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RTI के 21 साल पूरे, देश के 28 सूचना आयोगों में 3.85 लाख मामले लंबित

त्रिपुरा में सुनवाई के लिए 19 साल से ज्यादा इंतजार नई दिल्ली। सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून के 21 साल पूरे होने के बीच देश में सूचना हासिल करने के लिए लोगों को लंबा इंतजार करना पड़ रहा है। सतर्क नागरिक संगठन (एसएनएस) की एक रिपोर्ट के अनुसार, 30 जून 2026 तक देश के 28 […]

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  • October 14, 2026 10:06 am IST, Published 59 minutes ago

त्रिपुरा में सुनवाई के लिए 19 साल से ज्यादा इंतजार

नई दिल्ली। सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून के 21 साल पूरे होने के बीच देश में सूचना हासिल करने के लिए लोगों को लंबा इंतजार करना पड़ रहा है। सतर्क नागरिक संगठन (एसएनएस) की एक रिपोर्ट के अनुसार, 30 जून 2026 तक देश के 28 सूचना आयोगों में कुल 3.85 लाख अपीलें और शिकायतें लंबित थीं। रिपोर्ट में मामलों के निपटारे में देरी के साथ-साथ बिना कोई आदेश पारित किए अपीलों और शिकायतों को लौटाए जाने पर भी चिंता जताई गई है।

रिपोर्ट के मुताबिक, जुलाई 2025 से जून 2026 के बीच नौ सूचना आयोगों ने कुल 37,701 मामलों को बिना आदेश पारित किए वापस लौटा दिया। इससे सूचना पाने के लिए आयोगों का दरवाजा खटखटाने वाले लोगों के सामने प्रक्रिया संबंधी बाधाओं का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में आ गया है।

नौ सूचना आयोगों ने लौटाए 37 हजार से अधिक मामले

एसएनएस की रिपोर्ट में बताया गया है कि बिना आदेश पारित किए लौटाए गए मामलों में केंद्रीय सूचना आयोग सबसे आगे रहा। केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) ने इस अवधि में 14,603 मामले वापस लौटाए।

अन्य आयोगों के आंकड़े इस प्रकार हैं:

  • महाराष्ट्र: 14,140 मामले
  • बिहार: 4,417 मामले
  • गुजरात: 3,276 मामले

रिपोर्ट के अनुसार, पांच सूचना आयोगों ने लौटाई गई अपीलों और शिकायतों से संबंधित आंकड़े उपलब्ध नहीं कराए। इससे पूरे देश में ऐसी शिकायतों की वास्तविक संख्या का आकलन करना मुश्किल हो जाता है।

छोटी गलतियों के कारण भी लौटाई जा रहीं अपीलें

सतर्क नागरिक संगठन की संस्थापक अंजलि भारद्वाज ने कहा कि निर्धारित प्रारूप का पालन नहीं करने या पृष्ठ संख्या जैसी छोटी कमियों के कारण भी अपीलें लौटाई जा रही हैं। उनका कहना है कि सूचना आयोगों का उद्देश्य नागरिकों को सूचना प्राप्त करने में मदद करना होना चाहिए, न कि अनावश्यक प्रशासनिक बाधाएं पैदा करना।

आरटीआई कानून का उद्देश्य सरकारी कामकाज में पारदर्शिता बढ़ाना और नागरिकों को सार्वजनिक प्राधिकरणों से जानकारी हासिल करने का अधिकार देना है। ऐसे में अपीलों को लौटाने की प्रक्रिया और उसके आधार पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

हालांकि, किसी मामले को लौटाने के पीछे संबंधित आयोग के नियम और दस्तावेजों की स्थिति भी महत्वपूर्ण होती है। इसलिए प्रत्येक मामले में यह देखना जरूरी है कि अपील किस कारण लौटाई गई और क्या आवेदक को अपनी कमी दूर करने का अवसर दिया गया।

