दरअसल, एयर क्वालिटी इंडेक्स यानी AQI हवा की गुणवत्ता मापने का एक पैमाना है। इसके जरिए यह पता लगाया जाता है कि किसी क्षेत्र की हवा इंसानों के स्वास्थ्य के लिए कितनी सुरक्षित या खतरनाक है। भारत में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) ने AQI को छह श्रेणियों में बांटा है। 0 से 50 तक का स्तर अच्छा, 51 से 100 संतोषजनक, 101 से 200 मध्यम, 201 से 300 खराब, 301 से 400 बहुत खराब और 401 से 500 गंभीर श्रेणी में आता है। यानी AQI का आंकड़ा जितना अधिक होगा, हवा में प्रदूषण और उससे होने वाले स्वास्थ्य जोखिम का खतरा उतना ही ज्यादा होगा।
AQI की गणना किसी एक प्रदूषक के आधार पर नहीं होती। इसके लिए हवा में मौजूद आठ प्रमुख प्रदूषकों की निगरानी की जाती है। इनमें PM2.5, PM10, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO2), सल्फर डाइऑक्साइड (SO2), कार्बन मोनोऑक्साइड (CO), ओजोन (O3), अमोनिया (NH3) और लेड (Pb) शामिल हैं।
PM2.5 सबसे खतरनाक प्रदूषकों में गिना जाता है। इसके कण बेहद छोटे होते हैं और सांस के जरिए फेफड़ों के भीतर तक पहुंच सकते हैं। वाहन, उद्योग, कूड़ा जलाने और ईंधन के धुएं से इसका स्तर बढ़ता है। PM10 के कण आकार में इससे बड़े होते हैं। सड़क की धूल, निर्माण कार्य और खुले स्थानों की मिट्टी इसके प्रमुख स्रोत हैं।
नाइट्रोजन डाइऑक्साइड मुख्य रूप से वाहनों और औद्योगिक गतिविधियों से निकलती है। यह सांस की नलियों में सूजन और फेफड़ों की समस्याएं बढ़ा सकती है। सल्फर डाइऑक्साइड कोयला और अन्य सल्फरयुक्त ईंधन जलने से पैदा होती है। इससे सांस लेने में परेशानी और अस्थमा के लक्षण बढ़ सकते हैं।
कार्बन मोनोऑक्साइड एक जहरीली गैस है, जो अधूरे दहन से निकलती है। यह खून में ऑक्सीजन पहुंचाने की क्षमता को प्रभावित करती है। ओजोन का निर्माण सूर्य की रोशनी में नाइट्रोजन ऑक्साइड और वाष्पशील कार्बनिक यौगिकों की रासायनिक प्रतिक्रिया से होता है। जमीन के करीब मौजूद ओजोन सांस संबंधी परेशानियां पैदा कर सकती है।
अमोनिया का संबंध मुख्य रूप से कृषि गतिविधियों, उर्वरकों और कचरे से है। यह हवा में मौजूद दूसरे रसायनों के साथ मिलकर सूक्ष्म कण बना सकती है। वहीं लेड यानी सीसा एक जहरीली भारी धातु है, जिसका लंबे समय तक संपर्क तंत्रिका तंत्र और दूसरे अंगों को नुकसान पहुंचा सकता है।
इन सभी प्रदूषकों की अलग-अलग सांद्रता को निर्धारित मानकों के आधार पर सब-इंडेक्स में बदला जाता है। इसके बाद जिस प्रदूषक का सब-इंडेक्स सबसे अधिक होता है, वही उस स्थान का समग्र AQI निर्धारित करता है। हालांकि, गणना के लिए कम से कम तीन प्रदूषकों के आंकड़े उपलब्ध होना जरूरी है, जिनमें PM2.5 या PM10 में से एक शामिल होना चाहिए।
अब बात GRAP की। ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान दिल्ली-एनसीआर में बढ़ते वायु प्रदूषण से निपटने के लिए तैयार की गई चरणबद्ध आपातकालीन व्यवस्था है। इसे वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) लागू करता है। इसका उद्देश्य प्रदूषण बढ़ने पर अलग-अलग स्तरों पर तत्काल नियंत्रण उपाय करना है।
GRAP को चार चरणों में बांटा गया है। पहले चरण में AQI 201 से 300 यानी खराब श्रेणी में पहुंचने पर कार्रवाई होती है। दूसरे चरण में AQI 301 से 400 यानी बहुत खराब होने पर पाबंदियां बढ़ाई जाती हैं। तीसरे चरण में AQI 401 से 450 यानी गंभीर स्तर पर पहुंचने पर निर्माण गतिविधियों पर अतिरिक्त रोक, स्कूलों के संचालन में बदलाव और वाहनों से जुड़े प्रतिबंध जैसे कदम उठाए जा सकते हैं। चौथे चरण में AQI 450 से ऊपर जाने पर सबसे कड़े आपातकालीन उपाय लागू होते हैं।
नवंबर 2026 में CAQM की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, दिल्ली का AQI 7 नवंबर को रात 9 बजे 368 दर्ज किया गया था और 6 नवंबर से GRAP का तीसरा चरण प्रभावी था। यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि मौसम के पूर्वानुमान और प्रदूषण बढ़ने की आशंका के आधार पर GRAP के अगले चरण को वास्तविक AQI उस सीमा तक पहुंचने से पहले भी लागू किया जा सकता है।
हालांकि, GRAP की पाबंदियां प्रदूषण के स्रोतों पर तत्काल नियंत्रण का प्रयास करती हैं, लेकिन हवा की गुणवत्ता सुधारने के लिए केवल प्रतिबंध पर्याप्त नहीं हैं। वाहनों से निकलने वाले धुएं, औद्योगिक उत्सर्जन, निर्माण स्थलों की धूल, कूड़ा जलाने और आसपास के राज्यों में पराली जलाने जैसी समस्याओं पर लगातार कार्रवाई जरूरी है। इसके साथ ही सार्वजनिक परिवहन को मजबूत करना, स्वच्छ ईंधन को बढ़ावा देना और नियमों का सख्ती से पालन कराना भी अहम है।
साफ है कि दिल्ली-एनसीआर की जहरीली हवा केवल सर्दियों की मौसमी समस्या नहीं, बल्कि लंबे समय से बनी हुई पर्यावरणीय चुनौती है। AQI के आंकड़े खतरे की चेतावनी जरूर देते हैं, लेकिन इस चुनौती से निपटने के लिए अस्थायी पाबंदियों के बजाय प्रदूषण के मूल स्रोतों पर स्थायी नियंत्रण करना होगा।