नई दिल्ली । राजधानी दिल्ली में वायु प्रदूषण का संकट एक बार फिर गंभीर होता दिखाई दे रहा है। सर्दियों की शुरुआत के साथ हवा की गुणवत्ता लगातार बिगड़ रही है। आसमान में धुंध की मोटी परत छाने और सांस लेने में परेशानी की शिकायतों के बीच शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-NCR के प्रदूषण मामले पर सुनवाई करते हुए गंभीर चिंता जताई। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सवाल उठाया कि आखिर प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए जिम्मेदार एजेंसियां और सरकारें क्या ठोस कदम उठा रही हैं?
सुनवाई के दौरान न्यायमित्र (एमिकस क्यूरी) वरिष्ठ अधिवक्ता अपराजिता सिंह ने प्रदूषण की भयावह स्थिति का उल्लेख करते हुए कहा कि दिल्ली-NCR की हवा में सांस लेना ऐसा महसूस हो रहा है, जैसे कोई व्यक्ति प्रतिदिन 30 सिगरेट पी रहा हो। उन्होंने बताया कि प्रदूषण के कारण उनकी आवाज भी प्रभावित हो रही है। यह टिप्पणी राजधानी की बिगड़ती वायु गुणवत्ता और आम नागरिकों के सामने खड़े स्वास्थ्य संबंधी खतरे को दर्शाती है।
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने दिल्ली के मौसम को लेकर टिप्पणी करते हुए पूछा कि क्या सभी लोग दिल्ली के मौसम का आनंद ले रहे हैं? इस पर प्रदूषण की स्थिति पर अदालत की सहायता कर रहीं अपराजिता सिंह ने गंभीर वायु गुणवत्ता की ओर ध्यान दिलाया।
CJI ने कहा कि बारिश होने के कारण प्रदूषण के स्तर में कुछ कमी आई थी। हालांकि, केवल बारिश से मिलने वाली अस्थायी राहत को प्रदूषण नियंत्रण का स्थायी समाधान नहीं माना जा सकता। मौसम में बदलाव और हवा की गति के कारण AQI में उतार-चढ़ाव हो सकता है, लेकिन जब तक प्रदूषण के मूल कारणों पर प्रभावी कार्रवाई नहीं होगी, तब तक दिल्लीवासियों को साफ हवा मिलना मुश्किल बना रहेगा।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, 6 नवंबर को दिल्ली का औसत वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) 391 तक पहुंच गया था। यह बेहद खराब श्रेणी में आता है और गंभीर श्रेणी के करीब है। दिल्ली के 59 निगरानी केंद्रों में से 30 केंद्रों पर वायु गुणवत्ता गंभीर श्रेणी में दर्ज की गई।
दिल्ली-NCR में वायु प्रदूषण की चर्चा होते ही अक्सर पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने की घटनाओं को प्रमुख कारण बताया जाता है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई कि प्रदूषण की समस्या को केवल पराली जलाने तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता।
अपराजिता सिंह ने अदालत को बताया कि 5 नवंबर को प्रदूषण में पराली जलाने का योगदान लगभग 14 प्रतिशत दर्ज किया गया था। उन्होंने कहा कि दिल्ली पहले से ही प्रदूषित रहती है और पराली जलाने से स्थिति और अधिक खराब हो जाती है।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि प्रदूषण नियंत्रण के लिए स्थानीय स्तर पर होने वाले उत्सर्जन पर भी ध्यान देना जरूरी है। दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में वाहनों से निकलने वाला धुआं, ऊर्जा उत्पादन, कचरा जलाना और अन्य गतिविधियां भी वायु गुणवत्ता को प्रभावित करती हैं।
इससे स्पष्ट होता है कि प्रदूषण के खिलाफ लड़ाई किसी एक राज्य, विभाग या गतिविधि तक सीमित नहीं रह सकती। इसके लिए दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश की सरकारों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता है।
सुनवाई के दौरान परिवहन क्षेत्र को प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण बताते हुए विशेष चिंता जाहिर की गई। दिल्ली में प्रतिदिन बड़ी संख्या में वाहन सड़कों पर चलते हैं। इसके अलावा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के विभिन्न शहरों और राज्यों से भी हजारों वाहन दिल्ली में प्रवेश करते हैं।
मुख्य न्यायाधीश ने इस पहलू पर ध्यान दिलाते हुए कहा कि समस्या केवल दिल्ली में पंजीकृत वाहनों की संख्या तक सीमित नहीं है। दूसरे राज्यों से आने वाले वाहनों के कारण भी राजधानी की हवा प्रभावित होती है।
वाहनों से निकलने वाला धुआं, ईंधन का दहन और यातायात जाम प्रदूषण को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। दिल्ली में आने-जाने वाले वाहनों की निगरानी करना भी प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती है। कई वाहन कुछ घंटों के लिए राजधानी में प्रवेश करते हैं, लेकिन इस दौरान उनसे निकलने वाला धुआं स्थानीय वायु गुणवत्ता पर असर डाल सकता है।
ऐसे में केवल पुराने वाहनों पर प्रतिबंध लगाने या कुछ दिनों के लिए यातायात संबंधी पाबंदियां लागू करने से समस्या का पूर्ण समाधान नहीं होगा। सार्वजनिक परिवहन को मजबूत बनाने, स्वच्छ ईंधन को बढ़ावा देने और वाहन उत्सर्जन के नियमों का सख्ती से पालन कराने की आवश्यकता है।