गरीब और वंचित आवेदकों के लिए बढ़ सकती है परेशानी

एसएनएस से जुड़ी अमृता जोहरी ने कहा कि गरीब और वंचित समुदायों के कई लोग कानूनी सहायता के बिना अपने सूचना संबंधी अधिकारों के लिए संघर्ष करते हैं। ऐसे आवेदकों के लिए तकनीकी प्रक्रियाओं और दस्तावेजों की छोटी-छोटी कमियों को समझना मुश्किल हो सकता है।

उनके मुताबिक, यदि अपील में जरूरी बुनियादी जानकारी उपलब्ध है, तो आयोगों को उसकी सुनवाई करने की दिशा में प्रयास करना चाहिए।

यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आरटीआई का इस्तेमाल केवल सरकारी योजनाओं की जानकारी हासिल करने के लिए नहीं, बल्कि पेंशन, राशन, स्थानीय विकास कार्यों, सरकारी खर्च और प्रशासनिक निर्णयों से संबंधित जानकारी पाने के लिए भी किया जाता है।

केंद्रीय सूचना आयोग में भी बढ़ रहा लंबित मामलों का बोझ

पारदर्शिता कार्यकर्ता और सेवानिवृत्त कमोडोर लोकेश बत्रा के अनुसार, केंद्रीय सूचना आयोग में एक जनवरी से 12 अक्टूबर 2026 के बीच लंबित मामलों की संख्या में 9,378 की वृद्धि हुई।

लंबित मामलों में बढ़ोतरी का अर्थ है कि सूचना प्राप्त करने के लिए अपील करने वाले नागरिकों को अंतिम निर्णय के लिए और अधिक इंतजार करना पड़ सकता है। समय पर सुनवाई नहीं होने से आरटीआई के माध्यम से जवाबदेही तय करने का उद्देश्य भी प्रभावित हो सकता है।

त्रिपुरा में 19 साल से ज्यादा की अनुमानित प्रतीक्षा

एसएनएस की रिपोर्ट में कुछ राज्यों के सूचना आयोगों में मामलों के निपटारे की अनुमानित अवधि को लेकर भी गंभीर स्थिति सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार, 14 सूचना आयोगों में लंबित मामलों के निपटारे में एक साल या उससे अधिक समय लग सकता है।

अनुमानित प्रतीक्षा अवधि के प्रमुख आंकड़े इस प्रकार हैं:

  • त्रिपुरा: 19 साल 8 महीने
  • मध्य प्रदेश: 19 साल 2 महीने
  • छत्तीसगढ़: 18 साल

ये अनुमानित अवधियां लंबित मामलों और उनके निपटारे की दर पर आधारित हैं। वास्तविक प्रतीक्षा अवधि आयोग की कार्यक्षमता, नए मामलों की संख्या और निपटारे की गति के अनुसार बदल सकती है।

आरटीआई कानून के सामने पारदर्शिता बनाए रखने की चुनौती

सूचना का अधिकार कानून वर्ष 2005 में लागू हुआ था। इस कानून ने नागरिकों को सरकारी कामकाज से संबंधित जानकारी मांगने का अधिकार दिया और प्रशासनिक जवाबदेही को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

लेकिन सूचना आयोगों में लंबित अपीलों की बड़ी संख्या और मामलों को बिना आदेश लौटाए जाने की प्रवृत्ति इसके प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर सवाल खड़े करती है।

विशेषज्ञों और पारदर्शिता कार्यकर्ताओं की मांग है कि आयोगों में रिक्त पदों को भरने, मामलों के निपटारे की गति बढ़ाने, प्रक्रिया को सरल बनाने और लौटाई गई अपीलों के कारणों को स्पष्ट करने पर ध्यान दिया जाए।

निष्कर्ष: आरटीआई कानून के 21 साल पूरे होने पर सामने आए ये आंकड़े बताते हैं कि सूचना का अधिकार केवल कानून बनाने से प्रभावी नहीं होता। इसके लिए समय पर सुनवाई, सरल प्रक्रियाएं और जवाबदेह सूचना आयोग भी जरूरी हैं। यदि नागरिकों को सरकारी जानकारी पाने के लिए वर्षों इंतजार करना पड़े, तो पारदर्शिता और जवाबदेही के इस महत्वपूर्ण अधिकार का लाभ सीमित हो सकता है।

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