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बचपन में ही बच्चों की रीढ़ क्यों हो रही कमजोर? चौंकाने वाले आंकड़े

कम उम्र में बच्चों को पीठ दर्द क्यों हो रहा है? 1,225 बच्चों पर आधारित अध्ययन में 38.5% ने पीठ दर्द की शिकायत की। जानिए मोबाइल, गलत पोश्चर और लंबे समय तक बैठने का रीढ़ की सेहत से क्या संबंध है।

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Gauravshali Bharat News
  • October 17, 2026 9:00 pm IST, Published 4 minutes ago

स्वास्थ्य : बच्चों में पीठ दर्द की समस्या को अक्सर बढ़ती उम्र, खेलकूद या थकान से जोड़कर नजरअंदाज कर दिया जाता है। लेकिन कम उम्र में इस तरह की परेशानी सामने आना माता-पिता के लिए चिंता का विषय हो सकता है। हाल ही में चर्चा में आए एक अध्ययन के आंकड़े इस ओर ध्यान दिलाते हैं कि बच्चों की दिनचर्या, बैठने का तरीका और शारीरिक गतिविधियों की कमी उनकी पीठ की सेहत को प्रभावित कर सकती है। अध्ययन में शामिल 1,225 बच्चों में से 38.5 प्रतिशत ने पीठ दर्द की शिकायत की। शहरी बच्चों में यह आंकड़ा 43.4 प्रतिशत, जबकि ग्रामीण बच्चों में 33.2 प्रतिशत बताया गया है।

इन आंकड़ों ने बच्चों की बदलती जीवनशैली और उनकी रीढ़ की सेहत को लेकर एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा किया है। क्या लगातार मोबाइल चलाना, कंप्यूटर के सामने बैठना और शारीरिक गतिविधियों के लिए कम समय निकालना बच्चों की परेशानी बढ़ा रहा है? हालांकि, केवल इन आंकड़ों के आधार पर पीठ दर्द का कोई एक कारण तय नहीं किया जा सकता, लेकिन यह स्थिति बच्चों की दिनचर्या पर ध्यान देने की जरूरत जरूर बताती है।

1. 1,225 बच्चों पर अध्ययन में सामने आई अहम बात

उपलब्ध जानकारी के अनुसार, पुणे के भारती विद्यापीठ मेडिकल कॉलेज के अध्ययन में 9 से 16 वर्ष की आयु के 1,225 बच्चों को शामिल किया गया था। इनमें 38.5 प्रतिशत बच्चों ने पीठ दर्द की शिकायत की। उम्र के इस पड़ाव में बच्चे स्कूल, पढ़ाई, खेलकूद और डिजिटल उपकरणों के इस्तेमाल के बीच काफी समय बिताते हैं।

बच्चों में पीठ दर्द के पीछे कई संभावित कारण हो सकते हैं। इनमें गलत तरीके से बैठना, लंबे समय तक एक ही स्थिति में रहना, शारीरिक गतिविधियों की कमी, मांसपेशियों पर दबाव और स्कूल बैग का अनुचित इस्तेमाल शामिल हो सकते हैं। हालांकि, किसी बच्चे में दर्द की वास्तविक वजह जानने के लिए उसकी स्थिति के अनुसार चिकित्सकीय जांच जरूरी है।

2. शहरी बच्चों में पीठ दर्द की शिकायत ज्यादा क्यों?

अध्ययन में शहरी बच्चों के बीच पीठ दर्द की शिकायत का आंकड़ा 43.4 प्रतिशत बताया गया, जबकि ग्रामीण बच्चों में यह 33.2 प्रतिशत रहा। दोनों आंकड़ों के बीच अंतर बच्चों की जीवनशैली को समझने के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि शहरी वातावरण ही पीठ दर्द का सीधा कारण है।

शहरी क्षेत्रों में कई बच्चों की दिनचर्या पढ़ाई, ट्यूशन, मोबाइल, टैबलेट और कंप्यूटर के आसपास केंद्रित रहती है। ऐसे में लगातार बैठकर काम करना और बाहर खेलने के लिए कम समय मिलना उनकी शारीरिक सक्रियता को प्रभावित कर सकता है।

दूसरी ओर, ग्रामीण और शहरी बच्चों की दिनचर्या, पढ़ाई के घंटे, खेलकूद के अवसर और सामाजिक परिस्थितियां अलग-अलग हो सकती हैं। इसलिए दोनों समूहों के बीच अंतर को समझने के लिए विस्तृत अध्ययन की आवश्यकता होती है।

3. क्या मोबाइल और कंप्यूटर का ज्यादा इस्तेमाल जिम्मेदार है?

आजकल बच्चे पढ़ाई, मनोरंजन और दोस्तों से संपर्क के लिए डिजिटल उपकरणों का इस्तेमाल करते हैं। समस्या केवल मोबाइल चलाने में नहीं, बल्कि लंबे समय तक गलत मुद्रा में बैठे रहने और बीच-बीच में शरीर को आराम नहीं देने में भी हो सकती है।

यदि बच्चा गर्दन झुकाकर मोबाइल देखता है, पीठ को सहारा दिए बिना बैठता है या कई घंटे एक ही स्थिति में रहता है, तो उसकी पीठ और गर्दन की मांसपेशियों पर दबाव पड़ सकता है। इससे कुछ बच्चों को अकड़न, थकान या दर्द महसूस हो सकता है।

माता-पिता बच्चों को मोबाइल से पूरी तरह दूर रखने के बजाय उसके संतुलित इस्तेमाल की आदत विकसित कर सकते हैं। स्क्रीन इस्तेमाल करते समय सही मुद्रा, बीच-बीच में उठना और नियमित खेलकूद बच्चों की दिनचर्या को बेहतर बनाने में मदद कर सकते हैं।

4. गलत पोश्चर से कैसे बढ़ सकती है परेशानी?

