नई दिल्ली: भारत के नागरिक उड्डयन क्षेत्र में जल्द ही बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। केंद्र सरकार एयरपोर्ट ऑपरेटर कंपनियों को एयरलाइन सेवा शुरू करने की अनुमति देने पर गंभीरता से विचार कर रही है। यदि प्रस्तावित नीति लागू होती है तो देश के सबसे बड़े निजी एयरपोर्ट ऑपरेटरों में शामिल अडानी समूह और जीएमआर एयरपोर्ट्स जैसी कंपनियों के लिए एयरलाइन कारोबार में उतरने का रास्ता खुल सकता है। इस संभावित बदलाव को भारतीय एविएशन सेक्टर में प्रतिस्पर्धा बढ़ाने और यात्रियों को बेहतर सेवाएं उपलब्ध कराने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
सूत्रों के अनुसार सरकार नागरिक उड्डयन क्षेत्र में अधिक प्रतिस्पर्धा लाने और सीमित कंपनियों के प्रभुत्व को कम करने के उद्देश्य से मौजूदा नियमों की समीक्षा कर रही है। वर्तमान व्यवस्था में एयरपोर्ट संचालन और एयरलाइन संचालन के बीच कई नियामकीय सीमाएं हैं, जिनमें बदलाव पर विचार किया जा रहा है।
इंडिगो और एयर इंडिया का है बड़ा दबदबा
भारत के घरेलू विमानन बाजार में इस समय इंडिगो और एयर इंडिया समूह का सबसे अधिक प्रभाव है। इंडिगो की घरेलू बाजार हिस्सेदारी 60 प्रतिशत से अधिक मानी जाती है, जबकि एयर इंडिया समूह भी तेजी से अपने नेटवर्क का विस्तार कर रहा है। ऐसे में यदि अडानी समूह जैसी बड़ी कॉर्पोरेट कंपनी एयरलाइन क्षेत्र में प्रवेश करती है तो बाजार में प्रतिस्पर्धा और तेज हो सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि नई एयरलाइन के आने से यात्रियों को किराए, सेवाओं और उड़ानों के विकल्पों में अधिक लाभ मिल सकता है। साथ ही कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ने से सेवा गुणवत्ता में भी सुधार देखने को मिल सकता है।
अडानी समूह पहले से ही एयरपोर्ट सेक्टर में मजबूत
अडानी समूह देश के कई प्रमुख हवाई अड्डों का संचालन कर रहा है। इनमें मुंबई, अहमदाबाद, लखनऊ, जयपुर, गुवाहाटी, तिरुवनंतपुरम और मंगलुरु जैसे बड़े एयरपोर्ट शामिल हैं। इसके अलावा नवी मुंबई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा परियोजना पर भी तेजी से काम चल रहा है।
एयरपोर्ट संचालन के क्षेत्र में मजबूत मौजूदगी होने के कारण यदि समूह एयरलाइन सेवा शुरू करता है तो उसे इंफ्रास्ट्रक्चर, संचालन और नेटवर्क के स्तर पर महत्वपूर्ण बढ़त मिल सकती है।
जीएमआर एयरपोर्ट्स के लिए भी खुल सकते हैं अवसर
यदि सरकार नियमों में बदलाव करती है तो इसका लाभ केवल अडानी समूह को ही नहीं बल्कि जीएमआर एयरपोर्ट्स जैसी अन्य कंपनियों को भी मिल सकता है। जीएमआर दिल्ली और हैदराबाद जैसे बड़े अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों का संचालन करती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि एयरपोर्ट और एयरलाइन दोनों क्षेत्रों में निवेश बढ़ने से भारतीय विमानन उद्योग को नई गति मिल सकती है।
यात्रियों को क्या होगा फायदा?
यदि बाजार में नई एयरलाइन आती है तो इसका सीधा फायदा यात्रियों को मिल सकता है। प्रतिस्पर्धा बढ़ने से—
हवाई किराए अधिक प्रतिस्पर्धी हो सकते हैं।
नई उड़ानों की संख्या बढ़ सकती है।
छोटे शहरों के लिए बेहतर कनेक्टिविटी मिल सकती है।
ग्राहक सेवाओं में सुधार देखने को मिल सकता है।
एयरलाइंस नई सुविधाओं और बेहतर ऑफर देने पर जोर देंगी।
हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि एयरलाइन उद्योग पूंजी-गहन और चुनौतीपूर्ण व्यवसाय है। इसलिए किसी भी नई कंपनी को सफल होने के लिए मजबूत रणनीति, आधुनिक बेड़ा और कुशल संचालन की आवश्यकता होगी।
नीति में बदलाव क्यों जरूरी माना जा रहा है?
भारतीय विमानन बाजार दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते बाजारों में शामिल है। हर साल करोड़ों नए यात्री हवाई यात्रा अपना रहे हैं। ऐसे में सरकार चाहती है कि इस क्षेत्र में निवेश बढ़े और अधिक कंपनियां भागीदारी करें। इससे रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे और एयर कनेक्टिविटी का विस्तार होगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि एयरपोर्ट ऑपरेटरों को एयरलाइन शुरू करने की अनुमति मिलती है तो इससे इंफ्रास्ट्रक्चर और संचालन के बीच बेहतर तालमेल स्थापित हो सकता है। हालांकि इसके साथ निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा बनाए रखने के लिए मजबूत नियामकीय व्यवस्था भी आवश्यक होगी।
नियामकीय चुनौतियां भी रहेंगी
एयरपोर्ट और एयरलाइन दोनों का संचालन एक ही समूह द्वारा किए जाने की स्थिति में हितों के टकराव (Conflict of Interest) से जुड़े सवाल भी उठ सकते हैं। इसलिए सरकार यदि नई नीति लागू करती है तो पारदर्शिता, निष्पक्ष स्लॉट आवंटन, शुल्क निर्धारण और प्रतिस्पर्धा संबंधी नियमों को और मजबूत करना होगा।
विमानन विशेषज्ञों का कहना है कि सही नियामकीय ढांचा तैयार होने पर यह बदलाव भारतीय एविएशन सेक्टर को नई दिशा दे सकता है।
फिलहाल अंतिम फैसला बाकी
सरकार की ओर से अभी इस विषय पर कोई अंतिम आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। नीति पर विचार-विमर्श जारी है और संबंधित मंत्रालय विभिन्न पहलुओं का अध्ययन कर रहा है। यदि प्रस्ताव को मंजूरी मिलती है तो भारत के विमानन क्षेत्र में यह पिछले कई वर्षों का सबसे बड़ा संरचनात्मक बदलाव साबित हो सकता है।
एविएशन सेक्टर से जुड़े जानकारों का मानना है कि आने वाले समय में इस नीति पर सरकार के फैसले का असर न केवल एयरलाइन कंपनियों बल्कि करोड़ों हवाई यात्रियों, निवेशकों और पूरे विमानन उद्योग पर पड़ेगा।