नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट में सीजेपी प्रदर्शन से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान न्यायपालिका की स्वतंत्रता, विरोध-प्रदर्शन और सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े कई अहम मुद्दे उठे। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने स्पष्ट कहा कि न्यायपालिका को कोई डरा-धमका नहीं सकता। उन्होंने कहा कि अदालतें वास्तविक दुनिया से अलग नहीं हैं और उन्हें बाहर हो रही गतिविधियों की जानकारी रहती है। सुनवाई के दौरान अदालत ने प्रदर्शन से जुड़े सीसीटीवी फुटेज और सभी डिजिटल रिकॉर्ड सुरक्षित रखने का निर्देश भी दिया।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ के सामने सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव भाटिया ने सुप्रीम कोर्ट परिसर में राजनीतिक जुलूस निकाले जाने पर आपत्ति जताई। उन्होंने इसे न्यायपालिका पर दबाव बनाने और उसे डराने की कोशिश बताया। इस पर सीजेआई ने कहा कि इस तरह के प्रयास बेहद कमजोर हैं और न्यायपालिका पर इनका कोई प्रभाव नहीं पड़ता। अदालत ने अपने रुख से स्पष्ट किया कि न्यायिक संस्थानों की स्वतंत्रता और गरिमा से किसी तरह का समझौता नहीं किया जा सकता।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित कानूनी एजेंसियों को मामले से जुड़े सीसीटीवी फुटेज और अन्य डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट परिसर से संबंधित रिकॉर्ड भी संरक्षित रखा जाए। साथ ही निजी पक्षों को भी निर्देश दिया गया कि यदि उनके पास मामले से जुड़ी कोई सामग्री है, तो वे उसे पुलिस को उपलब्ध करा सकते हैं। इन निर्देशों का उद्देश्य मामले की जांच के लिए जरूरी साक्ष्यों को सुरक्षित रखना है।
सुनवाई में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इंटरनेट बंद करने से जुड़े मामले में अदालत की अवमानना के नोटिस पर सरकार की ओर से दाखिल जवाब को लेकर भी स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि मीडिया और सोशल मीडिया पर सरकार की ओर से बिना शर्त माफी मांगने की खबरें प्रसारित हो रही हैं, जबकि वह इस धारणा को स्पष्ट करना चाहते हैं। मेहता के मुताबिक, अदालत में जवाब दाखिल करने की प्रक्रिया को माफी मांगने के रूप में पेश करना सही नहीं है। उन्होंने कहा कि सरकार ने माफी नहीं मांगी है और वह इस संबंध में फैल रही खबरों पर स्पष्टीकरण देना चाहते हैं।
जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाने के मामले पर भी सुनवाई हुई। सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को बताया कि जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाने का फैसला सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर नहीं, बल्कि एक समिति की सिफारिश के आधार पर लिया गया था। इस मामले में दिल्ली पुलिस के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी किया है। अदालत ने कहा कि पहले सरकार का जवाब देखा जाएगा। यदि जवाब से संतुष्टि नहीं हुई, तो कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई की जाएगी।
जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि अदालत इस बात की जांच करेगी कि जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल के रूप में हटाने का निर्णय उचित विचार-विमर्श के बाद लिया गया था या नहीं। इस मामले में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 की वैधता और पुलिस की निवारक कार्रवाई से जुड़े पहलुओं पर भी नोटिस जारी किया गया है। अब इस मुद्दे पर सरकार के जवाब के बाद आगे की सुनवाई महत्वपूर्ण होगी।
सुनवाई के दौरान महिला पत्रकार के साथ कथित दुर्व्यवहार का मुद्दा भी उठा। सुप्रीम कोर्ट ने महिला पत्रकार की ओर से लगाए गए आरोपों को गंभीर बताया और मामले की जांच जल्द पूरी करने की बात कही। सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि प्रदर्शन स्थलों पर यह पहचान करना कई बार मुश्किल होता है कि कौन पत्रकार है और कौन सोशल मीडिया के लिए वीडियो बना रहा है। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि किसी महिला के साथ अभद्र व्यवहार को स्वीकार नहीं किया जा सकता, चाहे वह पत्रकार हो या पुलिसकर्मी।
सुप्रीम कोर्ट की इस सुनवाई में न्यायपालिका की स्वतंत्रता, सार्वजनिक प्रदर्शन के अधिकार, सुरक्षा व्यवस्था और पत्रकारों की सुरक्षा जैसे मुद्दे प्रमुख रहे। अब संबंधित एजेंसियों की जांच, सरकार के जवाब और सुरक्षित रखे जाने वाले डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया तय होगी।