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में पराली जलाने की समस्या के स्थायी समाधान पर भी महत्वपूर्ण चर्चा हुई। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि किसानों को फसल कटाई के बाद अगली बुवाई के लिए समय पर तैयारी करनी होती है। ऐसे में पराली प्रबंधन की व्यवस्था पहले से तैयार रहनी चाहिए।
अदालत में यह सुझाव सामने आया कि पराली की खरीद के लिए निर्धारित कीमत की घोषणा काफी पहले कर दी जानी चाहिए। इसके साथ ही ग्राम पंचायतों को पराली प्रबंधन की जिम्मेदारी और आवश्यक व्यवस्था उपलब्ध कराई जानी चाहिए, ताकि किसानों को फसल अवशेषों के निपटान के लिए व्यावहारिक विकल्प मिल सकें।
दरअसल, पराली जलाने के पीछे आर्थिक और तकनीकी समस्याएं भी हैं। कई किसानों के पास फसल अवशेषों को हटाने के लिए पर्याप्त मशीनें और संसाधन उपलब्ध नहीं होते। यदि उन्हें समय पर मशीनें, आर्थिक सहायता और पराली के उचित उपयोग के विकल्प मिलें, तो इस समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
पराली से जैव ईंधन, खाद और अन्य उपयोगी उत्पाद तैयार करने की संभावनाएं भी मौजूद हैं। सरकारों को इन विकल्पों को प्रोत्साहित करने के साथ किसानों के लिए प्रभावी व्यवस्था विकसित करनी होगी।
दिल्ली की खराब हवा का असर केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लोगों के स्वास्थ्य के लिए भी गंभीर चुनौती बन रही है। प्रदूषित वातावरण में लंबे समय तक रहने से सांस संबंधी परेशानियां बढ़ सकती हैं। अस्थमा, एलर्जी और फेफड़ों से जुड़ी समस्याओं से पीड़ित लोगों के लिए ऐसी स्थिति विशेष रूप से मुश्किल हो सकती है।
बच्चों, बुजुर्गों और पहले से सांस या हृदय संबंधी बीमारियों से जूझ रहे लोगों को अधिक सावधानी बरतने की आवश्यकता है। प्रदूषण के दौरान आंखों में जलन, गले में खराश, खांसी और सांस लेने में परेशानी जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, प्रदूषित हवा में मौजूद सूक्ष्म कण सांस के माध्यम से शरीर में प्रवेश कर सकते हैं। इनका लंबे समय तक संपर्क स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। इसलिए वायु प्रदूषण को केवल मौसमी समस्या मानकर नजरअंदाज करना उचित नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई ने यह सवाल फिर खड़ा कर दिया है कि दिल्ली-NCR में प्रदूषण नियंत्रण के लिए बनाई गई योजनाओं का जमीन पर कितना प्रभाव दिखाई दे रहा है। हर साल सर्दियों में वायु गुणवत्ता बिगड़ने के बाद विभिन्न विभाग सक्रिय होते हैं, लेकिन स्थायी समाधान की दिशा में लगातार काम करना जरूरी है।
दिल्ली सरकार, केंद्र सरकार, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB), वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) और पड़ोसी राज्यों की जिम्मेदारी है कि वे अपने-अपने स्तर पर प्रभावी कदम उठाएं।
इसके लिए कुछ प्रमुख क्षेत्रों में निरंतर काम करने की आवश्यकता है:
* सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को मजबूत बनाना।
* पुराने और अधिक प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों पर प्रभावी निगरानी रखना।
* निर्माण स्थलों पर धूल नियंत्रण के नियम लागू करना।
* खुले में कचरा और अन्य अपशिष्ट जलाने पर रोक लगाना।
* पराली प्रबंधन के लिए किसानों को मशीनें और आर्थिक सहायता उपलब्ध कराना।
* औद्योगिक इकाइयों के उत्सर्जन की नियमित जांच करना।
* AQI निगरानी केंद्रों को बेहतर और पारदर्शी बनाना।
इन उपायों को केवल प्रदूषण बढ़ने के बाद लागू करने के बजाय पूरे वर्ष जारी रखना होगा।
दिल्ली में प्रदूषण का संकट हर साल लाखों लोगों की जिंदगी और दिनचर्या को प्रभावित करता है। सुबह की सैर, बच्चों की स्कूल गतिविधियां, बुजुर्गों का बाहर निकलना और सामान्य आवागमन तक प्रभावित होने लगता है। ऐसे में साफ हवा उपलब्ध कराना केवल प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि नागरिकों के जीवन और स्वास्थ्य से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय है।
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि प्रदूषण के लिए किसी एक कारण को जिम्मेदार ठहराकर समस्या से बचा नहीं जा सकता। वाहनों का उत्सर्जन, पराली जलाना, कचरा जलाना, निर्माण कार्यों से उठने वाली धूल और औद्योगिक गतिविधियों जैसे सभी कारणों पर एक साथ काम करना होगा।
दिल्ली-NCR के नागरिक भी सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करके, निजी वाहनों की अनावश्यक आवाजाही कम करके और कचरा नहीं जलाकर इस प्रयास में योगदान दे सकते हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सरकारें और संबंधित एजेंसियां अदालत की चिंता को गंभीरता से लेते हुए प्रदूषण नियंत्रण के लिए स्थायी और प्रभावी कदम उठाएंगी? दिल्लीवासियों को हर साल जहरीली हवा और धुंध का सामना करने के बजाय स्वच्छ वातावरण में सांस लेने का अधिकार मिलना चाहिए। आने वाले दिनों में प्रशासन की कार्रवाई और वायु गुणवत्ता में होने वाला बदलाव इस दिशा में बेहद महत्वपूर्ण होगा।