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दुष्कर्म आरोपों के बीच पॉक्सो कोर्ट की कमान, SC का नोटिस

दुष्कर्म मामले में आरोपपत्र का सामना कर रहे यूपी के अतिरिक्त जिला न्यायाधीश के पॉक्सो मामलों की सुनवाई जारी रखने पर सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट से जवाब मांगा।

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  • November 4, 2026 1:59 pm IST, Published 1 hour ago

नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश के एक अतिरिक्त जिला न्यायाधीश से जुड़े मामले ने देश की न्यायिक व्यवस्था, न्यायिक नैतिकता और संस्थागत जवाबदेही को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। दुष्कर्म के एक मामले में आरोपपत्र दाखिल होने के बावजूद संबंधित न्यायिक अधिकारी के पॉक्सो (POCSO) मामलों की सुनवाई से जुड़े पद पर बने रहने को लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट प्रशासन से जवाब तलब किया है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने याचिका पर सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट प्रशासन और संबंधित न्यायिक अधिकारी को नोटिस जारी किया है। याचिका में मांग की गई है कि दुष्कर्म के मामले में आरोपों का सामना कर रहे न्यायिक अधिकारी से कम से कम पॉक्सो अदालत का न्यायिक कार्य वापस लिया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने मामले को 11 दिसंबर 2026 को जवाब के लिए सूचीबद्ध किया है।

यह प्रकरण इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि पॉक्सो अदालतों में नाबालिग बच्चों के साथ यौन अपराधों से जुड़े संवेदनशील मामलों की सुनवाई होती है। ऐसे में एक न्यायिक अधिकारी के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामला लंबित होने के दौरान उसके न्यायिक दायित्वों को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।

क्या है पूरा मामला?

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, यह मामला उत्तर प्रदेश में तैनात अतिरिक्त जिला न्यायाधीश अशोक भारतेन्दु से संबंधित है। उनके खिलाफ दिल्ली के मयूर विहार पुलिस थाने में एक महिला की शिकायत पर 8 दिसंबर 2022 को एफआईआर दर्ज की गई थी। महिला ने आरोप लगाया था कि उसकी मुलाकात संबंधित न्यायिक अधिकारी से एक मैट्रिमोनियल वेबसाइट के माध्यम से हुई थी।

शिकायतकर्ता का आरोप है कि न्यायिक अधिकारी ने उससे शादी करने का भरोसा दिलाकर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। महिला के मुताबिक, शादी का आश्वासन बार-बार दिया गया, लेकिन बाद में परिस्थितियां बदल गईं। इसके बाद उसने पुलिस से शिकायत कर कानूनी कार्रवाई की मांग की।

हालांकि, इस मामले में लगाए गए आरोपों को अभी न्यायिक रूप से अंतिम रूप से साबित नहीं माना जा सकता। आरोपी न्यायिक अधिकारी को भी कानून के तहत अपना पक्ष रखने और बचाव करने का पूरा अधिकार प्राप्त है।

दिल्ली पुलिस की जांच से आरोपपत्र तक पहुंचा मामला

एफआईआर दर्ज होने के बाद दिल्ली पुलिस ने मामले की जांच शुरू की। जनवरी 2023 में पुलिस ने संबंधित न्यायिक अधिकारी के खिलाफ जांच आगे बढ़ाने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट से अनुमति मांगी थी। इसके बाद मामला न्यायिक प्रशासन के स्तर पर भी विचाराधीन रहा।

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, मार्च 2023 में दिल्ली हाईकोर्ट ने संबंधित अधिकारी को गिरफ्तारी से अंतरिम संरक्षण दिया था। हालांकि, इस आदेश का अर्थ जांच पर पूर्ण रोक लगाना नहीं था। पुलिस को जांच जारी रखने की अनुमति दी गई थी।

जांच के दौरान शिकायतकर्ता का बयान मजिस्ट्रेट के समक्ष भी दर्ज कराया गया। जून 2023 में दिल्ली पुलिस ने इलाहाबाद हाईकोर्ट को पत्र भेजकर जांच की अनुमति से जुड़े मामले में जल्द निर्णय लेने का अनुरोध किया। इस दौरान हाईकोर्ट प्रशासन की ओर से बताया गया कि संबंधित न्यायिक अधिकारी के खिलाफ सतर्कता जांच यानी विजिलेंस इंक्वायरी भी चल रही है।

अक्टूबर 2024 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने जांच आगे बढ़ाने की अनुमति दी और संबंधित अधिकारी को जांच में सहयोग करने का निर्देश दिया।

इसके बाद अप्रैल 2025 में दिल्ली पुलिस ने आरोपपत्र दाखिल करने के प्रस्ताव के संबंध में हाईकोर्ट को जानकारी दी। रिपोर्टों के अनुसार, 5 मई 2025 को संबंधित न्यायिक अधिकारी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 376 के तहत आरोपपत्र दाखिल किया गया।

आगे चलकर 23 मई 2026 को दिल्ली की कड़कड़डूमा अदालत के मुख्य महानगर मजिस्ट्रेट ने आरोपपत्र का संज्ञान लिया। इसके बाद शिकायतकर्ता ने न्यायिक अधिकारी को न्यायिक जिम्मेदारियों से हटाने की मांग को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख किया।

इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका खारिज होने के बाद सुप्रीम कोर्ट पहुंची महिला

शिकायतकर्ता ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर संबंधित न्यायिक अधिकारी को पॉक्सो मामलों की सुनवाई के दायित्व से हटाने की मांग की थी। याचिकाकर्ता का तर्क था कि गंभीर आपराधिक आरोपों का सामना कर रहे अधिकारी को संवेदनशील मामलों की सुनवाई का जिम्मा दिए जाने पर प्रशासनिक और संस्थागत स्तर पर विचार होना चाहिए।

हालांकि, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी। इसके बाद महिला ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दाखिल की।

याचिका में हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए कहा गया कि संबंधित अधिकारी के खिलाफ दर्ज मामले और दाखिल आरोपपत्र को देखते हुए उनके न्यायिक दायित्वों की समीक्षा की जानी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट में वकील ने उठाया न्यायिक जिम्मेदारी का सवाल

सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता राकेश कुमार सिंह ने पक्ष रखा। उन्होंने पीठ के सामने दलील दी कि याचिकाकर्ता की मांग संबंधित अधिकारी को तत्काल सेवा से बर्खास्त करने की नहीं है, बल्कि कम से कम उनसे पॉक्सो अदालत का न्यायिक कार्य वापस लिया जाना चाहिए।

वकील ने न्यायिक पद की संवेदनशीलता और उससे जुड़ी सार्वजनिक विश्वसनीयता का हवाला देते हुए कहा कि इस मामले में प्रशासनिक स्तर पर उचित कदम उठाने की जरूरत है।

सुनवाई के दौरान पीठ ने मामले के विभिन्न पहलुओं पर विचार किया। सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट प्रशासन से जवाब मांगते हुए नोटिस जारी किया। अदालत ने मामले को 11 दिसंबर 2026 को जवाब के लिए सूचीबद्ध किया है।

यह आदेश फिलहाल याचिका पर आगे की सुनवाई का रास्ता खोलता है। इसे संबंधित न्यायिक अधिकारी के खिलाफ आरोपों पर अंतिम फैसला या उन्हें पद से हटाने का आदेश नहीं माना जाना चाहिए।

विजिलेंस जांच और शिकायतकर्ता की मांग भी महत्वपूर्ण

इस पूरे प्रकरण में केवल आपराधिक जांच ही नहीं, बल्कि न्यायिक प्रशासन के स्तर पर हुई सतर्कता जांच भी महत्वपूर्ण पहलू है। शिकायतकर्ता की ओर से यह सवाल उठाया गया है कि संबंधित शिकायत और जांच की प्रगति के बारे में उन्हें पर्याप्त जानकारी क्यों नहीं मिली।

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष यह मुद्दा भी रखा गया कि शिकायत पर की गई प्रशासनिक कार्रवाई को उसके तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाया जाना चाहिए। न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की ओर से सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता के अधिकारों और आरोपी के कानूनी अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर भी चर्चा की गई।

अदालत के सामने यह पहलू भी महत्वपूर्ण है कि किसी आरोपी के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल होने मात्र से उसे दोषी नहीं माना जा सकता। आपराधिक मुकदमे में दोष सिद्ध करने की जिम्मेदारी अभियोजन पक्ष की होती है और अंतिम निर्णय सक्षम अदालत को साक्ष्यों के आधार पर करना होता है।

न्यायिक व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ा मामला

यह प्रकरण न्यायिक संस्थानों में पारदर्शिता, जवाबदेही और प्रशासनिक निर्णयों की भूमिका पर व्यापक चर्चा का विषय बन सकता है। विशेष रूप से पॉक्सो अदालतों में बच्चों के साथ यौन अपराधों से जुड़े मामलों की सुनवाई होती है। ऐसे मामलों में न्यायिक पद पर बैठे अधिकारियों की निष्पक्षता और संस्थागत विश्वसनीयता बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।

हालांकि, न्यायिक स्वतंत्रता और निष्पक्ष सुनवाई के सिद्धांत भी उतने ही आवश्यक हैं। किसी व्यक्ति के खिलाफ आरोप लगने या आरोपपत्र दाखिल होने के आधार पर उसे स्वतः दोषी ठहराना उचित नहीं है। इसी तरह, गंभीर आरोपों से जुड़े मामलों में प्रशासनिक समीक्षा और उचित प्रक्रिया का पालन भी जरूरी है।

अब सबकी निगाहें 11 दिसंबर 2026 को होने वाली अगली सुनवाई पर रहेंगी। इलाहाबाद हाईकोर्ट प्रशासन की ओर से दिए जाने वाले जवाब और सुप्रीम कोर्ट की आगे की टिप्पणियां इस मामले की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि दुष्कर्म के मामले में आरोपपत्र का सामना कर रहे न्यायिक अधिकारी को पॉक्सो मामलों की सुनवाई की जिम्मेदारी पर बनाए रखने के प्रशासनिक निर्णय को किस आधार पर उचित ठहराया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट में इस सवाल पर आगे होने वाली सुनवाई न्यायिक प्रशासन की जवाबदेही के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

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