बिहार : पटना हाईकोर्ट का अहम निर्णय: बिहार के बेगूसराय में वर्ष 2010 में हुई एक घटना से जुड़े मामले में पटना हाईकोर्ट ने दुष्कर्म के प्रयास और महिला की गरिमा पर हमले से संबंधित अपराधों के बीच कानूनी अंतर स्पष्ट किया है। अदालत ने कहा कि महिला का मुंह दबाकर उसे चुप कराने और उसके ऊपर लेटने जैसे कृत्य, यदि दुष्कर्म करने की दिशा में स्पष्ट कदम उठाने के पर्याप्त प्रमाणों से समर्थित न हों, तो भारतीय दंड संहिता की धारा 376/511 के तहत दुष्कर्म का प्रयास साबित करने के लिए अपने आप में पर्याप्त नहीं हैं। हालांकि, ऐसे कृत्य महिला के प्रति आपराधिक बल प्रयोग और उसकी लज्जा भंग करने के अपराध के दायरे में आ सकते हैं।
यह फैसला न्यायमूर्ति संदीप कुमार की पीठ ने आपराधिक अपील संख्या 579/2013 में 8 अक्टूबर 2026 को सुनाया। अदालत ने निचली अदालत के फैसले में बदलाव करते हुए दुष्कर्म के प्रयास की दोषसिद्धि को धारा 354 के तहत अपराध में परिवर्तित किया और घर में अनधिकृत प्रवेश से संबंधित धारा 448 के तहत दोषसिद्धि बरकरार रखी। अदालत ने सजा को पहले काटी गई अवधि तक सीमित करने के साथ पीड़िता को 25 हजार रुपये मुआवजा देने का निर्देश भी दिया।
क्या है पूरा मामला? 2010 की घटना से जुड़ा विवाद
यह मामला बिहार के बेगूसराय जिले का है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, 8 फरवरी 2010 की रात एक विधवा महिला अपने घर में सो रही थी। आरोप था कि इसी दौरान एक व्यक्ति उसके घर में घुसा, कमरे में जल रहे दीपक को बुझाया और महिला के ऊपर लेटकर उसका मुंह दबा दिया, ताकि वह शोर न मचा सके।
महिला के अनुसार, उसने विरोध करते हुए शोर मचाया। आवाज सुनकर आसपास के ग्रामीण मौके पर जुट गए और आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद महिला ने न्याय पाने के लिए कानूनी प्रक्रिया का सहारा लिया।
मामले में यह भी सामने आया कि शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि स्थानीय स्तर पर पुलिस से अपेक्षित कार्रवाई नहीं होने के बाद उसे अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा। शिकायत के आधार पर आगे की कानूनी प्रक्रिया शुरू हुई और मामला सुनवाई के लिए निचली अदालत तक पहुंचा।
निचली अदालत ने सुनाई थी चार साल की सजा
मामले की सुनवाई के बाद बेगूसराय की निचली अदालत ने वर्ष 2013 में आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 376/511 के तहत दुष्कर्म के प्रयास और धारा 448 के तहत घर में अनधिकृत प्रवेश का दोषी ठहराया था।
दुष्कर्म के प्रयास के अपराध में चार साल के कठोर कारावास और 2,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई थी। वहीं, घर में अनधिकृत प्रवेश के मामले में छह महीने के कठोर कारावास का दंड दिया गया था। दोनों सजाओं को साथ-साथ चलाने का आदेश था।
निचली अदालत के इस निर्णय को चुनौती देते हुए आरोपी ने पटना हाईकोर्ट में अपील दाखिल की। हाईकोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह था कि उपलब्ध साक्ष्य कानून की नजर में दुष्कर्म के प्रयास का अपराध साबित करते हैं या आरोपित कृत्य किसी अन्य आपराधिक श्रेणी में आते हैं।
हाईकोर्ट ने किन पहलुओं पर किया विचार?
हाईकोर्ट ने मामले के तथ्यों, शिकायतकर्ता के बयान और अभियोजन द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों का परीक्षण किया। अदालत ने घटना के मूल तथ्यों और दुष्कर्म के प्रयास जैसे गंभीर अपराध के कानूनी तत्वों के बीच अंतर पर विचार किया।
अदालत के समक्ष यह महत्वपूर्ण प्रश्न था कि क्या आरोपी के कथित कृत्य दुष्कर्म करने के प्रयास को स्पष्ट रूप से स्थापित करते हैं। केवल किसी महिला के ऊपर लेटने या उसका मुंह दबाने की घटना को देखकर अपराध की गंभीरतम श्रेणी निर्धारित नहीं की जा सकती; इसके लिए मामले की परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों का समग्र मूल्यांकन आवश्यक है।
अदालत ने माना कि महिला के घर में प्रवेश करना, उसके ऊपर लेटना और उसका मुंह दबाना जैसे कृत्य मामले में महत्वपूर्ण थे। लेकिन दुष्कर्म के प्रयास के अपराध को साबित करने के लिए शारीरिक संबंध बनाने की दिशा में स्पष्ट कृत्य और संबंधित कानूनी तत्वों का प्रमाण भी आवश्यक है।
धारा 376/511 और धारा 354 में क्या है अंतर?
