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रील्स की लत छोड़ किताबों से जुड़ें, 15 मिनट पढ़ने का असर

आज के दौर में मोबाइल फोन और सोशल मीडिया हमारी दिनचर्या का अहम हिस्सा बन चुके हैं।

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Gauravshali Bharat News
  • September 22, 2026 7:03 am IST, Published 1 hour ago

नई दिल्ली। आज के दौर में मोबाइल फोन और सोशल मीडिया हमारी दिनचर्या का अहम हिस्सा बन चुके हैं। कुछ मिनट खाली मिलते ही बहुत से लोग किताब उठाने के बजाय रील्स, शॉर्ट्स या छोटे वीडियो देखने लगते हैं। शुरुआत में यह आदत मनोरंजन का आसान माध्यम लगती है, लेकिन धीरे-धीरे लगातार स्क्रॉल करने की प्रवृत्ति समय के साथ-साथ पढ़ने, सोचने और किसी विषय पर लंबे समय तक ध्यान केंद्रित करने की आदत को भी प्रभावित कर सकती है।

इसी विषय को लेकर अभिनेता और गीतकार मनोज मुंतशिर के साथ हुई बातचीत का एक वीडियो सोशल मीडिया पर चर्चा में है। बातचीत में रील्स देखने और किताब पढ़ने के बीच के अंतर को रेखांकित किया गया। संदेश यह है कि अगर व्यक्ति अपने दिन का थोड़ा-सा समय भी नियमित रूप से किताब पढ़ने के लिए निकाल ले, तो वह अपनी दिनचर्या में एक सकारात्मक बदलाव ला सकता है।

रील्स और किताब के बीच आखिर कितना अंतर?

रील्स और शॉर्ट वीडियो का सबसे बड़ा आकर्षण उनकी छोटी अवधि और तेजी से बदलती सामग्री है। कुछ सेकंड में नया दृश्य, नया संगीत, नया संवाद या नई जानकारी सामने आती है। इससे व्यक्ति लगातार अगली सामग्री देखने के लिए प्रेरित होता रहता है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का डिजाइन भी उपयोगकर्ता को एक वीडियो के बाद दूसरा वीडियो देखने की सुविधा देता है।

इसके विपरीत किताब पढ़ने के लिए व्यक्ति को एक जगह ध्यान लगाना पड़ता है। किसी विचार को समझने के लिए उसे वाक्य पढ़ना, संदर्भ समझना और कई बार पहले पढ़ी गई बातों को याद रखना पड़ता है। यही प्रक्रिया पढ़ने को केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि एक सक्रिय मानसिक गतिविधि बनाती है।

हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि हर रील या शॉर्ट वीडियो नुकसानदायक है। सोशल मीडिया पर शिक्षा, समाचार, विज्ञान, कला और साहित्य से जुड़ी उपयोगी सामग्री भी उपलब्ध है। अंतर इस बात से पैदा होता है कि व्यक्ति स्क्रीन का इस्तेमाल किस उद्देश्य और कितनी देर के लिए कर रहा है।

15 मिनट पढ़ने की आदत कैसे बन सकती है?

किताब पढ़ने के लिए रोजाना कई घंटे निकालना हर व्यक्ति के लिए संभव नहीं होता। ऐसे में 15 मिनट से शुरुआत करना व्यावहारिक तरीका हो सकता है। सुबह उठने के बाद, रात में सोने से पहले या यात्रा के दौरान कुछ समय पढ़ने के लिए तय किया जा सकता है।

शुरुआत में बहुत कठिन या लंबी किताब चुनने के बजाय अपनी रुचि के विषय से जुड़ी पुस्तक लेना बेहतर हो सकता है। कहानी, जीवनी, इतिहास, विज्ञान, साहित्य या व्यक्तिगत रुचि से जुड़ा कोई विषय पढ़ने की आदत को बनाए रखने में मदद कर सकता है।

महत्वपूर्ण यह भी है कि पढ़ने के दौरान मोबाइल फोन को थोड़ी दूरी पर रखा जाए। बार-बार आने वाले नोटिफिकेशन ध्यान भटका सकते हैं। यदि 15 मिनट तक बिना किसी व्यवधान के पढ़ा जाए तो धीरे-धीरे इस अवधि को बढ़ाना आसान हो सकता है।

लगातार स्क्रॉल करने की आदत क्यों बनती है?