बैठने और खड़े होने का तरीका शरीर की मांसपेशियों तथा रीढ़ पर पड़ने वाले दबाव को प्रभावित करता है। यदि बच्चा लगातार झुककर बैठता है या पढ़ाई के दौरान शरीर को उचित सहारा नहीं मिलता, तो उसे पीठ में असुविधा हो सकती है।

बच्चों की पढ़ाई की मेज और कुर्सी उनकी लंबाई के अनुसार होनी चाहिए। बैठते समय पैर जमीन पर टिकने चाहिए और पीठ को उचित सहारा मिलना चाहिए। किताब या स्क्रीन को इस तरह रखना उपयोगी है कि बच्चे को लगातार आगे झुकना न पड़े।

स्कूल बैग का वजन भी ध्यान देने योग्य है। बैग बहुत भारी होने या उसे केवल एक कंधे पर लटकाकर चलने से असुविधा बढ़ सकती है। इसलिए बैग का वजन कम रखने, दोनों कंधों पर पट्टियां इस्तेमाल करने और अनावश्यक सामान हटाने की आदत डालना बेहतर है।

5. बच्चों की रीढ़ स्वस्थ रखने के लिए क्या करें?

बच्चों की पीठ को स्वस्थ रखने के लिए किसी जटिल दिनचर्या की जरूरत नहीं है। रोजमर्रा की कुछ अच्छी आदतें लंबे समय में मददगार हो सकती हैं।

नियमित शारीरिक गतिविधि: बच्चों को उनकी उम्र और क्षमता के अनुसार खेलकूद, पैदल चलने, साइकिल चलाने और अन्य गतिविधियों के लिए प्रोत्साहित करें।

बैठने का सही तरीका: पढ़ाई या कंप्यूटर इस्तेमाल करते समय पीठ को सहारा दें और लगातार लंबे समय तक एक ही मुद्रा में न बैठने दें।

स्क्रीन टाइम में संतुलन: मोबाइल और कंप्यूटर के इस्तेमाल के बीच नियमित विराम रखें। खाली समय में बच्चों को सक्रिय खेलों के अवसर दें।

संतुलित आहार और पर्याप्त नींद: बढ़ते शरीर को पर्याप्त पोषण और आराम की जरूरत होती है। बच्चों के भोजन में विविधता रखें और उम्र के अनुसार पर्याप्त नींद सुनिश्चित करें।

स्कूल बैग पर ध्यान: बैग का वजन, उसकी फिटिंग और इस्तेमाल का तरीका जांचें। बच्चे को जरूरत से ज्यादा किताबें ढोने से बचाएं।

इन उपायों का उद्देश्य बच्चों की सामान्य शारीरिक सेहत को बेहतर बनाना है। यदि किसी बच्चे को लगातार दर्द हो रहा है, तो केवल पोश्चर सुधारने को पर्याप्त उपचार नहीं मानना चाहिए।

6. कब डॉक्टर को दिखाना जरूरी है?

बच्चों में पीठ दर्द बार-बार हो, कई दिनों तक बना रहे या पढ़ाई, खेलकूद और सामान्य गतिविधियों को प्रभावित करे, तो चिकित्सकीय सलाह लेना उचित है। दर्द के साथ बुखार, चोट, रात में तेज दर्द, पैरों में कमजोरी या सुन्नपन, चलने में परेशानी अथवा पेशाब-पाखाने पर नियंत्रण में बदलाव जैसे लक्षण हों, तो तुरंत चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए।

कम उम्र में पीठ दर्द होने का मतलब हमेशा रीढ़ की गंभीर बीमारी नहीं होता। इसके पीछे मांसपेशियों में खिंचाव से लेकर अन्य चिकित्सकीय कारण भी हो सकते हैं। इसलिए इंटरनेट पर उपलब्ध जानकारी के आधार पर स्वयं निदान या दवा देने से बचना चाहिए।

7. माता-पिता के लिए सबसे जरूरी संदेश

बच्चों की सेहत पर ध्यान देते समय केवल पढ़ाई, परीक्षा और स्क्रीन टाइम को ही प्राथमिकता देना पर्याप्त नहीं है। उनकी बैठने की मुद्रा, खेलकूद, नींद, भोजन और रोजमर्रा की गतिविधियों पर भी नजर रखना जरूरी है।

यदि बच्चा बार-बार पीठ दर्द की शिकायत करता है, तो उसकी बात को गंभीरता से सुनें। उसे आलसी या बहाना बनाने वाला कहकर टालने के बजाय दर्द कब होता है, कितनी देर रहता है और किन गतिविधियों से बढ़ता है, यह समझने की कोशिश करें।

निष्कर्ष: 1,225 बच्चों पर आधारित अध्ययन में सामने आए आंकड़े बच्चों की रीढ़ की सेहत को लेकर जागरूकता बढ़ाने की जरूरत बताते हैं। मोबाइल का इस्तेमाल, लंबे समय तक बैठना और शारीरिक गतिविधियों की कमी संभावित योगदानकर्ता हो सकते हैं, लेकिन किसी एक कारण को जिम्मेदार ठहराने के लिए पर्याप्त प्रमाण जरूरी हैं। सही पोश्चर, नियमित गतिविधियां और समय पर चिकित्सकीय सलाह बच्चों को स्वस्थ रखने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।

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