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राजनीतिक दलों पर टिकट बेचने के आरोप, CBI जांच से सुप्रीम कोर्ट का इनकार

यह मामला पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट में भी पहुंचा था। याचिकाकर्ता संगठन ने वहां जनहित याचिका दाखिल कर कथित टिकट बिक्री के आरोपों की जांच कराने की मांग की थी। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, 7 सितंबर को मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने याचिका खारिज कर दी थी। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की थी कि सोशल मीडिया पर प्रसारित हर वीडियो या कथित स्टिंग ऑपरेशन के आधार पर अदालत से जांच का आदेश...

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Supreme Court
Gauravshali Bharat News
  • October 14, 2026 12:30 pm IST, Published 2 hours ago

नयी दिल्ली: उत्तर प्रदेश में राजनीतिक दलों पर चुनावी टिकट के बदले पैसे लेने के आरोपों से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) से जांच कराने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया है। शीर्ष अदालत ने याचिकाकर्ता संगठन को अपनी शिकायत लेकर भारत निर्वाचन आयोग के पास जाने का निर्देश दिया। यह याचिका स्वराज वाहिनी एसोसिएशन की ओर से दाखिल की गई थी, जिसमें सोशल मीडिया पर सामने आए कथित स्टिंग ऑपरेशन का हवाला देते हुए कुछ राजनीतिक दलों की गतिविधियों की जांच कराने की मांग की गई थी।

याचिकाकर्ता का आरोप था कि उत्तर प्रदेश में सक्रिय कुछ गैर-मान्यता प्राप्त और क्षेत्रीय राजनीतिक दल चुनावी टिकट देने के बदले कथित तौर पर बड़ी रकम लेते हैं। इस मामले में निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए CBI की भूमिका की मांग की गई थी। याचिका में केंद्र सरकार, भारत निर्वाचन आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त के अलावा उत्तर प्रदेश की कुछ राजनीतिक पार्टियों को भी पक्षकार बनाया गया था। इनमें निषाद पार्टी, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा), अपना दल (सोनेलाल) और जन जनवादी पार्टी (सोशलिस्ट) के नाम शामिल थे। हालांकि, ये आरोप हैं और इन्हें अदालत द्वारा प्रमाणित तथ्य नहीं माना जा सकता।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल बताए गए हैं, ने मामले पर विचार करते हुए याचिकाकर्ता को निर्वाचन आयोग से संपर्क करने का रास्ता सुझाया। अदालत का रुख इस बात पर केंद्रित रहा कि चुनाव से संबंधित शिकायतों के निपटारे के लिए संवैधानिक संस्थाएं और निर्धारित प्रक्रियाएं पहले से मौजूद हैं। ऐसे मामलों में संबंधित संस्था के पास शिकायत दर्ज कराना उचित कदम है। अदालत ने निर्वाचन आयोग की क्षमता पर संदेह करने का कोई आधार नहीं माना।

यह मामला पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट में भी पहुंचा था। याचिकाकर्ता संगठन ने वहां जनहित याचिका दाखिल कर कथित टिकट बिक्री के आरोपों की जांच कराने की मांग की थी। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, 7 सितंबर को मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने याचिका खारिज कर दी थी। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की थी कि सोशल मीडिया पर प्रसारित हर वीडियो या कथित स्टिंग ऑपरेशन के आधार पर अदालत से जांच का आदेश देने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। ऐसे मामलों में आरोपों की विश्वसनीयता और उन्हें परखने के लिए उपलब्ध कानूनी रास्तों को ध्यान में रखना आवश्यक है।

सुप्रीम कोर्ट के इस रुख के बाद अब याचिकाकर्ता संगठन के सामने निर्वाचन आयोग के समक्ष अपनी शिकायत और उपलब्ध सामग्री प्रस्तुत करने का विकल्प है। आयोग के पास शिकायत पहुंचने पर संबंधित तथ्यों, दस्तावेजों और आरोपों की जांच किस प्रकार की जाएगी, यह आयोग के अधिकार क्षेत्र और लागू नियमों के अनुसार तय होगा। फिलहाल, मामले में टिकटों के बदले धन लेने के आरोपों की सत्यता को लेकर कोई अंतिम निष्कर्ष सामने नहीं आया है।

चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता और राजनीतिक दलों की जवाबदेही लोकतांत्रिक व्यवस्था के महत्वपूर्ण पहलू हैं। यदि किसी दल या व्यक्ति के खिलाफ चुनावी अनियमितता की शिकायत होती है, तो उसके समर्थन में ठोस साक्ष्य और सत्यापन योग्य जानकारी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सोशल मीडिया पर प्रसारित सामग्री किसी मामले की ओर ध्यान आकर्षित कर सकती है, लेकिन केवल वीडियो या ऑनलाइन दावे अपने आप आरोपों को साबित नहीं करते। इस प्रकरण में अदालतों के रुख से यह स्पष्ट होता है कि चुनावी शिकायतों के लिए निर्धारित संस्थागत प्रक्रिया का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। अब आगे की कार्रवाई इस बात पर निर्भर करेगी कि याचिकाकर्ता निर्वाचन आयोग के सामने किस तरह की सामग्री रखता है और संबंधित संस्था उस पर क्या निर्णय लेती है।

 

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