पष्टीकरण के बाद भी फॉर्म में कारण दर्ज होने को लेकर सवाल कायम हैं। यदि नाम हटाने का आधार संबंधित आदेशों में मौजूद था, तो क्या उन आदेशों को सार्वजनिक किया जा सकता है? क्या प्रत्येक विवादित मामले में जांच और सुनवाई का पूरा रिकॉर्ड उपलब्ध है? इन प्रश्नों के जवाब मिलने से प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर स्थिति स्पष्ट हो सकती है।

विवाद का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू आवेदन की समयसीमा है। खोजी रिपोर्ट में दावा किया गया कि निर्धारित समयसीमा के बाद भी व्यक्तियों की ओर से 1,10,476 विलोपन अनुरोध स्वीकार किए गए। इसके अलावा, अधिकारियों से जुड़े 87,127 अनुरोध 15 मार्च से 2 अप्रैल के बीच दर्ज होने की बात भी सामने आई।

निर्वाचन कार्यालय का तर्क है कि आवेदन जमा करने की समयसीमा और पहले से लंबित मामलों की सुनवाई तथा निस्तारण की अवधि अलग-अलग होती हैं। ऐसे में यह स्पष्ट करना जरूरी है कि संबंधित अनुरोध वास्तव में कब दाखिल हुए, कितने समयसीमा के भीतर आए और कितने मामलों में बाद की कार्रवाई हुई। तारीखवार विवरण सामने आने से इस विवाद की स्वतंत्र जांच आसान हो सकती है।

रिपोर्ट में कुछ विधानसभा क्षेत्रों में मुस्लिम मतदाताओं के नाम हटाने के अनुरोधों को लेकर भी चिंता जताई गई है। तरबगंज और पीलीभीत में ऐसे अनुरोधों का बड़ा हिस्सा मुस्लिम मतदाताओं से संबंधित होने का दावा किया गया। तरबगंज में ‘रेशमा’ नाम से एक ही दिन एक बूथ के 188 मतदाताओं के खिलाफ आपत्तियां दर्ज किए जाने की बात भी रिपोर्ट में कही गई।

मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने बताया कि इन दोनों विधानसभा क्षेत्रों में रिपोर्ट में उल्लिखित संबंधित फॉर्म-7 निरस्त कर दिए गए थे। इसके बावजूद यह जानना महत्वपूर्ण है कि आवेदन किसने दाखिल किए, उनकी प्रामाणिकता की जांच कैसे हुई और यदि किसी स्तर पर गलत जानकारी दी गई थी, तो उसके संबंध में क्या कदम उठाए गए।

रिपोर्ट में 198 ऐसे मामलों का भी उल्लेख है, जिनमें एक व्यक्ति के नाम से दस से अधिक फॉर्म-7 दाखिल किए गए। इन मामलों में कुल 4,740 मतदाताओं के नाम हटाने के अनुरोध किए जाने का दावा है। निर्वाचन कार्यालय ने ऐसे मामलों की संख्या को कुल आवेदनों की तुलना में सीमित बताया है। फिर भी प्रत्येक मामले की जांच मतदाता सूची की विश्वसनीयता के लिए जरूरी है।

मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने रिपोर्ट तैयार करने वाले पत्रकारों की ओर से सवाल भेजने और जवाब के लिए दिए गए समय पर भी आपत्ति जताई। हालांकि, पत्रकारों को जवाब देने के लिए मिले समय का सवाल और मतदाता सूची में नाम हटाने की प्रक्रिया की वैधता अलग-अलग विषय हैं। दोनों का मूल्यांकन संबंधित तथ्यों और रिकॉर्ड के आधार पर किया जाना चाहिए।

प्रदेश में SIR के दौरान 3.26 करोड़ मतदाताओं को नो-मैपिंग और तार्किक विसंगतियों के आधार पर नोटिस जारी किए जाने का भी उल्लेख किया गया है। इतने बड़े स्तर पर पुनरीक्षण में प्रत्येक मतदाता को उचित सुनवाई का अवसर देना और फैसलों के कारण दर्ज करना बेहद महत्वपूर्ण है।

अब इस मामले में मूल आदेशों, सॉफ्टवेयर रिकॉर्ड, डिजिटल हस्ताक्षरों और आवेदन की तारीखों का पारदर्शी सत्यापन महत्वपूर्ण होगा। निर्वाचन कार्यालय ने प्रक्रिया को कानूनसम्मत बताया है, जबकि खोजी रिपोर्ट में इसके संचालन और संभावित दुरुपयोग पर सवाल उठाए गए हैं। इन दावों के बीच अंतिम निष्कर्ष स्वतंत्र जांच और उपलब्ध आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर ही निकाला जा सकता है।

 

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