पार्टी से निष्कासन के बाद अनंत सिंह ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि वह अपनी राजनीतिक राह खुद तय करेंगे। उन्होंने संकेत दिया कि उन्हें विधायक की सदस्यता जाने की चिंता नहीं है और वह किसी राजनीतिक दल से टिकट मांगने के लिए नहीं गए थे। उनके मुताबिक, पार्टी की ओर से टिकट दिया जाता है और राजनीति में जनता का फैसला सबसे महत्वपूर्ण होता है।
अनंत सिंह ने जदयू के मौजूदा हालात पर टिप्पणी करते हुए कहा कि पार्टी का भविष्य अब बेहतर नजर नहीं आ रहा है। उन्होंने दावा किया कि आने वाले चुनावों में जदयू की स्थिति कमजोर हो सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि पार्टी की मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए अब नए राजनीतिक विकल्प पर विचार करना जरूरी हो गया है। अपनी पार्टी बनाने की संभावना जताकर उन्होंने साफ कर दिया कि निष्कासन के बावजूद वह राजनीति से पीछे हटने के मूड में नहीं हैं।
अनंत सिंह ने जनता को सर्वोपरि बताते हुए कहा कि उनके लिए जनता का फैसला सबसे अहम है। उन्होंने पार्टी से निकाले जाने पर किसी तरह का पछतावा होने से इनकार किया। उनका कहना था कि राजनीति में जनता ही अंतिम निर्णायक होती है और जनता के समर्थन के आधार पर ही किसी नेता की ताकत का आकलन किया जाना चाहिए।
जदयू के भीतर फैसले लेने की प्रक्रिया पर भी अनंत सिंह ने सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि पहले पार्टी में नीतीश कुमार की अहम भूमिका हुआ करती थी और बड़े फैसले उन्हीं के नेतृत्व में लिए जाते थे। अब पार्टी की स्थिति को लेकर उन्होंने असंतोष जाहिर किया। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि नीतीश कुमार की तबीयत ठीक नहीं रहती, इसलिए वह उनकी आलोचना नहीं करना चाहते। इस बयान से स्पष्ट है कि अनंत सिंह पार्टी के मौजूदा नेतृत्व और नीतीश कुमार के प्रति अपने व्यक्तिगत दृष्टिकोण को अलग-अलग रख रहे हैं।
नीतीश कुमार से संबंधों को लेकर पूछे गए सवाल पर अनंत सिंह ने कहा कि उनके और मुख्यमंत्री के बीच कोई दूरी नहीं है। उन्होंने दोहराया कि वह नीतीश कुमार के खिलाफ बयान नहीं देंगे। अनंत सिंह ने यह भी कहा कि उन्होंने हमेशा नीतीश कुमार का साथ दिया है। वहीं, निशांत कुमार को लेकर पूछे गए सवाल पर उन्होंने टिप्पणी की कि फिलहाल उनके बारे में कुछ कहने की जरूरत नहीं है। इस बयान के बाद निशांत कुमार की राजनीतिक भूमिका को लेकर भी चर्चाएं तेज हो सकती हैं।
दरअसल, पूरे विवाद की शुरुआत विधान परिषद यानी एमएलसी चुनाव के दौरान हुई। अनंत सिंह पर आरोप था कि उन्होंने पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार नीरज सिंह के बजाय जनसुराज के प्रत्याशी अनुज सिंह का समर्थन किया। उन्होंने अनुज सिंह के पक्ष में प्रचार भी किया था और जदयू के उम्मीदवार का विरोध किया था। इस घटनाक्रम के दौरान उन्होंने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को लेकर भी नाराजगी जाहिर की थी।
चुनाव में पार्टी लाइन से अलग रुख अपनाने के बाद जदयू ने कार्रवाई करते हुए अनंत सिंह को छह साल के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया। इसके अलावा उनकी पत्नी और पूर्व विधायक नीलम देवी की प्राथमिक सदस्यता भी समाप्त कर दी गई। पार्टी के इस फैसले ने बिहार की राजनीति में विवाद को और बढ़ा दिया है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि अनंत सिंह आगे किस दिशा में कदम उठाएंगे। क्या वह वास्तव में अपनी नई पार्टी बनाएंगे या किसी दूसरे राजनीतिक विकल्प पर विचार करेंगे, इस पर सबकी नजर रहेगी। दूसरी ओर, जदयू के भीतर इस घटनाक्रम का क्या असर पड़ेगा, यह भी आने वाले समय में स्पष्ट होगा। फिलहाल, अनंत सिंह के बयानों ने बिहार की राजनीति में नए समीकरणों और संभावित बदलावों को लेकर चर्चाओं को तेज कर दिया है।