भारतीय दंड संहिता की धारा 376 दुष्कर्म के लिए सजा से संबंधित थी, जबकि धारा 511 उन अपराधों के प्रयास से संबंधित थी जिनके लिए निर्धारित परिस्थितियों में यह प्रावधान लागू होता है। दुष्कर्म का प्रयास साबित करने के लिए केवल अनुचित व्यवहार या आपराधिक मंशा का संदेह पर्याप्त नहीं होता; कथित कृत्य और अपराध के कानूनी तत्वों का मूल्यांकन करना पड़ता है।
दूसरी ओर, भारतीय दंड संहिता की धारा 354 महिला पर हमला करने या आपराधिक बल का प्रयोग करने से संबंधित थी, जब ऐसा कृत्य उसकी लज्जा भंग करने के इरादे से या इस जानकारी के साथ किया गया हो कि इससे उसकी लज्जा भंग होने की संभावना है।
हाईकोर्ट ने मामले में उपलब्ध तथ्यों के आधार पर माना कि आरोपी के कृत्य धारा 354 के तहत अपराध स्थापित करते हैं। इसलिए दुष्कर्म के प्रयास की दोषसिद्धि को बदलते हुए धारा 354 के तहत दोषसिद्धि कायम की गई।
यह ध्यान रखना आवश्यक है कि इस फैसले का अर्थ यह नहीं है कि महिला का मुंह दबाना या उस पर हमला करना अपराध नहीं है। अदालत ने विशेष मामले के साक्ष्यों और लागू कानूनी प्रावधानों के आधार पर अपराध की श्रेणी निर्धारित की।
घर में घुसने के अपराध की दोषसिद्धि बरकरार
हाईकोर्ट ने दुष्कर्म के प्रयास से संबंधित दोषसिद्धि में बदलाव किया, लेकिन भारतीय दंड संहिता की धारा 448 के तहत घर में अनधिकृत प्रवेश के अपराध की दोषसिद्धि बरकरार रखी।
अदालत के आदेश के अनुसार, आरोपी की मुख्य सजा को पहले से काटी गई अवधि तक सीमित किया गया। इसके साथ ही 25,000 रुपये पीड़िता को मुआवजे के रूप में देने का निर्देश दिया गया। इस प्रकार फैसले में आरोपी की दोषसिद्धि के एक हिस्से में बदलाव हुआ, लेकिन सभी आरोपों से पूरी तरह बरी किए जाने की स्थिति नहीं बनी।
फैसले से क्या संदेश मिलता है?
यह निर्णय आपराधिक मामलों में साक्ष्यों और कानूनी प्रावधानों के बीच संतुलन के महत्व को सामने लाता है। किसी घटना में आरोपी का आचरण गंभीर और निंदनीय हो सकता है, लेकिन अदालत को प्रत्येक आरोप के लिए कानून में निर्धारित तत्वों के आधार पर ही दोषसिद्धि तय करनी होती है।
इस मामले में अदालत ने दुष्कर्म के प्रयास और महिला की लज्जा भंग करने के अपराध के बीच अंतर स्पष्ट किया। इसका उद्देश्य अपराध को नजरअंदाज करना नहीं, बल्कि उपलब्ध साक्ष्यों के अनुरूप उचित कानूनी प्रावधान लागू करना है।
यह फैसला किसी भी अन्य मामले में स्वतः लागू होने वाला सामान्य नियम नहीं माना जाना चाहिए। प्रत्येक प्रकरण के तथ्य, साक्ष्य और परिस्थितियां अलग हो सकती हैं। इसलिए इस निर्णय को समझते समय उसके विशिष्ट तथ्यों और अदालत द्वारा दर्ज निष्कर्षों को ध्यान में रखना जरूरी है।
निष्कर्ष: पटना हाईकोर्ट ने बेगूसराय के इस पुराने मामले में दुष्कर्म के प्रयास की दोषसिद्धि को बदलकर धारा 354 के तहत अपराध माना, जबकि घर में अनधिकृत प्रवेश की दोषसिद्धि बरकरार रखी। अदालत के फैसले का मुख्य संदेश यह है कि आपराधिक आरोपों का निर्धारण भावनाओं या अनुमान के बजाय कानूनी तत्वों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर होना चाहिए।