सोशल मीडिया पर मिलने वाली सामग्री लगातार बदलती रहती है। एक वीडियो खत्म होते ही दूसरा सामने आ जाता है। इस तरह उपयोगकर्ता को किसी एक विषय पर लंबे समय तक टिके रहने की आवश्यकता नहीं होती। यही वजह है कि कई लोग घंटों तक फोन चलाने के बावजूद बाद में यह महसूस करते हैं कि उन्होंने वास्तव में कितना समय बिताया, इसका उन्हें अंदाजा नहीं रहा।

यहां व्यक्तिगत अनुशासन की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। फोन या सोशल मीडिया को पूरी तरह छोड़ना हर किसी के लिए आवश्यक नहीं है। इसके बजाय उपयोग का समय तय करना, अनावश्यक नोटिफिकेशन बंद करना और मनोरंजन के साथ पढ़ने जैसी दूसरी गतिविधियों के लिए भी समय निकालना अधिक संतुलित तरीका हो सकता है।

किताब पढ़ने से सिर्फ जानकारी ही नहीं बढ़ती

किताब पढ़ने का लाभ केवल नई जानकारी हासिल करने तक सीमित नहीं है। लंबे लेख या पुस्तक को पढ़ते समय व्यक्ति को विचारों के क्रम को समझना पड़ता है। पात्रों, घटनाओं, तर्कों और संदर्भों को याद रखना पड़ता है। इससे विषय को गहराई से समझने की प्रक्रिया विकसित होती है।

विशेष रूप से बच्चों और युवाओं में पढ़ने की आदत का महत्व अधिक है। डिजिटल माध्यमों के बढ़ते इस्तेमाल के बीच यदि वे नियमित रूप से किताब, समाचार पत्र या गुणवत्तापूर्ण लेख पढ़ने का समय निकालते हैं, तो भाषा और सामान्य ज्ञान के साथ-साथ अलग-अलग विषयों को समझने का अवसर भी मिलता है।

हालांकि पढ़ने के प्रभाव हर व्यक्ति में समान नहीं होते। किताब का विषय, पढ़ने की रुचि, उम्र, ध्यान की क्षमता और पढ़ने का उद्देश्य जैसे कई कारक भूमिका निभाते हैं। इसलिए 15 मिनट पढ़ने को किसी निश्चित परिणाम की गारंटी के रूप में नहीं, बल्कि एक सकारात्मक आदत की शुरुआत के तौर पर देखना उचित होगा।

रील्स पूरी तरह छोड़ना जरूरी नहीं

आज की डिजिटल दुनिया में रील्स और शॉर्ट वीडियो सूचना और मनोरंजन का महत्वपूर्ण माध्यम बन चुके हैं। कई कलाकार, शिक्षक, पत्रकार और विशेषज्ञ इसी माध्यम से लोगों तक अपनी बात पहुंचाते हैं। इसलिए समस्या माध्यम में नहीं, बल्कि उसके अत्यधिक या अनियंत्रित इस्तेमाल में हो सकती है।

एक व्यक्ति चाहे तो सोशल मीडिया के लिए निश्चित समय निर्धारित कर सकता है और उसी तरह किताब पढ़ने के लिए भी रोजाना एक छोटा समय तय कर सकता है। उदाहरण के लिए दिन के 15 मिनट किताब पढ़ने से शुरुआत की जा सकती है और बाद में सुविधा के अनुसार समय बढ़ाया जा सकता है।

छोटी शुरुआत से बदल सकती है पढ़ने की दिनचर्या

मनोज मुंतशिर से जुड़ी बातचीत में सामने आया यह विचार डिजिटल दौर की एक महत्वपूर्ण आदत की ओर ध्यान खींचता है—हम अपना खाली समय किस तरह इस्तेमाल करते हैं। रील्स और शॉर्ट्स तत्काल मनोरंजन दे सकते हैं, जबकि किताब पढ़ने के लिए धैर्य और एकाग्रता की जरूरत होती है।

इसलिए सवाल यह नहीं है कि मोबाइल अच्छा है या किताब, बल्कि सवाल यह है कि हमारी दिनचर्या में दोनों के लिए कितना और किस उद्देश्य से समय निर्धारित है। यदि रोजाना केवल 15 मिनट भी पढ़ने के लिए तय किए जाएं और इस आदत को लगातार निभाया जाए, तो यह पढ़ने की संस्कृति को मजबूत करने की दिशा में एक छोटी लेकिन उपयोगी शुरुआत हो सकती है।

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